भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
४६८
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मकर लग्न : द्वितीयभाव : राहु
दूसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक धन तथा कुटुम्ब के कारण
चिन्तित रहता है तथा कष्ट भोगता है। कभी-कभी ऋण
भी लेना पड़ता है। प्रकट रूप से वह धनी समझा जाता
है, परन्तु यथार्थ में धन की कमी रहती है। बाद में गुप्त
युक्तियों के बल पर वह अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़
भी बना लेता है।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मकर लग्न : तृतीयभाव : राहु
तीसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों की ओर से
कष्ट मिलता है, परन्तु पराक्रम की अत्यधिक वृद्धि होती
है। भीतर से दुर्बलता अनुभव करने पर भी वह प्रकट
रूप में बड़ा हिम्मती होता है तथा कठिनाइयों पर विजय
पाता रहता है।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मकर लग्न : चतुर्थभाव : राहु
चौथे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन के
सुख में कमी रहती है। कभी मातृभूमि का त्याग भी
करना पड़ता है। अन्त में वह गुप्त युक्तियों के बल पर
सुख तथा प्रभाव की वृद्धि करता है। ऐसा व्यक्ति हिम्मती
तथा धैर्यवान् होता है।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मकर लग्न : पंचमभाव : राहु
पाँचवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कष्ट होता
है तथा विद्या ग्रहण करने में भी कठिनाई आती है।
परन्तु उसकी बुद्धि बड़ी तीव्र होती है।
वह होशियार तथा गुप्त युक्तियों में प्रवीण होता
है। अन्त में, सन्तान तथा विद्या दोनों ही क्षेत्रों में
सफलता भी पा लेता है।
४६६
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मकर लग्न : षष्ठभाव : राहु
छठे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अपना विशेष
प्रभाव रखता है तथा झगड़ों के मामलों में सफलता
प्राप्त करता है।
वह कूटनीतिज्ञ, विवेकी, तीव्र-बुद्धि तथा गुप्त
युक्तियों का जानकार होता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः कभी
बीमार नहीं होता।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मकर लग्न : सप्तमभाव : राहु
सातवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से महान्
कष्ट होता है। व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयां
आती रहती हैं। उसकी मूतेन्द्रिय में रोग भी होता है।
वह अपनी गुप्त युक्तियों के बल से कठिनाइयों पर कुछ
विजय भी पा लेता है।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मकर लग्न : अष्टमभाव : राहु
आठवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक के जीवन पर बड़े संकट
आते हैं तथा कभी-कभी मृत्यु-तुल्य कष्ट भी भोगना
पड़ता है। पुरातत्त्व की हानि भी होती है। उदर
अथवा गुदा-सम्बन्धी रोगों का शिकार बनना पड़ता
है। वह अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर जैसे-तैसे
जीवन-यापन करता है।
५००
‘मकर’ लग्न की कुण्डली के ‘नवमभाव’ स्थित ‘राहु’ का फलादेश
मकरलग्न : नवमभाव : राहु
नवें भाव में मित्र ‘बुध’ की राशि पर स्थित राहु
के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में निरन्तर बाधाएँ
आती रहती हैं। कभी-कभी विशेष कठिनाइयों का शिकार
भी बनता है। धर्म-पालन में भी कमी रहती है।
कठिन संघर्ष, परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल
पर वह थोड़ी-बहुत उन्नति भी कर लेता है।
‘मकर’ लग्न की कुण्डली के ‘दशमभाव’ स्थित ‘राहु’ का फलादेश
मकरलग्न : दशमभाव : राहु
दसवें भाव में मित्र ‘शुक्र’ की राशि पर स्थित
‘राहु’ के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य तथा व्यवसाय
के क्षेत्र में विघ्नों बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर उन्हें दूर
करता हुआ भाग्य की उन्नत बनाता है। यद्यपि उसे
अनेक बार संकटों में घिर जाना पड़ता है।
‘मकर’ लग्न की कुण्डली के ‘एकादशभाव’ स्थित ‘राहु’ का फलादेश
मकरलग्न : एकादशभाव : राहु
ग्यारहवें भाव में शत्रु ‘मंगल’ की राशि पर
स्थित ‘राहु’ के प्रभाव से जातक अपने परिश्रम तथा
गुप्त युक्ति-बल द्वारा विशेष लाभ प्राप्त करता है।
कभी-कभी उसे बड़ी हानि भी उठानी पड़ती है तो
कभी विशेष लाभ भी होता है। उसके जीवन में
सुख-दुःख आते-जाते बने रहते हैं।
५०१
'मकर' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मकरलग्न : द्वादशभाव : राहु
बारहवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
नीच के 'राहु' के प्रभाव से जातक को अपना खर्च
चलाने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है
तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से भी कष्ट उठाने
पड़ते हैं।
हिम्मती होने के कारण वह अपनी कठिनाइयों
को प्रकट नहीं होने देता तथा उन्हें दूर करने की विशेष
परिश्रम करता रहता है।
'मकर' लग्न में 'केतु'
'मकर' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मकरलग्न : प्रथमभाव : केतु
पहले भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा
स्वास्थ्य में कमी रहती है तथा कभी कोई बड़ी चोट
लगने की संभावना भी रहती है।
ऐसा व्यक्ति उग्र तथा जिद्दी स्वभाव का होता
