सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

तथा हि—
बहूनामल्पसाराणां समवायो ( १ ) दुरत्ययः ।
तृणैर्विधीयते रज्जुर्बध्यन्ते तेन दन्तिनः ॥ १४५ ॥
और—अल्प बल वाले बहुतों का संगठित होना कठिनता से वश में आ
सकने वाला बन जाता है । रस्सी तिनकों से बनायी जाती है किंतु उससे दंतैल
हाथी बांध लिये जाते हैं ।
ततो विलासवती नाम वेश्या तं प्राह—
तद्देवांस्य परं मित्रं यत्र सङ्क्रामति द्वयम् ।
दृष्टे सुखं च दुःखं च प्रतिच्छायेव दर्पणे ॥
दयित, मयि विद्यमानायां किं ते राज्ञा, किं वा राजदत्तेन वित्तेन
कार्यम् । सुखेन निःशङ्कं तिष्ठ मद्गृहान्तः कुहरे' इति । ततः कालि-
दासस्तत्रैव वसन्कतिपयदिनानि गमयामास ।
तब विलासवती नाम की वेश्या ने उससे कहा—
'जैसे दर्पण में प्रतिविम्ब संक्रामित हो जाता है, वैसे ही सुख और दुःख—
दोनों जिसमें संक्रामित हो जायें, वही सबसे बड़ा मित्र होता है । ( मित्र सुख-
दुःख—दोनों का समान अनुभव करने वाला ही होता है । )
स्वामी, मेरे रहते क्या काम तुम्हें राजा से और क्या लेना तुम्हें राजा के
धन से ? मेरे घर के गुप्त आगार में सुख पूर्वक शंका त्याग कर रहो ।'
सो वहीं रहते कालिदास ने कुछ दिन बिता दिये ।
ततः कालिदासे गृहान्निर्गते राजानं लीलादेवी प्राह—'देव, कालि-
दासकविना साकं नितान्तं निविडतमा मैत्री । तदिदानीमनुचितं
कस्मात्कृतं यस्य देशेऽप्यवस्थानं निषिद्धम् ।
इक्षोरग्रात्क्रमशः पर्वणि पर्वणि यथा रसविशेषः ।
तद्वत्सज्जनमैत्री विपरीतानां च विपरीता ॥ १४७ ॥
शोकारातिपरित्राणं प्रीतिविस्रम्भभाजनम् ।
केन रत्नमिदं सृष्टं मित्रमित्यक्षरद्वयम् ॥ १४८ ॥
( १ ) अत्येतुमशक्यः ।
५ भोज०

६६ भोजप्रबन्धः

तदनन्तर कालिदास के घर से चले जाने पर राजा से लीला देवी ने कहा-
'महाराज, कालिदास के साथ आपकी बहुत घनी मित्रता है। सो इस सम
किस लिए उसका देश में रहना भी आपने अनुचित रूप से निषिद्ध कर दिया
जैसे गन्ने की फुलची ( ऊपरी भाग ) से क्रमशः नीचे के पोरों में र
( मिठास ) बढ़ता जाता है, वैसे ही सज्जनों की मित्रता क्षण-क्षण बढ़
जाती है और सज्जनों के विपरीत, जो दुर्जन हैं, उनकी इससे विपरी
घटती है।
शोक रूपी शत्रु से त्राण दिलाने वाले, प्रेम और विश्वास के पात्र दो अक्ष
के रत्न 'मित्र' की सृष्टि किसने की है ?'
राजाप्येतल्लीलादेवीवचनमाकर्ण्य प्राह - 'देवि, केनापि ममेत्यभि
धायि यत्कालिदासो दासीवेषेणान्तःपुरमासाद्य देव्या सह रमते' इति
मया चैतद्व्यापारजिज्ञासया कपटज्वरेणायं भवती च वीक्षितौ । तत
समीपवर्तिन्यामपि त्वय्युत्तरार्धमित्थं प्राह। तच्चाकर्ण्य त्वयापि कृतं
हासः। ततश्च सर्वमेतद्दृष्ट्वा ब्राह्मणहननभीरुणा मया देशान्निःसा
रितः। त्वां च न दाक्षिण्येन हन्मि' इति ।
लीलादेवी के ऐसे वचन सुनकर राजा ने भी कहा-'रानी किसी ने मुझ
यह कहा कि कालिदास दासी वेष में रनिवास में पहुँचकर रानी के साथ रम
करता है। मैंने इस बात को जानने की आकांक्षा से ज्वर का बहाना कर
उसे और आपको देखा। तब तुम्हारे निकट में उपस्थित रहने पर भी उस
ऐसा श्लोक का उत्तरार्द्ध पढ़ा। और उसे सुनकर तुम भी मुस्कुरा दीं। त
यह सब देखकर ब्राह्मण वध के डर से मैंने उसे देश से निकाल दिया, औ
तुम्हें मैं उदारता के कारण नहीं मार रहा हूँ।'
ततो हासपरा देवी चमत्कृता प्राह - 'निःशङ्कं देव, अहमे
धन्या यस्यास्त्वं पतिरीदृशः । यत्त्वया भुक्तशीलाया मम मनः कथमन्तः
गच्छति । यतः सर्वकामिनीभिरपि कान्तोपभोगे स्मर्तव्योऽसि । अहा
देव, त्वं यदि मां सतीमसतीं वा कृत्वा गमिष्यसि, तर्ह्यहं सर्वथा मरिष्ये
इति । ततो राजापि 'प्रिये, सत्यं वदसि' इति । ततः स नृपतिः पुरुषै
रहिमानयामास। तप्तं लोहगोलकं कारयामास। धनुश्च सज्जं चक्रे ।

