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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 638 में से

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'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
कर्क लग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में स्वराशिस्थ मंगल के प्रभाव से
जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का यथेष्ट लाभ
होता है। चौथी शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से कुछ असन्तोष के साथ पुरातत्त्व एवं आयु का लाभ
होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने
से लाभ-प्राप्ति के लिए दिमागी परिश्रम अधिक करना
पड़ता है तथा आठवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को
देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से
यश-धन की प्राप्ति होती रहती है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
कर्क लग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
मंगल के प्रभाव से जातक की शत्रु पक्ष में विजय
मिलती है तथा विद्या-बुद्धि एवं सन्तान का भी श्रेष्ठ
लाभ होता है। चौथी मित्र-दृष्टि से नवमभाव को
देखने से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने
से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा
खर्च अधिक रहता है। आठवीं नीच-दृष्टि से प्रथम भाव
को देखने से शारीरिक सुख, सौन्दर्य, स्वास्थ्य तथा शान्ति में कुछ कमी बनी रहती है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
कर्क लग्न : सप्तमभाव : मंगल
सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित
उच्च के मंगल के प्रभाव से जातक की अनेक सुन्दर
स्त्रियों का लाभ होता है परन्तु उनसे कुछ मतभेद
भी रहता है। व्यवसाय में विशेष सफलता मिलती है
तथा विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का पक्ष भी अच्छा
रहता है।
चौथी दृष्टि से स्वराशि में दशमभाव को
देखने से पिता तथा राज्य से सुख, लाभ एवं सम्मान
मिलता है : सातवीं नीच दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक स्वास्थ्य एवं
सौन्दर्य में कमी रहती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-संचय
खूब होता है तथा वाणी भी प्रभावशालिनी होती है।