भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
६६
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
मेष लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में स्वराशि स्थित मंगल
के प्रभाव से जातक दीर्घायु तथा पुरातत्त्व का
लाभ प्राप्त करता है, परन्तु लग्न का स्वामी
भी होने के कारण शारीरिक सौन्दर्य में कमी देता
है। चतुर्थ दृष्टि से शनि की राशि वाले एकादश
भाव को देखने के कारण आय के क्षेत्र में
कठिनाइयों के साथ सफलता देता है। सातवीं
दृष्टि से शत्रु शुक्र की राशि वाले द्वितीयभाव को
देखने से धन तथा कुटुम्ब के बारे में चिन्ता बनी
रहती है। आठवीं मित्रदृष्टि के तृतीयभाव के देखने के कारण जातक के पराक्रम
को बढ़ाता है, परन्तु अष्टमेश होने के कारण भाई-बहिन के सुख में कमी भी लाता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
नवें भाव में मित्र राशिस्थ मंगल के
मेष लग्न : नवमभाव : मंगल प्रभाव से जातक के भाग्य की उन्नति होती
है, परन्तु मंगल के अष्टमेश होने के कारण
कुछ कठिनाइयाँ भी आती रहती हैं। चौथी मित्र-
दृष्टि से बारहवें भाव को देखने से खर्च की
अधिकता तथा बाहरी स्थानों से सम्बन्ध रहता
है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीय भाव को देखने के
कारण जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु
मंगल के अष्टमेश भी होने के कारण भाई-बहिन के
सुख में कमी आती है। आठवीं नीच दृष्टि से चतुर्थ
भाव को देखने के कारण माता, भूमि, भवन आदि के सुख में कमी बनी रहती है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' में स्थित 'मंगल' का फलादेश
मेष लग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में शनि की राशि पर स्थित
उच्च मंगल के प्रभाव के जातक अपने पिता से
शत्रुता रखता है, परन्तु व्यवसाय एवं राज्य के क्षेत्र
में उन्नति करता है। चौथी दृष्टि से स्वक्षेत्री प्रथम-
भाव को देखने के कारण शारीरिक प्रभाव में
उन्नति देता है। सातवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव
को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन के सुख
में कमी आती है। आठवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव
को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में
जातक को विशेष सफलता प्राप्त होती है।
१००
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
'मेष' लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में शनि की राशिस्थ मंगल
के प्रभाव से जातक की आय में वृद्धि होती रहती
है, परन्तु अष्टमेश दोष होने के कारण कुछ
कठिनाइयां भी आती हैं। चौथी दृष्टि से शत्रु की
राशि वाले द्वितीयभाव में देखने के कारण धन तथा
कुटुम्ब सम्बन्धी असन्तोष रहता है। सातवीं दृष्टि
से मित्रराशि के पञ्चमभाव को देखने से सन्तान
तथा विद्या के क्षेत्र में कमी बनी रहती है। आठवीं
मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष पर
प्रभाव बढ़ता है तथा जातक बड़ा साहसी होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
मेष लग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर
स्थित मंगल के प्रभाव से जातक बाहरी स्थानों में
भ्रमण करने वाला तथा अत्यधिक खर्च करने वाला
होता है। उसके शारीरिक सौंदर्य में भी कमी
रहती है।
चौथी मित्र दृष्टि से तृतीयभाव को देखने
के कारण जातक पराक्रमी होता है, परन्तु मंगल के
अष्टमेश होने के कारण भाई-बहिनों के सुख में
कमी आ जाती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से छठे भाव को देखने के कारण जातक शत्रु
पक्ष में प्रबल रहता है। आठवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले सप्तम भाव को देखने
से स्त्री-सुख में कमी आती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयां आती रहती हैं।
'मेष' लग्न में 'बुध'
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेष लग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र राशिस्थ बुध के प्रभाव
से जातक पुरुषार्थी होता है, परन्तु बुध के षष्ठेश
दोष के कारण रोग-पीड़ित भी रहता है। इसी
कारण भाई-बहिनों के सुख में भी कुछ कमी आ
जाती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से सातवें भाव को
देखने के कारण व्यवसाय के क्षेत्र में तो परिश्रम
द्वारा सफलता प्राप्त होती है, परन्तु स्त्री-सुख में
कुछ कठिनाइयों के बाद ही सफलता मिल पाती है।
१०१
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेष लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में मित्र राशिस्थ बुध के प्रभाव से
जातक के धन एवं पुरुषार्थ में वृद्धि तो होती है, परन्तु
बुध के अष्टमेश होने के कारण धनप्राप्ति के क्षेत्र में
कठिनाइयों तथा हानि का सामना भी करना पड़ता है।
बुध के तृतीयेश होने के कारण भाई-बहिन के सुख में भी