भोजप्रबन्धः ६७
तदनन्तर हँसती हुई रानी आश्चर्य में पड़कर बोली-महाराज, निःसन्देह
मैं धन्य हूँ, जिसके आप ऐसे पति हैं। आपके द्वारा भोगी जाने वाली मेरा मन
और कहीं कैसे जायेगा, क्योंकि आप तो प्रियोपभोग काल में सभी कामिनियों
द्वारा स्मरण किये जाने योग्य हैं ? हाय महाराज, यदि आप मुझ सती को
असती ठहरा कर चले जायेंगे तो फिर मैं मर ही जाऊँगी।' तब राजा ने भी
कहा—'प्रिये, तुम सच कहती हो।' तत्पश्चात् राजा ने सेवकों से सर्प मँगवाया,
लोहे का गोला गर्म करवाया और धनुष को चढ़ाकर रखा :
ततो देवी स्नाता निजपातिव्रत्यानलेन देदीप्यमाना सुकुमारगात्री
सूर्यमवलोक्य प्राह-'जगच्चक्षुस्त्वं सर्वं वेत्सि ।
जाग्रति स्वप्नकाले च सुषुप्तौ यदि मे पतिः ।
भोज एव परं नान्यो मच्चित्ते भावितोऽस्ति न ॥ १४६ ॥
इत्युक्त्वा ततो दिव्यत्रयं चक्रे । ततः शुद्धायामन्तःपुरे लीलावत्यां
लज्जानतशिरा नृपतिः पश्चात्तापात्पुरः 'देवि, क्षमस्व पापिष्ठं माम् । किं
वदामि' इति कथयामास ।
तदनंतर स्नान करके अपने पतिव्रत रूपी अग्नि से दीप्त होती सुकुमार
शरीरवाली रानी सूर्य को देखकर बोली-, जगत् के नेत्र आप सब जानते हो ।
जागते, स्वप्न देखते अथवा सोते समय यदि भोज ही मेरे पति हैं, तो
किसी अन्य का विचार भी मैंने किया है या नहीं-यह स्पष्ट करो।'
ऐसा कहके उसने तीनों प्रकार की परिक्षाएँ दीं। तब अंतःपुर में
देवी लीलावती को शुद्ध प्रमाणित पा लाज से सिर झुकाये, पछताता हुआ
राजा बोला- 'देवि, मुझ पापी को क्षमा करो। क्या कहूँ ?'
राजा च तदाप्रभृति न निद्राति, न च भुङ्क्ते, न केनचिद्वक्ति ।
केवलमुद्विग्नमनाः स्थित्वा दिवानिशं प्रलपति- 'किं नाम मम लज्जा,
किं नाम दाक्षिण्यम्, क्व गाम्भीर्यम् । हा हा कवे, कविकोटिमुकुटमणे,
कालिदास, हा हा मम प्राणसम हा । मूर्खेण किमश्राव्यं श्रावितोऽसि ।
अवाच्यमुक्तोऽसि' इति प्रसुप्त इव ग्रहग्रस्त इव, मायाविध्वस्त इव, पपात ।
ततः प्रियाकरकमलसिक्तजलसञ्जातसंज्ञः कथमपि तामेव प्रियां वीक्ष्य
स्वात्मनिन्दापरः परमतिष्ठत् ।

६८ भोजप्रबन्धः

तब से राजा न सोता था, न भोजन करता था और न किसी से बोलता
ही था । उन्मन हो बैठ कर केवल दिन रात विलाप करता था—'मुझे कैसी
लज्जा, कैसी मेरी उदारता और कहां मेरी गंभीरता ? हाय, कवि, कवियों
के मुकुटमणि, कालिदास, मेरे प्राण-तुल्य, हाय ! मुझ मूर्ख ने तुम्हें क्या न
सुनने योग्य सुनाया, अकथनीय कहा ?' इस प्रकार सोया हुआ जैसा, ग्रह
गृहीत जैसा, माया से विनष्ट जैसा गिर पड़ता । तब फिर प्रिय रानी के
कर-कमलों द्वारा छिड़के गये जल से सुधि पाकर और उसी प्रिया को देखकर
अपनी निंदा करता हुआ किसी प्रकार चला रहा था ।
ततो निशानाथहीनेव निशा, दिनकरहीनेव दिनश्रीः, वियोगिनीव
योषित्, शक्ररहितेव सुधर्मा, न भाति भोजभूपालसभा रहिता कालि-
दासेन । तदाप्रभृति न कस्यचिन्मुखे काव्यम् । न कोऽपि विनोदसुन्दरं
वचो वक्ति ।
तब फिर जैसे रात्रि के स्वामी ( चंद्र ) से रहित रात्रि हो, दिन के
कर्त्ता ( सूर्य ) से रहित जैसे दिवसलक्ष्मी हो, जैसे कोई वियोगिनी हो, जैसे
इंद्र से रहित देव सभा हो, ऐसे ही कालिदास से रहित राजा भोज की सभा
अच्छी न लगने लगी । तब से किसी के मुख में काव्य रहा ही नहीं । कोई
विनोदपूर्ण सुन्दर वाक्य तक न बोलता था ।
ततो गतेषु केषुचिद्दिनेषु कदाचिद्राकापूर्णेन्दुमंडलं पश्यन्पुरश्च
लीलादेवीमुखेन्दुं वीक्ष्य प्राह—
'तुलणं अणुआणुसरइ ग्लौसो मुहचन्दस्स खु एदाए।'
कुत्र च पूर्णेऽपि चन्द्रमसि नेत्रविलासाः, कदा वाचो विलसितम् !
प्रातश्चोत्थितः प्रातर्विधीन्विधाय सभां प्राप्य राजा विद्वद्वरान्प्राह—'अहो
कवयः, इयं समस्या पूर्यताम् ।' ततः पठति—
( १ ) 'तुलणं अणुआणुसरइ ग्लौसो मुहचन्दस्स खु एदाए।'
पुनराह—'इयं चेत्समस्या न पूर्यते भवद्भिर्मद्देशे न स्थातव्यम्' इति ।
ततो भीतास्ते कवयः स्वानि गृहाणि जग्मुः ।
तदनंतर कुछ दिन बीतने पर कभी पूर्णिमा के पूर्ण चंद्रमंडल और संमुख
लीलादेवी के मुखचंद्र को देखकर राजाने ( एक पद ) कहा—
( १ ) तुलनामन्वन्तरति, ग्लौसो मुखचन्द्रस्य खल्वेतस्याः ।