है तथा अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए गुप्त युक्तियों
का आश्रय भी लेता है।
'मकर' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मकरलग्न : द्वितीयभाव : केतु
दूसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब के विषय
में बड़े संकटों का सामना करना पड़ता है, परन्तु वह
हिम्मत तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर धन-
सम्बन्धी कमी को पूरा करने के लिए प्रयत्नशील बना
रहता है।
५०२
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मकरलग्न : तृतीयभाव : केतु
तीसरे भाव में शत्रु 'बुध' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों के पक्ष में
परेशानी तथा संकटों का सामना करना पड़ता है, परन्तु
पराक्रम की अत्यधिक वृद्धि होती है ।
वह साहस, धैर्य, पुरुषार्थ तथा गुप्त युक्तियों के
बल पर जीवन को प्रभावशाली बनाये रखने का प्रयत्न
करता रहता है।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मकरलग्न : चतुर्थभाव : केतु
चौथे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक की माता के सुख में कमी
तथा माता के कारण ही कष्ट भी प्राप्त होता है।
घरेलू जीवन कलहपूर्ण रहता है। मातृ-भूमि का त्याग भी
करना पड़ता है। अन्त में, कठिन परिश्रम तथा गुप्त
युक्तियों के बल पर उसे सुख के साधन प्राप्त करने में
थोड़ी-बहुत सफलता मिल जाती है ।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मकरलग्न : पंचमभाव : केतु
पाँचवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की सन्तान तथा
विद्या के क्षेत्र में कमी का शिकार होना पड़ता है।
मस्तिष्क में गुप्त चिन्ताओं का निवास रहता है।
परन्तु उसकी बुद्धि तीव्र होती है, अतः वह चतुराई
से काम लेकर अपनी कठिनाइयों के निवारण का
प्रयत्न करता है।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मकरलग्न : षष्ठभाव : केतु
छठे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक की शत्रुओं के कारण कठि-
नाइयों में फँसना पड़ता है, परन्तु अपनी गुप्त युक्तियों
के बल पर वह उन पर विजय भी पा लेता है। झगड़े-
झंझट के मामलों में उसे सफलता मिलती है। ननसाल-
पक्ष की हानि पहुँचती है। और संकट आने पर भी
वह अपना धैर्य नहीं छोड़ता है ।
५०३
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मकरलग्न : सप्तमभाव : केतु
सातवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से
अनेक प्रकार के कष्ट प्राप्त होते हैं। गृहस्थ-जीवन में
परेशानियां आती हैं। अनेक प्रकार के व्यवसाय करने
पर भी कठिनाइयां आती रहती हैं। अन्त, में वह
अपनी गुप्त युक्तियों तथा कठोर परिश्रम के द्वारा
उन पर यथोचित सफलता भी पा लेता है।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मकरलग्न : अष्टमभाव : केतु
आठवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक के जीवन पर अनेक बार
संकट आते हैं और वह मृत्यु-तुल्य कष्ट पाता है।
पेट में विकार रहता है।
आजीविका-उपार्जन के लिए कठिन परिश्रम
करना पड़ता है। भीतर से चिन्तित रहते हुए भी प्रकट
में वह प्रभाव प्रदर्शित करता है। प्रायः उसका जीवन
संघर्षपूर्ण रहता है।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मकरलग्न : नवमभाव : केतु
नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में कठि-
नाइयां आती हैं, परन्तु वह अपनी हिम्मत, परिश्रम
तथा गुप्त युक्तियों के द्वारा उन पर विजय पाकर
भाग्य की उन्नति तथा धर्म का पालन करता है।
कभी-कभी उसे भाग्य-क्षेत्र में घोर संकटों का सामना
करना पड़ता है, परन्तु अन्त में उनका निराकरण
करने में सफल हो जाता है।
५०४
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मकरलग्न : दशमभाव : केतु
दसवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक को पिता से कष्ट, राज्य से
कठिनाइयाँ तथा व्यवसाय-क्षेत्र में संकटों का शिकार
बनना पड़ता है, परन्तु अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर
वह उन पर विजय पा लेता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन
संघर्षपूर्ण तथा परिवर्तनशील होता है।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मकरलग्न : एकादशभाव : केतु
ग्यारहवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में
अत्यधिक वृद्धि होती है। वह अपनी गुप्त युक्तियों,
साहस एवं कठिन परिश्रम के बल पर आमदनी को
निरन्तर बढ़ाता रहता है। आने वाली कठिनाइयों
पर उसे विजय मिलती है। ऐसा व्यक्ति गुप्त रूप में
चिन्तित भी बना रहता है।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मकरलग्न : द्वादशभाव : केतु
बारहवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक का खर्च अत्यधिक रहता है,
परन्तु बाहरी स्थानों से उसे लाभ मिलता है।
ऐसा व्यक्ति कठिनाइयों का साहस के साथ
सामना करता है तथा अन्त में उन पर विजय भी पा
लेता है। वह बड़ा परिश्रमी, धैर्यवान्, गुप्त युक्तियों से
काम लेने वाला तथा साहसी होता है।
५०५
'कुम्भ' लग्न
१२ ११ १०
१ 'कुंभ'लग्न ९
२ ८
३ ५ ७
४ ६
१२०५
['कुम्भ' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न ग्रहों में स्थित
विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन]
'कुम्भ' लग्न का फलादेश