कमी आ जाती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव की देखने के
कारण जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा उसे
पुरातत्त्व सम्बन्धी लाभ भी होते हैं।
१५३
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में स्वराशिस्थ बुध के प्रभाव से जातक
अत्यन्त पराक्रमी तथा हिम्मती होता है, परन्तु षष्ठेश
होने के कारण जहाँ शत्रुओं पर विजय दिलाता है, वहीं
भाई-बहिन के सुख में कमी भी ले आता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने के
कारण जातक अपने ही पराक्रम से भाग्य की वृद्धि करता
है तथा कुछ कमी के साथ धर्म-पालन की ओर भी प्रेरित
करता रहेगा। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक विवेकी,
परिश्रमी तथा पराक्रमी होता है।
१५४
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन तथा
सुख के पक्ष में कुछ कमियां बनी रहती हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव की देखने के
कारण जातक को पिता एवं राज्य पक्ष द्वारा सम्मान
तथा सफलतायें मिलती हैं। ऐसी ग्रह स्थिति का जातक
यशस्वी होता है तथा प्रत्येक क्षेत्र में कुछ परेशानियों के
बाद ही सफलता प्राप्त करता है।
१५५
१०२
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्रराशिस्थ बुध के प्रभाव से
जातक अपने विशेष परिश्रम द्वारा विद्या, बुद्धि एवं
सन्तान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है, क्योंकि बुध
में स्थानाधिपति दोष है।
सातवीं मित्रदृष्टि से ग्यारहवें भाव को देखने
के कारण जातक अपने बुद्धि-विवेक द्वारा भाग्य तथा
आय की वृद्धि करता है। बुध के षष्ठेश होने के कारण
जातक को शत्रुपक्ष में भी सफलता मिलती रहती है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेष लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में स्वक्षेत्री तथा उच्च के बुध के प्रभाव
से जातक अपने शत्रुओं पर अत्यधिक प्रभाव रखने वाला
तथा अपने पुरुषार्थ द्वारा बड़े-बड़े काम कर दिखाने
वाला होता है।
बुध के पराक्रमेश के साथ षष्ठेश भी होने के
कारण भाई-बहिनों से कुछ विरोध रहता है तथा अपने
पराक्रम के बारे में भी कुछ आन्तरिक कमी का अनुभव
करता रहता है।
सातवीं नीच दृष्टि से द्वादशभाव को देखने के
कारण जातक को खर्च तथा बाहरी सम्बन्धों में कुछ हानियाँ भी उठानी पड़ती हैं।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक अपने पुरुषार्थ द्वारा व्यवसाय में
सफलता पाता है, परन्तु षष्ठेश होने के कारण स्त्री-पक्ष
में कठिनाइयां आती रहती हैं।
सातवीं दृष्टि से मित्र मंगल की राशि वाले
प्रथमभाव को देखने के कारण जातक को सामान्य
शारीरिक कष्ट तथा रोगों का शिकार भी बनाता है।
भाई-बहिन के द्वारा जातक को सहयोग मिलता रहता है
तथा विवेक-बुद्धि भी प्रबल रहती है।
१०३
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : अष्टमभाव : बुध
आठवें भाव में मित्र मंगल की राशि में स्थित
तृतीयेश एवं षष्ठेश बुध के प्रभाव से जातक को पराक्रम,
आयु तथा पुरातत्त्व के सम्बन्ध में कठिनाइयां आती हैं
तथा शत्रुपक्ष से हानि पहुँचने की संभावना भी रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से बुध द्वितीयभाव से देखता
है, अतः जातक को धन उपार्जित करने के लिए अधिक
परिश्रम करना पड़ता है। कुल मिलाकर ऐसी ग्रह
स्थिति के जातक का जीवन संघर्षपूर्ण रहता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : नवमभाव : बुध नवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित षष्ठेश
बुध के कारण जातक की भाग्य-पक्ष में कठिनाइयों का
अनुभव होता है, परन्तु शत्रुपक्ष के सम्बन्ध से भाग्यवृद्धि
में सफलता भी मिलती है।
सातवीं दृष्टि से बुध स्वराशि में तृतीयभाव को
देखता है, अतः जातक का पराक्रम बढ़ा रहता है और
उसे स्व-विवेक तथा भाई-बहिनों द्वारा लाभ प्राप्त होता
रहता है। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक कुछ परेशानियों
के साथ ही उन्नति कर पाता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : दशमभाव : बुध दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक अपने पराक्रम तथा पुरुषार्थ
द्वारा अत्यधिक उन्नति करता है, परन्तु बुध के षष्ठेश
होने के कारण पिता से कुछ वैमनस्य भी रहता है।
राज्यपक्ष में सम्मान तथा शत्रुपक्ष में सफलता प्राप्त
होती है।
सातवीं शत्रु दृष्टि से बुध चन्द्रमा की राशि के
चौथे भाव को देखता है, अतः माता, भूमि तथा भवन
के सुख में कुछ कमी ला देता है।
१०४
'मेष' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेष लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र राशि पर स्थित बुध
के प्रभाव से जातक अपने परिश्रम एवं बुद्धि-विवेक
द्वारा आय के क्षेत्र में अत्यधिक सफलता प्राप्त
करता है। उसे भाई-बहिन का लाभ भी मिलता है,
परन्तु षष्ठेश होने के कारण कुछ कठिनाइयां भी