'कभी न चंदा हो सकता है इस मुखेंदु के तुल्य ।'
पूरे चांद में भी इस जैसे नयनों के विलास कहाँ हैं और कब होता है
ऐसा वाणी विलास ! तत्पश्चात् प्रातः उठ कर और प्रातः कृत्य समाप्त करके
सभा में पहुँच राजा विद्वद्वरों से बोला—'हे कविजन, इस समस्या की पूर्ति
करो,' और पढ़ा—
'कभी न चंदा हो सकता है इस मुखेंदु के तुल्य ।'
फिर कहा—'यदि आप इस समस्या की पूर्ति नहीं कर सकते, तो मेरे
देश में रहना उचित नहीं है।' तब डरे हुए वे कवि अपने-अपने घर गये।
चिरं विचारितेऽप्यर्थे कस्यापि नार्थसङ्गतिः स्फुरति। ततः सर्वैर्मिलित्वा
बाणः प्रेषितः। ततः सभां प्राप्याह राजानम्—'देव, सर्वैर्विद्वद्भि रहं प्रेषितः।
अष्टवासरानावधिमभिधेहि । नवमेऽह्नि पूरयिष्यन्ति ते । न चेद्देशान्नि-
र्गच्छन्ति ।' ततो राजा 'अस्तु' इत्याह । ततो बाणस्तेषां विज्ञाप्य राज-
सन्देशं स्वगृह्मगात् । ततोऽष्टौ दिवसा अतीताः । अष्टमदिनरात्रौ मिलि-
तेषु कविषु बाणः प्राह--'अहो तारुण्यमदेन राजसंमानप्रमादेन किञ्चि-
द्विद्यामदेन कालिदासो निःसारितोऽभवत् । समे भवन्तः सर्व एव कवयः।
विषमे स्थाने तु स एक एव कविः । तं निःसार्येदानीं किं नाम महत्त्व-
मासीत् । स्थिते तस्मिन् कथमियमवस्थास्माकं भवेत् । तन्निःसारे या या
बुद्धिः कृता सा भवद्भिरेवानुभूयते ।
सामान्यविप्रविद्वेषे कुलनाशो भवेत्किल ।
उमारूपस्य विद्वेषे नाशः कविकुलस्य हि ॥ १५० ॥
बहुत समय तक अर्थ विचारते रहने पर भी किसी को भी अर्थ की
संगति का स्फुरण नहीं हुआ । तब सबने मिलकर बाण को भेजा वह सभा
में जाकर राजा से बोला—'महाराज, सब विद्वानों ने मुझे भेजा है। आठ
दिन का अवसर दीजिए। वे नवें दिन समस्या पूर्ति कर देंगे, अन्यथा देश से
निकल जायेंगे।' तब राजा ने कहा--'ठीक है।' तदनंतर बाण राजा का
संदेश उन्हें बताकर अपने घर चला गया । फिर आठ दिन बीत गये । आठवें
दिन की रात में उन कवियों के मिलने पर बाण ने कहा—'अरे, तरुणाई
के मद अथवा राज संमान के प्रमाद अथवा कुछ विद्या के मद के कारण
आपने कालिदास को निकलवा दिया । सहज स्थान में तो आप सभी कवि

७० भोजप्रबन्धः
हैं, विषमस्थान में तो वही एक कवि है। उसे निकलवाकर आपने अब
कौन-सी बड़ाई पा ली। उसके रहने पर हमारी यह दशा क्यों होती? उसे
निकलवाने में जो-जो बुद्धि लगायी, उसका अनुभव अब आपको ही
हो रहा है।
सामान्य ब्राह्मण से विद्वेष रखने पर निश्चय ही कुलनाश होता है।
उमा रूप ब्राह्मण द्वेष से कवि कुल का नाश होता है।
ततः सर्वे गाढं कलहायन्ते स्म मयूराद्यश्च। ततस्ते सर्वान्कलहा-
न्निवार्य सद्यः प्राहुः—‘अद्यैवावधिः पूर्णाः कालिदासमन्तरेण न कस्य-
चित्सामर्थ्यमस्ति समस्यापूरणे।
सङ्ग्रामे सुभटेन्द्राणां कवीनां कविमण्डले।
दीप्तिर्वा दीप्तिहानिर्वा मुहूर्त्तेनैव जायते॥ १५१॥
यदि रोचते ततोऽद्यैव मध्यरात्रे प्रमुदितचन्द्रमसि निगूढमेव
गच्छामः सम्पत्तिसम्भारमादाय। यद् न गम्यते श्वो राजसेवका
अस्मान् बलान्निःसारयन्ति। तदा देहमात्रेणैवास्माभिर्गन्तव्यम्। तदद्य
मध्यरात्रे गमिष्यामः।' इति सर्वे निश्चित्य गृहमागत्य बलीवर्दव्यूढेषु
शकटेषु सम्पद्धामारोप्य रात्रावेव निष्क्रान्ताः।
तदनंतर सब मयूर आदि कवि डटकर आपस में झगड़ने लगे। तब वे
सब झगड़ना छोड़कर तुरंत बोले—‘आज ही अवधि पूर्ण हुई है और
समस्यापूर्ति की सामर्थ्य कालिदास को छोड़कर किसी में भी है नहीं।
सुभटराजों की युद्ध में और कवियों की कवि मंडली में तेजोमयता अथवा
तेजो हानि मुहूर्तभर में ही हो जाती है।
सो यदि आप लोग ठीक समझें तो आज ही आधी रात को चंद्रमा
के उदित होने पर चुपचाप संपत्ति सामग्री ले करके निकल चलें। यदि नहीं
जायेंगे तो कल राज सेवक हमें बल पूर्वक निकाल बाहर करेंगे। तब फिर
हमें अपना शरीरमात्र लेकर जाना पड़ेगा। सो आज आधी रात को निकल
चलेंगे।' ऐसा निश्चय कर घर पहुँच बैलगाड़ियों पर संपत्ति सामग्री लाद-
कर सब रात को ही निकल पड़े।
ततः कालिदासस्तत्रैव रात्रौ विलासवतीसदनोद्याने वसन् पथि
गच्छतां तेषां गिरं श्रुत्वा वेश्याचेटीं प्रेषितवान्—‘प्रिये, पश्य क एते