'कुम्भ' लग्न में जन्म लेने वाला व्यक्ति लम्बे शरीर वाला, मोटी गरदन
वाला, गंजे सिर वाला, तेजस्वी, वात-प्रकृति वाला तथा चंचल स्वभाव का होता है।
ऐसा व्यक्ति पानी अधिक पीता है। वह बातूनी, दम्भी, अहंकारी, ईर्ष्यालु,
द्वेषी, सुस्थिर तथा भ्रातृ-द्रोही होने के साथ ही श्रेष्ठ मनुष्यों से संयुक्त, सर्वप्रिय,
सुन्दर पानी वाला तथा पर-स्त्रियों में आसक्त भी होता है।
'कुम्भ' लग्न का जातक अपनी प्रारम्भिक अवस्था में दुःखी रहता है
मध्यमावस्था में सुखी रहता है तथा अन्तिम अवस्था में धन, भूमि, भवन, पुत्रादि के
सुख का उपभोग
५०६
'कुम्भ' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या १२०६ से १३१३
के बीच देखना चाहिए।
गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे आगे
लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए।
'कुम्भ' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश
१—'कुम्भ' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १२०६ से १२१७ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कुम्भ' लग्न वालों को अपनी गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'सूर्य' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'सूर्य'—
(क) 'मेष' राशि पर ही तो संख्या १२०६
(ख) 'वृष' राशि पर ही तो संख्या १२०७
(ग) 'मिथुन' राशि पर ही तो संख्या १२०८
(घ) 'कर्क' राशि पर ही तो संख्या १२०६
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १२१०
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १२११
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १२१२
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर ही तो संख्या १२१३
(झ) 'धनु' राशि पर ही तो संख्या १२१४
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १२१५
(ट) 'कुम्भ' राशि पर ही तो संख्या १२१६
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १२१७
'कुम्भ' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश
१—'कुम्भ' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'चन्द्रमा' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १२१८ से १२२९ के बीच
देखना चाहिए।
२—'कन्या' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
५०७
'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस दिन 'चन्द्रमा'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १२१८
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १२१६
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १२२०
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १२२१
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १२२२
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १२२३
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १२२४
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १२२५
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १२२६
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १२२७
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १२२८
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १२२६
'कुम्भ' लग्न में 'मंगल' का फलादेश
१—'कुम्भ' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'मंगल' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १२३० से १२४१ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कुम्भ' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'मंगल'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १२३०
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १२३१
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १२३२
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १२३३
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १२३४
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १२३५
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १२३६
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १२३७
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १२३८
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १२३६
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १२४०
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १२४१
५०८
'कुम्भ' लग्न में 'बुध' का फलादेश
१—'कुम्भ' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १२४२ से १२५३ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कुम्भ' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'बुध'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १२४२
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १२४३
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १२४४
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १२४५
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १२४६
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १२४७
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १२४८
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १२४६
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १२५०