आती हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण
विद्या के क्षेत्र में सफलता देता है तथा कुछ कठि-
नाइयों के साथ सन्तान पक्ष में भी सुख दिलाता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेष लग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित
षष्ठेश बुध के प्रभाव से जातक को खर्च तथा बाहरी
सम्बन्धों के विषय में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता
है एवं भाई-बहिन के सुख में भी न्यूनता आती है।
सातवीं उच्चदृष्टि से बुध अपनी राशि वाले षष्ठ-
भाव को देखता है अतः जातक स्व-विवेक द्वारा शत्रुपक्ष
पर सफलता पाने में समर्थ होता है तथा गुप्त युक्तियों एवं
धैर्य से काम लेने वाला भी होता है।
'मेष' लग्न में 'गुरु'
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : प्रथमभाव : गुरु पहले भाव में मित्र मंगल की राशि पर
स्थित गुरुके प्रभाव से जातक अत्यधिक यश, उन्नति
एवं बाह्य-स्थानों से प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। पांचवीं
मित्रदृष्टि से गुरु पंचमभाव को देखता है तथा
जातक महा विद्वान्, बुद्धिमान तथा सन्ततिवान
होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने
के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में कठिनाइयां
आती हैं। नवीं दृष्टि से स्वराशि वाले नवमभाव
को देखने के कारण जातक के भाग्य एवं धर्म में
वृद्धि होती है।
१०५
'मेष' की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित
गुरु के प्रभाव से जातक बाह्य-स्थानों के सम्पर्क से
धन एवं भाग्य की वृद्धि करता है, परन्तु कभी-कभी
हानि भी उठानी पड़ती है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से
षष्ठभाव को देखता है, अतः शत्रुपक्ष में बुद्धिमानी
से सफलता प्राप्त होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से
अष्टमभाव को देखने के कारण जातक को पुरा-
तत्त्व एवं आयु का लाभ होता है। नवीं दृष्टि से
शनि की राशि वाले दशमभाव को देखने के कारण
पिता एवं राज्य के पक्ष में कठिनाइयाँ आती हैं।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : तृतीयभाव : गुरु
तीसरे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को पराक्रम तथा
भाई-बहिनों का सुख मिलता है। पाँचवीं शत्रु दृष्टि-
से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के
क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। सातवीं दृष्टि से स्व-
राशि वाले नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म
की वृद्धि होती है। नवीं दृष्टि से शत्रु शनि की
राशि वाले ग्यारहवें भाव को देखने के कारण जातक
की आमदनी के मार्ग में कठिनाइयां उपस्थित होती हैं।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को माता, भूमि,
भवन आदि का पर्याप्त सुख मिलता है। पाँचवीं
मित्र दृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण आयु
तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। सातवीं नीच
दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता एवं राज्य
सुख में कमी रहती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि वाले
द्वादशभाव को देखने के कारण बाहरी स्थानों से
अच्छा सम्बन्ध रहता है, परन्तु व्यय की अधिकता
रहती है। ऐसा जातक धनी, सम्पत्तिवान्, दीर्घायु तथा खर्चीला होता है।
१०६
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित
गुरु के प्रभाव से जातक विद्वान्, बुद्धिमान तथा
सन्ततिवान होता है। पांचवीं दृष्टि से स्वराशि वाले
नवें भाव को देखता है अतः जातक के भाग्य की
वृद्धि होती रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से एकादश
भाव को देखने के कारण जातक की आमदनी के क्षेत्र
में कभी-कभी कठिनाइयां आती रहती हैं। नवीं मित्र-
दृष्टि से प्रथमभाव को 'देखने से जातक का शरीर
सुन्दर तथा स्वस्थ बना रहता है। ऐसी ग्रह स्थिति
का जातक विद्वान्, बुद्धिमान, धर्मात्मा तथा आकर्षक व्यक्तित्व वाला होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में अपने मित्र गुरु की राशि पर स्थित
गुरु के प्रभाव से जातक को शत्रुपक्ष में सफलता मिलती
है तथा कुछ रुकावटों के साथ भाग्योन्नति भी होती है।
पाँचवीं नीचदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता एवं
राज्य-सम्बन्ध में कमी आती है। सातवीं दृष्टि से द्वादश-
भाव को स्वराशि में देखने के कारण व्यय की अधिकता
रहती है तथा बाहरी संबंधों से सफलता मिलती है। नवीं
शत्रुदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने के कारण कुटुम्ब से
मतभेद रहता है तथा धन-प्राप्ति में कठिनाइयां आती हैं।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित
गुरु के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र
में कठिनाइयां आती हैं। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से एका-