गच्छन्ति ब्राह्मणा इव।' ततः सा समेत्य सर्वानपश्यत् । उपेत्य च
कालिदासं प्राह--
एकेन राजहंसेन या शोभा सरसोऽभवत् ।
न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना ॥ १५२ ॥
सर्वे च बाणमयूरप्रमुखाःपलायन्ते, नात्र संशयः' इति । कालिदासः-
'प्रिये, वेगेन वासांसि भवनादानय, यथा पलायमानान्विप्रान्रक्षामि ।
किं पौरुषं रक्षति यो न (१) वार्तान किं वा धनं नार्थिजनाय यत्स्यात् ।
सा किं क्रिया या न (२) हितानुबद्धा किं जीवितं साधुविरोधि यद्वै ॥१५३॥
तब कालिदास रात में वहीं विलासवती की गृहवाटिका में रह रहा था,
उसने रास्ते में जाते उन सब कवियों की बातचीत सुनकर वेश्या की दासी
को भेजा--'प्रिये, ये कौन ब्राह्मण जैसे जा रहे हैं?' तब उसने जाकर सबको
देखा और कालिदास के पास पहुँचकर कहा--
एक राजहंस से सरोवर की जैसी शोभा होती है वैसी चारों ओर तीर
पर एकत्र सहस्रों बगुलों से नहीं ।
सब बाण, मयूर आदि कवि भागे जा रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं ।
कालिदास ने कहा--'प्रिये, शीघ्रतया घर से वस्त्र लेकर आओ कि इन भागे
जाते विप्रों की रक्षा कर सकूँ ।
जो दुःखियों की रक्षा न करे, वह पौरुष कैसा और जो याचकों के काम न
आ सके, वह धन कैसा ? वह कर्म भी क्या, जिससे हित न हो सके और उस
जीवन से क्या लाभ, जिससे सज्जन-विरोध हो ?'
ततः स कालिदासश्चारणवेषं विधाय खड्गमुद्वहन्क्रोशाधमुत्तरं गत्वा
तेषामभिमुखमागत्य सर्वान्निरूप्य 'जय' इत्याशीर्वचनमुदीर्य पप्रच्छ चार-
णभाषया - 'अहो विद्यावारिधयः, भोजसभायां सम्प्राप्तमहत्त्वातिशयाः,
बृहस्पतय इव सम्भूय कुत्र जिगमिषवो भवन्तः । कच्चित्कुशलं वः । राजा
च कुशली। अस्माभिः काशोदेशादागम्यते भोजदर्शनाय वित्तस्पृहया च ।
तब कालिदास ने चारण का वेष बना, खड्ग-धारण कर आधे कोस
उत्तर जा, उनके संमुख पहुँच कर सबको देखा और 'जय' यह आशीर्वचन
( १ ) वा आर्तान् इति च्छेदः । ( २ ) या हितं नानुवध्नाति ।

७२ भोजप्रबन्धः
कह कर चारणों की भाषा में पूछा—'हे विद्या के सागर विद्वानो, भोज की
सभा में अतिशय महत्त्व पा वृहस्पति के समान होकर आप लोग कहाँ जाने
की इच्छा कर रहे हैं ? आप लोग सकुशल हैं न ? राजा भी कुशल पूर्वक
है ! हम भी भोज के दर्शन और धन की आकांक्षा से काशी-देश से आ रहे हैं।'
ततः परिहासं कुर्वन्तः सर्वे निष्क्रान्ताः । ततस्तेषु कश्चित्तद्गिरमा-
कर्ण्य तं च चारणं मन्यमानः कुतूहलेन विपश्चित्प्राह—'अहो चारण'
शृणु । 'त्वया पश्चादपि श्रोष्यत एव । अतो मयाद्यैवोच्यते । राजा किलैभ्यो
विद्वद्भ्यः पूरणाय समस्योक्ता । तत्पूरणाशक्ताः कुपितराज्ञो भयाद्देशा-
न्तरे क्वचिज्जिगमिषव एते निष्चक्रमुः' ।
तब वे सब परिहास करते हुए चले गये, परंतु उनमें से कोई एक विद्वान्
उसके वचन सुनकर उसे चारण मानता हुआ कुतूहल पूर्वक बोला—'अरे
चारण, सुनो । तुम को बाद में तो सुनना ही होगा, इसलिए मैं आज ही
कहे देता हूँ । राजा ने पूर्ति के निमित्त इन विद्वानों से एक समस्या कही ।
उसकी पूर्ति में असमर्थ ये क्रुद्ध राजा के डर से कहीं दूसरे देश में जाने की
इच्छा से निकल पड़े हैं ।
चारणः—'राज्ञा का वा समस्या प्रोक्ता ।
ततः पठति स विपश्चित्—
'तुलणं अण अणुसरइ ग्लौसो मुहचन्दस्स खु एढ़ाए।'
चारणः—'एतत् साध्वेव गूढार्थम् । एतत्पूर्णेन्दुमण्डलं वीक्ष्य राज्ञापाठि।
एतस्योत्तरार्धमिदं भवितुमर्हति—
'अणु इति वण्णयदि कहं अणुकिति तस्स प्पडिपदि चन्दस ॥'
सर्वे श्रुत्वा चमत्कृताः । ततश्चारणः सर्वान्प्रणिपत्य निर्ययौ ।
चारण ने पूछा—'राजा ने कौन सी समस्या कही ?' तब उस विद्वान् ने
पढ़ा—'कभी न चंदा हो सकता है इस मुखेंदु के तुल्य ।' चारण—इसका
गूढ़ अर्थ ठीक ही है । राजा ने पूर्ण चंद्र-मंडल देख कर इसे पढ़ा । इसका
उत्तरार्द्ध यह होना उचित है :—
'प्रति पद को प्रतिक्षीण चंद्रमा—नहीं सुमुखि-—मुख तुल्य ।' सुनकर सब-
चमत्कृत हो गये । फिर चारण सबको प्रणाम करके चला गया ।

