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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 638 में से

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'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वितीयभाव : मंगल
दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित
मंगल के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का
सुख मिलता है। राज्य तथा पिता से भी लाभ होता
है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में पञ्चमभाव को देखने
से विद्या तथा सन्तान की शक्ति मिलने पर भी कुछ
कठिनाइयों का अनुभव होता रहता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
आयु तथा पुरातत्व के क्षेत्र में कमी आती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को
देखने के कारण भाग्य, यश तथा धर्म की वृद्धि होती है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
कर्क लग्न : तृतीयभाव : मंगल
तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
मंगल के प्रभाव से जातक के पराक्रम तथा भाई-बहिन
के सुख में वृद्धि होती है। विद्या तथा सन्तान का लाभ
भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने
से जातक बुद्धि-बल से भाग्यशाली होता है तथा यश
एवं धर्म का लाभ करता है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि
में दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय
के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। चौथी मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष
पर प्रभाव स्थापित होता है तथा विजय मिलती है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
कर्क लग्न : चतुर्थभाव : मंगल
चौथे भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की माता, भूमि एवं
भवन का सुख मिलता है। विद्या-बुद्धि तथा सन्तान के
क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। उच्च दृष्टि से सप्तम-
भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय का अच्छा लाभ
होता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि के दशमभाव को
देखने के राज्य, पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख,
सहयोग तथा यश का लाभ होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से
धन की भी पर्याप्त आमदनी बनी रहती है।