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १२५१
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १२५२
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १२५३
'कुम्भ' लग्न में 'गुरु' का फलादेश
१—'कुम्भ' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १२५४ से १२६५ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कुम्भ' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'गुरु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १२५४
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १२५५
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १२५६
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १२५७
५०६
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १२५८
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १२५६
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १२६०
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १२६१
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १२६२
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १२६३
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १२६४
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १२६५
'कुम्भ' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश
१—'कुम्भ' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १२६६ से १२७७ के बीच देखना
चाहिए ।
२—'कुम्भ' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'शुक्र'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १२६६
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १२६७
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १२६८
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १२६६
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १२७०
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १२७१
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १२७२
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १२७३
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १२७४
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १२७५
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १२७६
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १२७७
'कुम्भ' लग्न में 'शनि' का फलादेश
१—'कुम्भ' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १२७८ से १२८६ के बीच देखना
चाहिए ।
२—'कुम्भ' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'
५१०
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'शनि'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १२७८
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १२७९
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १२८०
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १२८१
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १२८२
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १२८३
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १२८४
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १२८५
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १२८६
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १२८७
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १२८८
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १२८९
'कुम्भ' लग्न में 'राहु' का फलादेश
१—'कुम्भ' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १२९० से १३०१ के बीच देखना
चाहिए ।
२—'कुम्भ' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'राहु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १२९०
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १२९१
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १२९२
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १२९३
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १२९४
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १२९५
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १२९६
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १२९७
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १२९८
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १२९९
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३००
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३०१
५११
'कुम्भ' लग्न में 'केतु' का फलादेश
१—'कुम्भ' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३०२ से १३१३ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कुम्भ' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'केतु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३०२
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३०३
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३०४
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३०५
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३०६