दशभाव को देखने के कारण आमदनी के मार्ग में
रुकावटें आती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से लग्न को
देखने के कारण जातक का शरीर सुन्दर तथा व्यक्तित्व
प्रभावशाली होता है। नवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव
को देखने के कारण भाई-बहिन तथा पराक्रम का पक्ष
अच्छा बना रहता है।
१०८
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर
स्थित भाग्येश गुरु के प्रभाव से जातक के भाग्य
की उन्नति में कुछ कमी बनी रहती है। पांचवीं
मित्रदृष्टि से गुरु तृतीयभाव को देखता है, परन्तु
व्ययेश होने के कारण भाई तथा पराक्रम के क्षेत्र में
भी त्रुटिपूर्ण सफलता देता है। सातवीं मित्रदृष्टि
से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या, बुद्धि एवं
संतान पक्ष का सहयोग मिलता है। नवमीं शत्रुदृष्टि
से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के
क्षेत्र में भी कुछ कठिनाइयों के साथ ही सफलता मिलती है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्नः द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में स्वराशि स्थित गुरु के प्रभाव
से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों
से लाभ भी होता है। पांचवीं मित्रदृष्टि से गुरु चतुर्थ-
भाव को देखता है, अतः जातक को माता, भूमि एवं
भवन का सुख प्राप्त होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से
षष्ठभाव को देखता है, अतः शत्रुपक्ष में जातक अपनी
समझदारी से सफलता प्राप्त करता है। नवीं मित्रदृष्टि
से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक के आयु तथा
पुरातत्त्व के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। ऐसी
स्थिति का जातक हरक्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ ही सफलता पाता है।
'मेष' लग्न में 'शुक्र'
'मेष'- लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक सुन्दर शरीर वाला,
सम्मानित, बलिष्ठ तथा चतुर होता है।
सातवीं दृष्टि से शुक्र स्वराशि वाले सप्तम
भाव को देखता है, अतः जातक को स्त्री तथा व्यवसाय
के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं परन्तु शुक्र के
धनेश होने के कारण व्यवसाय तथा कुटुम्ब के पक्ष
में कुछ कठिनाइयां भी आती रहती हैं।
१०६
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में स्वराशि स्थित शुक्र के प्रभाव
से जातक धनी, कुटुम्बवान तथा सौभाग्यशाली
होता है, परन्तु शुक्र के बन्धनेश के साथ सप्तमेश भी
होने के कारण स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कठि-
नाइयाँ भी आती हैं।
सातवीं शत्रुदृष्टि से शुक्र अष्टमभाव को
देखता है, अतः जातक को स्वयोग्यता के कारण ही
आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ मिलता है। संक्षेप में,
ऐसा जातक धनी तथा ऐश्वर्यशाली होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक के पराक्रम, चातुर्य, साहस
एवं भाई-बहिनों की वृद्धि होती है, परन्तु सप्तमेश
होने के कारण स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ
कठिनाइयाँ भी आती हैं।
सातवीं समदृष्टि से नवमभाव को देखने के
कारण जातक भाग्यवान तथा धर्मात्मा भी होता है।
संक्षेप में, ऐसा व्यक्ति भाग्यशाली, धार्मिक, पराक्रमी,
धनी तथा सुखी जीवन व्यतीत करने वाला होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथेभाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के
सुख में कमी रहती है, परन्तु शुक्र के द्वितीयेश तथा
केन्द्रस्थ होने के कारण धन एवं कुटुम्ब का सुख प्राप्त
होता रहता है। इसी प्रकार स्त्री तथा व्यवसाय के सुख
में भी कुछ न्यूनता बनी रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव की देखने के
कारण जातक की राज्य तथा पिता के क्षेत्र में सफलता
मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी उन्नति होती है।
११०
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में शत्रु सूर्य की राशि में त्रिकोणस्थ
शुक्र के प्रभाव से जातक को सन्तान एवं विद्या के क्षेत्र
में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र दृष्टि से एकादशभाव को देखने के
कारण जातक की आमदनी अच्छी बनी रहती है।
संक्षेप में इस ग्रह स्थिति का जातक विद्वान्, सन्ततिवान्,
सुखी, धनवान तथा भाग्यशाली होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में मित्र गुरु की राशि पर नीचस्थ
शुक्र के प्रभाव से जातक शत्रु क्षेत्र में गुप्त-चातुर्य से काम
लेता है तथा कठिनाइयों का शिकार बनता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के
कारण जातक के खर्च में अधिकता बनी रहती है, परन्तु
बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में सफलता मिलती है। ऐसी
ग्रह स्थिति से जातक को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परे-