भोजप्रबन्धः ७३
ततः सर्वे विचारयन्ति स्म-अहो, इयं साक्षात्सरस्वती पुंरूपेण
सर्वेषामस्माकं परित्राणायागता । नायं भवितुमर्हतिमर्त्यः । अद्यापि
किमपि केनापि न ज्ञायते। ततः शीघ्रमेव गृहमासाद्य शकटेभ्यो भारमुत्तार्य
प्रातः सर्वैरपि राजभवनमागन्तव्यम् । न चेच्चारण एव निवेदयिष्यति ।
ततो झदिति गच्छाम।' इति योजयित्वा तथा चक्रुः ।
तब वे सब विचारने लगे--'अहो, यह साक्षात् सरस्वती ही पुरुष रूप में
हमारी रक्षा के लिए आयी थी । यह मनुष्य नहीं हो सकता । अभी तक
किसी को कुछ भी नहीं मालूम हुआ है । सो शीघ्र ही घर पहुँच और गाड़ियों
से समान उतार कर प्रभात में सबको राज भवन में पहुँचना ठीक होगा,
अन्यथा चारण ही निवेदन कर देगा । सो झट चल देते हैं।' ऐसी योजना
बनाकर उन्होंने उसी के अनुसार किया ।
ततो राजसभां गत्वा राजानमालोक्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा विविशुः ।
ततो बाणः प्राह--'देव, सर्वज्ञेन यत्त्वया पठ्यते तदीश्वर एव वेद ।
केऽमी वराका उदरम्भरयो द्विजाः ।
तथाप्युच्यते-
तुलणं (१) अणु अणुसरइ ग्लोसो मुहचन्दस्स खु एदाए ।
अणु इंदि वण्णयदि कहं अणुकितिं तस्सप्पडिवदि चन्दस्स ॥१५४॥
तदनन्तर वे राजा सभा में जाकर राजा को देख 'स्वस्ति' ऐसा कह कर
बैठ गये । तब बाण बोला--'महाराज, सर्वज्ञ आपके द्वारा जो पढ़ा गया,
उसे तो ईश्वर ही जानता है, हम बेचारे पेट भरू ब्राह्मणों की तो गणना ही
क्या ? तथापि निवेदन है--
'कभी न हो सकता है चंदा इस मुखेंदु के तुल्य ।
प्रतिपद को प्रतिक्षीण चंद्रमा--नहीं सुमुखि, मुख तुल्य ।'
राजा यथाव्यवसितस्याभिप्रायं विदित्वा 'सर्वथा कालिदासो दिवसप्रा-
प्यस्थाने निवसति । उपायैश्च सर्वं साध्यम्' इत्याह । ततो बाणाय रु-
क्माणां पञ्चदशलक्षाणि प्रादात् । सन्तोषमिषेणैव विद्वद्वृन्दं स्वं स्वं
सदनं प्रेषितम् ।
(१) तुलनामन्वनुसरति ग्लोसो मुखचन्द्रस्य खल्वेतस्याः ।
अन्विति वर्ण्यते कथमनुकृतिस्तस्य प्रतिपदि चन्द्रस्य ॥ इति च्छाया।

७४ भोजप्रबन्धः
गते च विद्वन्मण्डले शनैर्द्वारपालायादिष्टं राज्ञा-'यदि केचिद्विज-
न्मान आयास्यन्ति तदा गृहमध्यमानेतव्याः ।'
राजा ने यथोचित अभिप्राय जान कर सोचा--'निश्चय ही कालिदास
एक दिन की पहुँच के स्थान पर है। उपायों से सब सिद्ध हो सकता है।'
तत्पश्चात् बाण को पंद्रह लाख के स्वर्ण भूषण दिये और संतोष प्रकट करते
हुए विद्वत्-समाज को अपने-अपने घर भेज दिया । विद्वानों की मंडली के चले
जाने पर धीरे से राजा ने द्वारपाल को आदेश दिया--'यदि कोई ब्राह्मण
आये तो उसे महल में ले आना ।'
ततः सर्वमपि वित्तमादाय स्वगृहं गते वाणे केचित्पण्डिता आहुः-
'अहो, वाणेनानुचितं व्यवधायि । यदसावप्यस्माभिः सह नगरान्नि-
ष्क्रान्तोऽपि सर्वमेव धनं गृहीतवान् । सर्वथा भोजस्य वाणस्वरूपं
ज्ञापयिष्यामः । यथा कोऽपि नान्यायं विधत्ते विद्वत्सु ।' ततस्ते राजा-
नमासाद्य ददृशुः । राजा तान्प्राह-'एतत्स्वरूपं ज्ञातमेव । भवद्भैर्यथा-
र्थतया वाच्यम् ।' ततस्तैः सर्वमेव निवेदितम् ।
तत्पश्चात् समग्र धन लेकर वाण के अपने घर चले जाने पर कुछ पंडित
बोले--'अरे, वाण ने अनुचित किया कि नगर से तो हमारे साथ ही निकला
पर समग्र धन स्वयं ले लिया । भोज को वाण का सच्चा रूप हम ज्ञापित
करेंगे, जिससे कि फिर कोई विद्वानों के साथ अन्याय न करे।' फिर वे राजा
के पास पहुँचे और निवेदन किया । राजा ने उनसे कहा-यह तो जानता ही
था, आप ठीक-ठीक सब बता दीजिए ।' सो उन्होंने सब कुछ बता दिया ।
ततो राजाविचारितवान्-'सर्वथाकालिदासश्चारणवेषेण मद्भया-
न्मदीयनगरमध्य आस्ते ।' ततश्चाङ्गरक्षकानादिदेश-'अहो, पलाय्यन्तां
तुरङ्गाः ।'
ततः क्रीडोद्यानप्रयाणे पटहध्वनिरभवत्-'अहो, इदानीं राजा देव-
पूजाव्यग्र इति शुश्रुमः । पुनरिदानीं क्रीडोद्यानं गमिष्यति' इति
व्याकुलाः सर्वे भटाः सम्भूय पश्चाद्यान्ति । ततो राजा तैर्विद्वद्भिः
सहाश्वमारुह्य रात्रौ यत्र चारणप्रसङ्गः समजनि, तत्प्रदेशं प्राप्तः ।
तब राजा ने विचारा--'निश्चय ही कालिदास मेरे भय के कारण चारण
के वेष में नगर में ही हैं।' और फिर उसने अङ्ग रक्षकों को आज्ञा दी--