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३०७
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३०८
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३०६
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३१०
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३११
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३१२
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३१३
'कुम्भ' लग्न में 'सूर्य'
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कुम्भलग्न : प्रथमभाव : सूर्य
पहले भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा
स्वास्थ्य में कुछ कमी आती है, परन्तु प्रभाव एवं शक्ति
की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति तेज स्वभाव का तथा
बहुत दौड़-धूप करने वाला है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को देखने
से स्त्री-पक्ष द्वारा विशेष सुख मिलता है तथा पुरुषार्थ
द्वारा दैनिक आमदनी के क्षेत्र में भी सफलता मिलती
रहती है। गार्हस्थ्य जीवन आनन्दमय बना रहता है।
५१२
‘कुम्भ’ लग्न की कुण्डली के ‘द्वितीयभाव’ स्थित ‘सूर्य’ का फलादेश
कुम्भ लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में मित्र ‘गुरु’ की राशि पर स्थित
‘सूर्य’ के प्रभाव से जातक के धन तथा कुटुम्ब-सुख की
वृद्धि होती है, परन्तु स्त्री-पक्ष से किसी विशेष कमी
का अनुभव होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती है तथा
दैनिक जीवन भी प्रभावशाली बना रहता है।
‘कुम्भ’ लग्न की कुण्डली के ‘तृतीयभाव’ स्थित ‘सूर्य’ का फलादेश
कुम्भ लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में मित्र ‘मंगल’ की राशि पर
स्थित उच्च के ‘सूर्य’ के प्रभाव से जातक को भाई-
बहिनों का पर्याप्त सुख मिलता है तथा पराक्रम में
भी अत्यधिक वृद्धि होती है। व्यवसाय द्वारा अन्य
क्षेत्रों में भी सफलता मिलती है।
सातवीं नीच तथा शत्रुदृष्टि से नवम भाव को
देखने से भाग्योन्नति तथा धर्म-पालन में कमी आती
है तथा सम्मान भी अधिक नहीं मिलता।
‘कुम्भ’ लग्न की कुण्डली के ‘चतुर्थभाव’ स्थित ‘सूर्य’ का फलादेश
कुम्भ लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में शत्रु ‘शुक्र’ की राशि पर स्थित
‘सूर्य’ के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा
भवन का सुख कुछ कठिनाई के साथ मिलता है
तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी परेशानियां आती हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य तथा व्यवसाय द्वारा सफलता एवं लाभ
की प्राप्ति होती है तथा प्रतिष्ठा भी बढ़ती है।
५१३
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कुम्भ लग्न : पंचमभाव : सूर्य
पाँचवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं संतान
के क्षेत्र में सफलता मिलती है। स्त्री तथा व्यवसाय से
भी सुख मिलता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से
बुद्धियोग द्वारा आमदनी अच्छी रहती है। ऐसा व्यक्ति
सुखी, धनी तथा प्रभावशाली होता है।
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कुम्भ लग्न : षष्ठभाव : सूर्य
छठे भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर विजय पाता है
तथा झगड़ों के मामलों से लाभ उठाता है। व्यवसाय में
कुछ कठिनाई के साथ सफलता मिलती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च
अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कुछ
कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है।
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कुम्भ लग्न : सप्तमभाव : सूर्य
सातवें भाव में स्वराशि पर स्थित 'सूर्य' के
प्रभाव से जातक को स्त्री का पर्याप्त सुख मिलता है
तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है।
ससुराल से लाभ होता है तथा गृहस्थ जीवन सुखमय
बना रहता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से
शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी रहती है।
५१४
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कुम्भ लग्न : अष्टमभाव : सूर्य
[चित्र १२८३ : कुम्भ लग्न, अष्टम भाव (कन्या राशि) में सूर्य]
आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व-
शक्ति में वृद्धि होती है। स्त्री-पक्ष से परेशानी तथा
व्यवसाय में कठिनाइयां भी रहती हैं। बाहरी सम्बन्धों
से कुछ लाभ होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से
कठिन परिश्रम द्वारा धन का संचय होता है तथा
कौटुम्बिक सुख भी प्राप्त होता है।
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कुम्भ लग्न : नवमभाव : सूर्य
[चित्र १२८४ : कुम्भ लग्न, नवम भाव (तुला राशि) में सूर्य]
नवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित
नीच के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म
में कुछ कमी आती है। स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में भी
कठिनाइयां रहती हैं। वह स्वार्थ-सिद्धि के लिए उचित-
अनुचित का विचार भी नहीं करता।
सातवीं मित्र तथा उच्च-दृष्टि से तृतीय भाव को
देखने से भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में विशेष
वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, पराक्रमी