शानियां उठानी पड़ती हैं तथा सफलता पाने के लिए
बुद्धिबल का अधिक प्रयोग करना पड़ता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में केन्द्रस्थ स्वक्षेत्री शुक्र के प्रभाव
से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में विशेष
सफलताएँ मिलती हैं।
सातवीं दृष्टि से लग्न को देखने के कारण जातक
सुन्दर, कार्यकुशल, शारीरिक दृष्टि से पुष्ट तथा
प्रतिष्ठित भी होता है। संक्षेप में, ऐसी ग्रह स्थिति वाला
जातक सुखी, प्रतिष्ठित, होशियार तथा स्त्री, धन
कुटुम्ब आदि के सुख से भरा-पूरा रहता है।
१११
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न:अष्टमभाव:शुक्र आठवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
द्वितीयेश तथा सप्तमेश शत्रु के प्रभाव से जातक को
धन, कुटुम्ब, स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यन्त
कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु आयु
एवं पुरातत्त्व की शक्ति का लाभ होता है ।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को
देखने के कारण जातक कठिन परिश्रम द्वारा धन एवं
कुटुम्ब की वृद्धि करता है तथा अपने चातुर्य द्वारा
प्रतिष्ठा भी प्राप्त करता है ।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : नवमभाव : शुक्र नववें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर त्रिकोणस्थ
शुक्र के प्रभाव से जातक भाग्यवान तथा चतुर होता है,
साथ ही उसे स्त्री तथा कुटुम्ब का अच्छा सुख भी मिलता
है ।
सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण
जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन का
अच्छा सुख भी मिलता है ।
संक्षेप में, ऐसी ग्रह-स्थिति वाला जातक सुखी,
धनी, भाग्यवान, धर्मात्मा, पराक्रमी तथा भाई-बहिनों के सुख से युक्त होता है ।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक को पिता एवं राज्य क्षेत्र से
सुख प्राप्त होता है ।
सातवीं शत्रुदृष्टि से केन्द्रस्थ शुक्र द्वारा चतुर्थ-
भाव की देखने से जातक को माता, भूमि एवं भवन
का सुख भी प्राप्त होता है ।
संक्षेप में ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक धनी,
सुखी, राज्य द्वारा सम्मानित, माता, पिता तथा स्त्री
के सुख को पाने वाला, यशस्वी तथा परम चतुर होता है ।
११२
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' में स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न: एकादशभावः शुक्र ग्यारहवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित षष्ठमेश तथा द्वितीयेश शुक्र के प्रभाव से
जातक अपने चातुर्य द्वारा खूब लाभ कमाता है
तथा धनी होता है। उसे स्त्री एवं व्यवसाय द्वारा
भी सुख एवं लाभ की प्राप्ति होती है।
सातवीं शत्रु दृष्टि से पञ्चमभाव को देखने
के कारण जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के
क्षेत्र में बड़ी चतुराई के साथ सफलता मिलती है।
संक्षेप में, ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक धनी, सुखी, चतुर तथा स्वार्थी होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' में स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्नः द्वादशभावः शुक्र बारहवें भाव में अपने सामान्य शत्रु गुरु
की राशि पर स्थित उच्च के शुक्र के प्रभाव से
जातक बाहरी सम्बन्धों द्वारा बड़ी चतुराई से धन
तथा यश प्राप्त करता है तथा बहुत खर्चीला भी
होता है।
सातवीं नीच दृष्टि से मित्र राशि के षष्ठ-
भाव को देखने के कारण जातक शत्रु पक्ष में छल-
छिद्र एवं भेद युक्ति से लाभ निकालता है तथा
शत्रुओं द्वारा कुछ हानि भी उठाता है। संक्षेप में
ऐसी ग्रह स्थिति का जातक संघर्ष-पूर्ण सामान्य जीवन व्यतीत करने वाला होता है।
'मेष' लग्न में 'शनि'
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मेष लग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु मंगल की राशि पर
स्थित शनि के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य
तथा मान-प्रतिष्ठा में कमी रहती है तथा राज्य के
क्षेत्र में भी कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं। तीसरी
मित्रदृष्टि तृतीयभाव पर पड़ने से पराक्रम तथा
भाई-बहिनों की वृद्धि होती है, सातवीं मित्रदृष्टि
सप्तमभाव पर पड़ने से स्त्री यथा व्यवसाय पक्ष में
सफलता देता है तथा दसवीं दृष्टि से स्वराशि
वाले दशमभाव को देखने के कारण राज्य तथा मित्र के क्षेत्र में प्रतिष्ठा की वृद्धि
भी करता है।
११३
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मेष लग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक धनी तथा कुटुम्बवान होता है।
तीसरी शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता,
भूमि एवं भवन से सुख में कुछ कमी आती है। सातवीं
शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्व