भोजप्रबन्धः ७५
'घोड़े दौड़ाओ।' तत्पश्चात् क्रीड़ा-उद्यान जाने के समय से संबद्ध नगाड़े का
घोष हुआ- 'इस समय राजा देव-पूजा में व्यग्र हैं, ऐसा सुनते हैं कि पुनः
अभी क्रीडा-उद्यान में जायेंगे, सो एकत्र हो सभी भट अनुगमनार्थ प्रस्तुत हो
गये। तब राजा विद्वानों के साथ घोड़े पर चढ़ कर उस प्रदेश में पहुँचा, जहाँ
रात्रि को चारण की घटना हुई थी।
ततो राजा चरतां चौराणां पदज्ञाननिपुणानाहूय प्राह- 'अनेन
वर्त्मना यः कोऽपि रात्रौ निर्गतस्तस्य पदान्यद्यापि दृश्यन्ते, तानि
पश्यन्तु' इति। ततो राजा प्रतिपण्डितं लक्षं दत्त्वा तान्प्रेषयित्वा च
स्वभवनमगात्। ते च पदज्ञा राजाज्ञया सर्वतश्चरन्तोऽपि तमन्वेक्ष-
माणा विमूढा इवासन्।
तब राजा ने चोरों के आने-जाने से बने पैरों के चिह्नों की पहिचान
करने में निपुण व्यक्तियों को बुलाकर कहा- 'इस मार्ग से कोई रात में गया
है, उसके पैरों के चिह्न आज भी दीख रहे हैं, उन्हें खोजो।' राजा ने प्रत्येक
पंडित को लाख-लाख दिया उन्हें भेज कर अपने महल को लौट गया। वे पद-
चिह्न-ज्ञानी व्यक्ति राजा की आज्ञा से सब ओर घूमघाम कर भी पद-चिह्न
वाले व्यक्ति को न ढूँढ पाये और मूर्ख बन बैठे।
ततश्च लम्बमाने सवितरि कामपि दासीमेकं पदत्राणं त्रुटितमादाय
चर्मकारवेश्म गच्छन्तीं दृष्ट्वा तुष्टा इवासन्। ततस्तत्पदत्राणं तया
चर्मकारकरे न्यस्तं वीक्ष्य तैश्च तस्याः करान्मिषेणादाय रेणुपूर्णे पथि
मुक्त्वा तदेव पदं तस्येति ज्ञात्वा तां च दासीं क्रमेण, वेश्याभवनं विश-
न्तीं वीक्ष्य तस्या मन्दिरं परितो वेष्टयामासुः। ततश्च तैः क्षणेन (१)
भोजश्रवणपथविषयमभिज्ञानवार्ता प्रापिता। ततो राजा सपरैः सामात्यः
पद्भ्यामेव विलासवतीभवनमगात्।
फिर वे सूरज-ढले एक दासी को एक फटा जूता लेकर चमार के घर
जाती हुई देखकर कुछ प्रसन्न हुए। उस जूते को उसके द्वारा चमार के हाथ
में रखा देख उन्होंने बहाने से उसके हाथ से उसे लिया और धूल भरे रास्ते में
छोड़ कर और (इस प्रकार उसकी छाप से) समझ लिया कि वह पद चिह्न
(१) भोजप्रतीत्यर्थः ।

इसी (जूते के स्वामी का है और यथा क्रम दासी को वेश्या के घर में घुसती
देखकर उस (वेश्या गृह) आवास को चारों से घेर लिया। फिर क्षण भर में
उन्होंने राजा भोज के कानों तक इस जान कारी का समाचार भेज दिया।
तब राजा पुरवासियों और मंत्रियों के साथ पैदल ही विलासवती के घर गया।
ततस्तच्छ्रुत्वा विलासवतीं प्राह कालिदासः—'प्रिये, मत्कृते किं कष्टं
ते पश्य।' विलासवती—'सुकवे,
उपस्थिते विप्लव एव पुंसां समस्तभावः परिमीयतेऽतः ।
अवाति वायौ नहि (१) तूलराशेर्गिरेरेश्च कश्चित्प्रतिभाति भेदः ॥१५५॥
मित्रस्वजनबन्धूनां बुद्धेर्धैर्यस्य चात्मनः ।
आपन्निकषपाषाणे जनो जानाति सारताम् ॥ १५६ ॥
अप्रार्थितानि दुःखानि यथैवायान्ति देहिनः ।
सुखानि च तथा मन्ये दैन्यमत्रातिरिच्यते ॥ १५७ ॥
सुकवे, राज्ञा त्वयि मनाङ्निराकृते वचसापि मया सदेहं दासीवृन्दं
प्रदीप्तवह्रौ पतिष्यति।' कालिदासः—'प्रिये, नैवं मन्तव्यम्। मां दृष्ट्वा
विकासीकृतास्यो भोजः पादयोः पतिष्यति' इति।
फिर यह सुनकर कालिदास ने विलासवती से कहा—'प्रिये, देखो, मेरे
लिए तुम्हें कैसा कष्ट हो रहा है।' विलासवती ने कहा—'हे सुकवि,
विपत्ति के उपस्थित होने पर ही मनुष्यों के सब भावों का मूल्यांकन हो
पाता है; जब तक हवा नहीं चलती, रूई के ढेर और पहाड़ में कोई अंतर ही
नहीं मालूम होता ।
मनुष्य मित्र, स्वजन, भाई-बंधु, बुद्धि और धीरज का तथा अपना सार
आपत्ति रूपी कसौटी पर कसकर जान पाता है ।
जैसे मनुष्य के पास विना प्रार्थना किये ही दुःख आ जाते हैं, वैसे ही सुख
भी। सो इस समय दीन भाव का अनुभव अतिरेक प्रतीत होता है ।
हे सुकवि, यदि वचनों से भी राजा के द्वारा आपका थोड़ा सा भी
अनादर हुआ तो मैं सशरीर दासियों के साथ जलती आग में गिर
जाऊँगी।' कालिदास ने कहा—'प्रिये, ऐसा मत समझो। मुझे देख कर भोज
प्रसन्न वदन हो पैरों पर गिरेगा।'