तथा धैर्यवान् होता है।
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कुम्भ लग्न : दशमभाव : सूर्य
[चित्र १२८५ : कुम्भ लग्न, दशम भाव (वृश्चिक राशि) में सूर्य]
दसवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा
व्यवसाय-पक्ष से लाभ होता है। स्त्री-पक्ष से भी
श्रेष्ठ शक्ति मिलती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने
माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी रहती है।
५१५
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कुम्भ लग्न : एकादशभाव : सूर्य
ग्यारहवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को व्यवसाय द्वारा
अच्छी आमदनी होती है तथा स्त्री-पक्ष से विशेष लाभ
होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से पंचम भाव को देखने से
विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के पक्ष में भी विशेष उन्नति
होती है तथा सुख मिलता है।
१२२६
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कुम्भ लग्न : द्वादशभाव : सूर्य
बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को खर्च अधिक रहने के
कारण कठिनाई उठानी पड़ती है। बाहरी संबंधों से
लाभ तथा स्थानीय व्यवसाय से हानि की प्राप्ति
होती है। स्त्री-सुख में भी बहुत कमी आती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से
शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा झगड़े के मामलों से
लाभ होता है
१२२७
'कुम्भ' लग्न में 'चन्द्रमा'
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
कुम्भ लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र
पहले भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक का शरीर अस्वस्थ तथा
मन चिन्तित रहता है, परन्तु वह शत्रुओं पर प्रभाव
डालने तथा झगड़ों में विजय पाने में सफल रहता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से
स्त्री से कुछ मतभेद रहता है तथा दैनिक व्यवसाय
के क्षेत्र में भी चिन्ताएँ तथा कठिनाइयां बनी
रहती हैं।
१२२८
५१६
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
कुम्भ लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र
दूसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक परिश्रमपूर्वक धन का
संचय करता है तथा कौटुम्बिक सुख की वृद्धि भी
होती है। शत्रु-पक्ष से परेशानी रहने पर भी झगड़े के
मामलों से लाभ उठाता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से
आयु तथा पुरातत्त्व के सम्बन्ध में कुछ परेशानी
रहती है।
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
कुम्भ लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र
तीसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के मनोबल
तथा पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से
कुछ मतभेद भी रहता है।
सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से नवम भाव
को देखने से भाग्योन्नति तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ
कठिनाइयों के बाद वृद्धि होती है।
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
कुम्भ लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र
चौथे भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि
पर स्थित उच्च के चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को
माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है।
शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा झगड़े के मामलों से
लाभ भी उठाता है।
सातवीं मित्र तथा नीचदृष्टि से दशम भाव को
देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में
कठिनाइयां आती हैं।
५१७
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
कुम्भ लग्न : पंचमभाव : चन्द्र
पाँचवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं
सन्तान के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता
मिलती है तथा शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बना रहता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव को देखने से
कुछ कठिनाइयों के साथ आमदनी की वृद्धि होती है
तथा गुप्त युक्तियों के बल पर लाभ उठाता है।
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
कुम्भ लग्न : षष्ठभाव : चन्द्र
छठे भाव में स्वराशि-स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव
से जातक शत्रु-पक्ष पर अत्यधिक प्रभाव रखता है तथा
झगड़े के मामलों में सफलता भी प्राप्त करता है, परन्तु
मन में चिन्ताएँ भी रहती हैं।
सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च
में कठिनाई रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी परेशानी
मिलती है।
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
कुम्भ लग्न : सप्तमभाव : चन्द्र
सातवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष में रोग आदि
की परेशानी रहती है। व्यवसाय-क्षेत्र में कठिनाइयों के
बाद ही सफलता मिलती है। शत्रु-पक्ष पर भी प्रभाव
रहता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से
शरीर रोगों एवं चिन्ताओं का शिकार रहता है। फिर
भी मनोबल में वृद्धि होती है।