का लाभ होने पर भी जातक को अशान्तियों का सामना
करना पड़ता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि वाले एकादश-
भाव को देखने से जातक की आयु में वृद्धि होती है।
संक्षेप में ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक धनी तथा ऐश्वर्यवान होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
'मेष' लग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
दशमेश तथा एकादशेश शनि के प्रभाव से जातक का
पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि
होती है। साथ ही पिता, राज्य द्वारा सहयोग मिलता
है। तीसरी शत्रु दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या
तथा सन्तान पक्ष में कमी रहती है। सातवीं शत्रु दृष्टि
से नवमभाव को देखने के कारण भाग्य तथा धर्म के
क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं तथा दसवीं शत्रुदृष्टि से
द्वादशभाव को देखने से कारण खर्च अधिक होता है
तथा बाहरी स्थान के सम्बन्ध भी असन्तोषजनक रहते हैं।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मेष लग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथेभाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक को माता तथा भूमि-भवन
के साधनों में कुछ कमी रहती है, परन्तु सुख में वृद्धि
होती है। तीसरी मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के
कारण शत्रुपक्ष से लाभ होता है तथा शत्रुओं पर प्रभाव
बना रहता है। सातवीं दृष्टि स्वराशि वाले दशमभाव
में पड़ने से पिता राज्य व्यवसाय एवं सामान के क्षेत्र
में वृद्धि होती रहती है। दसवीं नीचदृष्टि से लग्न को
देखने के कारण जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा वह चिन्ताओं का
भी कुछ शिकार बना रहता है।
११४
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि का फलादेश
मेष लग्नः पंचमभावः शनि पाँचवें भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित
त्रिकोणस्थ शनि के प्रभाव से जातक को विद्या एवं
बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है, परन्तु सन्तान पक्ष
से मतभेद रहता है। तीसरी उच्चदृष्टि से मित्रराशि
से सप्तमभाव को देखने के कारण व्यवसाय एवं स्त्री पक्ष
में सफलता मिलती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले
एकादशभाव की देखने से आमदनी के क्षेत्र में विशेष
सफलता मिलती है तथा राज्य एवं पिता से भी लाभ
होता है। दसवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब का
भी खूब लाभ होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मेष लग्न : षष्ठभावः शनि छठेभाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
दशमेश तथा एकादशेश शनि से प्रभाव से जातक को
पिता के साथ वैमनस्य रहता है तथा राज्य पक्ष में
कठिनाई से सफलता मिलती है। परन्तु आमदनी
अच्छी रहती है तथा शत्रुओं पर विजय भी मिलती
है। तीसरी शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु
तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में कठिनाइयों से सफलता
मिलती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने
के कारण खर्च अधिक होता है तथा बाहरी संबंधों
से असन्तोष रहता है। दसवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव की देखने से कारण पराक्रम
तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। ऐसा जातक बड़ा हिम्मती तथा प्रभावी
होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मेष लग्नः सप्तमभावः शनि सातवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
दशमेश तथा एकादशेश शनि के प्रभाव से जातक को
व्यवसाय एवं स्त्री-पक्ष में विशेष सफलता मिलती है।
पिता तथा राज्य से बहुत लाभ होता है। तीसरी शत्रु-
दृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण भाग्योन्नति में कुछ
कठिनाइयां आती हैं। सातवीं नीचदृष्टि से शत्रु मंगल की
राशि वाले प्रथमभाव को देखने से जातक के शारीरिक
सौन्दर्य में कमी आती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव
की देखने से माता, भूमि एवं भवन के क्षेत्र में कुछ असन्तोष
रहता है तथा घरेलू सुखों में भी कमी आती है।
११५
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मेष लग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
एकादशेश शनि के प्रभाव से जातक को पुरातत्व एवं
आयु का तो लाभ होता है, परन्तु आमदनी के क्षेत्र में
कमी रहती है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि वाले दशम
भाव को देखने के कारण राज्य तथा पिता-पक्ष से अल्प
लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को
देखने से कठिन परिश्रम द्वारा धन एवं कुटुम्ब के क्षेत्र में
सफलता मिलती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को
देखने के कारण विद्या तथा सन्तान पक्ष में त्रुटि रहती है। ऐसा जातक जवान का