(१) कार्पाससमूहस्य ।

भोजप्रबन्धः ७७

ततो वेश्यागृहं प्रविश्य भोजः कालिदासं दृष्ट्वा सम्भ्रममाश्लिष्य
पादयोः पतति । स राजा पठति च—
'गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा ।
मा भून्मनः कदाचिन्मे त्वया विरहितं कवे ॥ १५८ ॥
कालिदासस्तच्छ्रुत्वा ( १ ) व्रीडाधोमुखस्तिष्ठति । राजा च
कालिदासमुखमुन्नमय्याह—
'कालिदास कलावास दासवाच्चालितो यदि ।
राजमार्गे व्रजन्नत्र परेषां तत्र का त्रपा ॥ १५६ ॥
धन्यां विलासिनीं मन्ये कालिदासो यदेतया ।
निबद्धः स्वगुणैरेष शकुन्त इव पञ्जरे ॥ १६० ॥
तत्पश्चात् भोज वेश्या के घर में प्रविष्ट हो कालिदास को देखा और संभ्रम
के साथ के घर में प्रविष्ट हो कालिदास के पैरों में गिरा और कहा—
'चलते अथवा बैठते, जागते अथवा सोते हे कविराज, मेरा मन कभी
तुमसे वियुक्त न हो ।'
यह सुन कर कालिदास ने लाज से मुँह नीचा कर लिया । राजा ने
कालिदास का मुख ऊँचा करके कहा—
'हे कला के आवास स्थान कालिदास, यदि दास के समान राज मार्ग में
तुमने चला दिया तो इसमें औरों को लज्जा की क्या बात है ?
मैं विलासनी को धन्य मानता हूँ कि इसने अपने गुणों से कालिदास को
पिंजरे में पक्षी के समान निबद्ध कर लिया ।'
राजा नेत्रयोर्हर्षाश्रु मार्जयति कराभ्यां कालिदासस्य । ततस्तत्प्राप्ति-
प्रसन्नो राजा ब्राह्मणेभ्यः प्रत्येकं लक्षं ददौ । निजतुरगे च कालिदासमा-
रोप्य सपरिवारो निजगृहं ययौ ।
राजा ने कालिदास के नेत्रों से प्रसन्नता के आँसू पोंछे और फिर उसके
मिल जाने से प्रसन्न हो ब्राह्मणों को एक-एक लाख दिये । ओर अपने घोड़े पर
कालिदास को बैठा कर परिवार सहित अपने महलों को लौट गया ।
—:०:—
( १ ) व्रीडया-लज्जया, अवनतं मुखं यस्य स इति विग्रहः ।

७८ भोजप्रबन्धः
११- विदुषां सत्कारः-कतिपयकथा
कियत्यपि कालेऽतिक्रान्ते राजा कदाचित्सन्ध्यामालोक्य प्राह-
'परिपतति पयोनिधौ पतङ्गः'
ततो बाणः प्राह-
'सरसिरुहामुदरेषु मत्तभृङ्गः।'
ततो महेश्वरकविः--
'उपवनतरुकोटरे विहङ्गः'
ततः कालिदासः प्राह--
'युवतिजनेषु शनैःशनै (१) रनङ्गः' ॥ १६१ ॥
तुष्टो राजा लक्षं लक्षं ददौ। चतुर्थचरणस्य लक्षद्वयं ददौ।
कुछ समय व्यतीत हो जाने पर कभी राजा ने संध्याकाल को देखकर
कहा-
'गिरता हैं जल निधि में पतंग (सूर्य)।'
तब बाण ने कहा-'सरसिज-उदरों में मत्तभृंग।'
इस पर महेश्वर कवि बोला-'उपवन-तरु-कोटर में विहंग।'
अन्त में कालिदास ने कहा-'तरुणी जन में क्रम-क्रम अनंग।'
संतुष्ट राजा ने लाख-लाख मुद्राएँ दीं, चौथे चरण पर दो लाख दिये
कदाचिद्राजा बहिरुद्यानमध्ये मार्गे प्रत्यागच्छन्तं कमपि विप्रं
ददर्श । तस्य करे चर्ममयं कमण्डलुं वीक्ष्य तं चातिदरिद्रं ज्ञात्वा
मुखश्रिया विराजमानं चावलोक्य तुरङ्गं तदग्रे निधायाह- विप्र, चर्मपात्रं
किमर्थं पाणौ वहसि' इति। स च विप्रो नूनं मुखशोभया मृदूक्त्या च
भोज इति विचार्याह-- 'देव, वदान्यशिरोमणौ भोजे पृथ्वीं शासति
लोहताम्राभावः समजति । तेन चर्ममयं पात्रं वहामि, इति। राजा--
'भोजे शासति लोहताम्राभावे को हेतुः।' तदा विप्रः पठति--
अस्य श्रीभोजरोजस्य द्वयमेव सुदुर्लभम्।
शत्रूणां शृङ्खलैर्लोहं ताम्रं शासनपत्रकैः' ॥ १६२ ॥
ततस्तुष्टो राजा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ।
(१) मन्मथः ।