तेज तथा क्रोधी भी होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मेष लग्न : नवमभाव : शनि नवमभाव में शत्रु बुध की राशि में स्थित शनि के
प्रभाव से जातक के भाग्य की आरम्भ में कम तथा बाद
में विशेष उन्नति होती है। धर्म का पालन भी कम ही
होता है। पिता तथा राज्य द्वारा लाभ मिलता है।
तीसरी दृष्टि से स्वराशि वाले ग्यारहवें भाव को देखने के
कारण आमदनी अच्छी रहती है तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति भी
होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के
कारण पराक्रम में वृद्धि के साथ भाई-बहिनों का सुख भी
मिलता है तथा दसवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने
के कारण शत्रु-पक्ष में प्रभाव स्थापित होता है। संक्षेप, ऐसी ग्रह स्थिति का जातक
शत्रुजयी, यशस्वी तथा धनी होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित शनि का फलादेश
मेष लग्न : दशमभाव : शनि दसवेंभाव में स्वराशिस्य शनि के प्रभाव से
जातक पिता तथा राज्य द्वारा विशेष शान्ति तथा लाभ
प्राप्त करता है। तीसरी शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने
से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी-स्थानों के संबंध
असंतोषजनक रहते हैं। सातवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को
देखने के कारण माता, भूमि, भवन के सुख में कमी रहती
है तथा दसवीं उच्चदृष्टि से सप्तमभाव को देखने के कारण
स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में पूर्ण सफलता मिलती है।
संक्षेप में ऐसा जातक ऐश्वर्यवान्, विलासी तथा सुखी
जीवन बिताने वाला होता है।
११९
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मेषलग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में स्वराशि स्थित दशमेश शनि के
प्रभाव से जातक की आमदनी खूब रहती है। उसे पिता
तथा राज्य द्वारा भी यथेष्ट लाभ मिलता है। तीसरी
नीचदृष्टि से शत्रु की राशि वाले प्रथमभाव को देखने से
जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी रहती है। सातवीं
शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या तथा
संतान पक्ष में भी त्रुटि बनी रहती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से
अष्टमभाव की देखने से आयु की वृद्धि तो होती है,
परन्तु पुरातत्त्व का सामान्य लाभ होता है एवं दैनिक
जीवन में कठिनाइयां भी आती रहती हैं।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मेषलग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में शत्रु बुध की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक का खर्च अत्यधिक होता है तथा
बाहरी स्थानों, पिता एवं राज्य के पक्ष से भी हानि
उठानी पड़ती है। तीसरी मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव से
देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि के लिए विशेष
प्रयत्न करना पड़ता है। सातवीं मित्रदृष्टि से छठेभाव को
देखने से शत्रुपक्ष में प्रभाव स्थापित होता है तथा दसवीं
शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण भाग्योन्नति में
भी बड़ी कठिनाइयां आती हैं तथा विशेष परिश्रम द्वारा
थोड़ी ही सफलता मिल पाती है।
'मेष' लग्न में 'राहु'
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मेष लग्न : प्रथमभाव : राहु
पहले भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु
के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती
है तथा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। हृदय में विभिन्न
प्रकार की चिन्तायें भी बनी रहती हैं। ऐसा जातक झूठ,
फरेब तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेने वाला तथा बड़ा
हिम्मती होता है।
१२७
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मेषलग्न : द्वितीयभाव : राहु
दूसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु
के प्रभाव से जातक धन सम्बन्धी चिन्ताओं तथा अनेक
प्रकार से संकटों से ग्रस्त बना रहता है। कौटुम्बिक क्लेश
भी भोगने पड़ते हैं। परन्तु बारम्बार हानि उठाकर भी
जातक अन्त में अपने युक्तिबल से धनी क्षतिपूर्ति करने में
समर्थ हो जाता है तथा समाज में धनी व्यक्ति के रूप में
प्रतिष्ठित भी होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मेषलग्न : तृतीयभाव : राहु
तीसरे भाव में उच्चस्थ राहु के प्रभाव से जातक
के पराक्रम में विशेष वृद्धि होती है तथा उसे भाई-बहिनों
का सुख भी मिलता है। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक
बड़ा हिम्मती, साहसी, युक्तिबल में प्रवीण तथा अपनी
भीतरी कमजोरी को प्रकट न करने वाला होता है और
अपने इन्हीं गुणों के कारण सफलता भी प्राप्त करता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मेषलग्न : चतुर्थभाव : राहु
चौथे भाव में शत्रुराशिस्थ राहु के प्रभाव से जातक
को माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी का शिकार
होना पड़ता है। घरेलू शान्ति भी नहीं रहती। वह
मानसिक-अशान्तियों का शिकार बना रहता है तथा गुप्त-
युक्तियों का आश्रय लेकर भी अधिक सफल नहीं हो
पाता।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मेषलग्न : पंचमभाव : राहु
पाँचवें भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित राहु
के प्रभाव से जातक की विद्या के क्षेत्र में बड़ी कठिनाइयों
के बाद भी थोड़ी ही सफलता मिल पाती है। उसे सन्तान
पक्ष से भी कष्ट होता है। परन्तु अपनी गुप्त युक्तियों के
बल पर वह सामान्य सफलतायें प्राप्त करता रहता है।
ऐसा जातक कम पढ़ा-लिखा तथा परेशानियों में फँसा
रहने वाला होता है।
११८
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मेषलग्न : षष्ठभाव : राहु
छठेभाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित राहु के
प्रभाव से जातक अपने शत्रु-पक्ष में हिम्मत, बहादुरी तथा
गुप्त युक्तियों से काम लेकर प्रभाव स्थापित करता है
तथा कठिन परिस्थितियों में भी अपने धैर्य को नहीं
छोड़ता। ऐसा व्यक्ति बारम्बार मुसीबतों का शिकार
बनता रहता है, परन्तु अपने साहस एवं धैर्य के बल पर
उन सब पर विजय भी पाता रहता है।
'मेष' लग्न की कुंडली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मेषलग्न : सप्तमभाव : राहु
सातवेंभाव में अपने मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष
में चिन्ता एवं कष्टों का शिकार होता है, परन्तु अपनी
गुप्त-युक्तियों के बल पर उन कठिनाइयों का निराकरण
करता है। व्यक्ति के पारिवारिक-जीवन में अनेक
कठिनाइयां आती हैं तथा जैसे-तैसे ही निर्वाह हो पाता है।
'मेष' लग्न की कुंडली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मेषलग्न : अष्टमभाव : राहु
आठवेंभाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की जीवन में अनेक बार मृत्यु-
तुल्य कष्टों का शिकार होना पड़ता है। एक के बाद
दूसरी मुसीबत घेरे रहती है तथा पुरातत्त्व विषयक हानि
भी उठानी पड़ती है। वह गुप्त-युक्तियों का आश्रय लेता
है, फिर भी उसकी चिन्ताओं एवं परेशानियों का अन्त
नहीं हो पाता।
'मेष' लग्न की कुंडली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मेषलग्न : नवमभाव : राहु
नवेंभाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित नीच के
राहु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में अनेक
कठिनाइयां उपस्थित होती रहती हैं। धर्म पालन में भी
श्रद्धा नहीं रहती। उसे बारम्बार अपयश, कष्ट, निराशा
एवं अपमान का सामना करना पड़ता है तथा अत्यधिक
दुःख उठाते रहने के बावजूद भी बहुत कम सफलतायें मिल
पाती हैं।
११६
'मेष' लग्न की कुंडली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मेषलग्न : दशमभाव : राहु
दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु
के प्रभाव से जातक को पिता तथा राज्य के पक्ष में
कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा नौकरी,
व्यवसाय एवं प्रतिष्ठा के क्षेत्र में भी बहुत संकट आते हैं।
ऐसे जातक को भाग्योन्नति में बहुत कम सफलता मिलती
है तथा अनेक प्रकार के दुःख भोगने पड़ते हैं।
२७६
'मेष' लग्न की कुंडली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मेषलग्न : एकादशभाव : राहु
ग्यारहवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की आमदनी बहुत अच्छी रहती
है, परन्तु उसके लिए उसे कठोर परिश्रम भी करना पड़ता
है। कभी-कभी लाभ के स्थान पर हानि के योग भी
उपस्थित होते हैं। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक
मितव्ययी, परिश्रमी, धनी तथा स्वार्थी होता है।
२८०
'मेष' लग्न की कुंडली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मेषलग्न : द्वादशभाव : राहु
बारहवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक को खर्च की अधिकता के कारण
बहुत कठिनाइयां उठानी पड़ती हैं तथा बाहरी स्थानों के
संबंध से भी कष्ट मिलता है। बीच-बीच में कठिनाइयों
पर विजय प्राप्त करना तथा ठाठ-बाट से रहना—ये दोनों
बातें भी साथ-साथ चलती हैं, परन्तु ऋण एवं व्यय के
बोझ से मुक्ति नहीं मिल पाती।
२८१
'मेष' लग्न में 'केतु'
'मेष' लग्न की कुंडली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फल
मेषलग्न : प्रथमभाव : केतु
पहले भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु
के प्रभाव से जातक शारीरिक-कष्ट, मानसिक-चिन्तायें
तथा अन्य प्रकार की परेशानियों का शिकार बना रहता
है। उसके शरीर में कहीं चोट भी लगती है तथा सौन्दर्य
में भी कमी आ जाती है। ऐसा व्यक्ति हिम्मती, परिश्रमी
तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेने वाला होता है, परन्तु
फिर भी अनेक त्रुटियों का शिकार बना रहता है।
२८२