भोजप्रबन्धः ७६
कभी राजा ने बाहरी उद्यान के मार्ग की ओर आते किसी विप्र को
देखा। उसके हाथ में चमड़े का कमंडलु देख उसे अत्यन्त दरिद्र समझा किंतु
उसके मुख की शोभा युक्त देख घोड़ा उसके आगे खड़ा करके कहा- 'ब्राह्मण,
चमड़े का पात्र क्यों लिये हो ?' मुख की शोभा और कथन की मृदुता के
कारण यह समझ कर कि निश्चय ही यह राजा भोज है, उस ब्राह्मण ने
कहा- 'महाराज, दाता शिरोमणि भोज के धरती का शासन करते लोहे और
ताँबे का अभाव हो गया है, इससे चमड़े का पात्र रखे हुए हूँ।' राजा- 'भोज
के शासन में लोहे और ताँवे का अभाव किस कारण से हुआ ? तो ब्राह्मण
ने पढ़ा-
'दो पदार्थ अति दुर्लभ हैं श्री भोजराज के शासन में,
लोहा शत्रु-निमित्त बेड़ियों, ताम्र दान पत्रों के कारण ।'
तब संतुष्ट राजा ने प्रत्येक अक्षर पर लाख-लाख मुद्राएँ दीं।
कदाचिद् द्वारपालः प्राह- 'धारेन्द्र, दूरदेशादागतः कश्चिद्विद्वान्-
द्वारि तिष्ठति, तत्पत्नी च। तत्पुत्रः सपत्नीकः अतोऽतिपवित्रं विद्वत्कुटुम्बं
द्वारि तिष्ठति' इति । राजा- 'अहो गरीयसी शारदाप्रसादपद्धतिः ।'
तस्मिन्नवसरे गजेन्द्रपाल आगत्य राजानं प्रणम्य प्राह- 'भोजेन्द्र, सिंह-
लदेशाधीश्वरेण सपादशतं गजेन्द्राः प्रेषिताः षोडश महामणयश्च ।'
ततो वाणः प्राह-
'स्थितिः कविनामिव कुञ्जराणां स्वमन्दिरे वा नृप-मन्दिरे वा।
गृहे गृहे किं मशका इवैते भवन्ति भूपालविभूषिताङ्गाः ॥१६३॥
तभी आकर द्वार पाल बोला- 'हे धारा के स्वामी, दूर देश से आया
कोई विद्वान् उसकी पत्नी और पत्नी सहित उसका पुत्र द्वार पर उपस्थित
हैं।' राजा ने विचारा- 'अहो, शारदा देवी अत्यन्त प्रसन्न हैं।' उसी अवसर
पर गजराजों के पालक ने आकर प्रणाम करके कहा- 'महाराज भोज,
सिंहल देश के अधिराज ने सवा सौ हाथी और सोलह महामणियाँ भेजी है।'
तो वाण ने कहा-
हाथियों की भाँति ही कवियों की स्थिति होती है- अपने घर में रहें अथवा
राज मन्दिर में। परंतु हे धरती के पालक, ये अपने अंगों को सजा कर
मच्छरों की भाँति घर-घर डोलते हैं।

ततो राजा गजानवलोकनाय बहिरगात् । ततस्तद्विद्वत्कुटुम्बं वीक्ष्य
चोलपण्डितो राज्ञः प्रियोऽहमिति गर्वं दधार । यन्मया राजभवनमध्यं
गम्यते । विद्वत्कुटुम्बं तु द्वारपालज्ञापितमपि बहिरास्ते । तदा राजा
तच्चेतसि गर्वं विदित्वा चोलपण्डितं सौधाङ्गनान्निःसारितवान्।
तब राजा हाथियों का निरीक्षण करने के लिए बाहर गया । तो उस
विद्वान् के कुटुम्ब को देख चोल पंडित को यह अभिमान हुआ कि मैं राजा का
प्यारा हूँ कि मैं राज भवन के मध्य हूँ और विद्वान् का कुटुम्ब तो द्वार पाल के
द्वारा सूचित किया जाने पर भी बाहर ही है । तब राजा ने उसके चित्त में
गर्व उत्पन्न हुआ जान चोल पंडित को प्रासाद के आँगन से निकलवा दिया ।
काशीदेशवासी कोऽपि तण्डुलदेवनामा राज्ञे 'स्वस्ति' इत्युक्त्वाति-
ष्ठत् । राजा च तं पप्रच्छ-‘सुमते, कुत्र निवासः ।' तण्डुलदेवः—
वर्तते यत्र सा वाणी कृपाणीरिक्तशाखिनः ।
श्रीमन्मालवभूपाल तत्र देशे वसाम्यहम्' ॥ १६४ ॥
तुष्टो राजा तस्मै गजेन्द्रसप्तकं ददौ ।
काशी देश का रहने वाला एक तंडुल देवनाम का कवि राजा के प्रति
'स्वस्ति' कह कर उपस्थित हुआ । राजा ने उससे पूछा-‘हे सुबुद्धि, तुम्हारा
निवास कहाँ है ? तंडुल देव-‘हे मालव धरणी के पालक, मैं उस देश की
वासी हूँ, जहाँ कृपाण के द्वारा शाखाओं का उन्मूलन होने पर भी वाणी
विद्यमान रहती है। संतुष्ट हो राजा ने उसे सात हाथी दिये ।
ततः कोऽपि विद्वानागत्य प्राह—
'तपसः सम्पदः प्राप्यास्तत्तपोऽपि न विद्यते ।
येन त्वं भोज कल्पद्रुग्दृग्गोचरमुपैष्यसि' ॥ १६५ ॥
तस्मै राजा दशगजेन्द्रान्ददौ ।
तदनन्तर एक विद्वान् ने आकर कहा—
'तप से संपत्तियाँ प्राप्त होती है, किन्तु मेरे पास वह तप भी नहीं है,
जिससे कि कल्पवृक्ष के समान भोजराज, आप दृष्टि गोचर हों ।'
राजा ने उसे दस हाथी दे दिये ।
ततः कश्चिद्वृद्धब्राह्मणपुत्रो भूम्भारवं कुर्वाणोऽभ्येति । ततः सर्वे सम्भ्रा-
न्ताः 'कथं भूम्भारवं करोषि' इति। राज्ञा स्वदृग्गोचरमानीतः पृष्टः । स प्राह-

भोजप्रबन्धः ८१ः
'देव (१) त्वद्दानपाथोधौ दारिद्र्यस्य निमज्जतः ।
न कोऽपि हि करालम्बं दत्ते मत्तेभदायक ॥ १६६ ॥
ततस्तुष्टो राजा तस्मै त्रिंशद्गजेन्द्रान्प्रादात् ।
तत्पश्चात् एक ब्राह्मण का बेटा फुक्का-फाड़ रोता आया । सभी लोग
आश्चर्य में पड़ गये कि यह क्यों फुक्का-फाड़ रो रहा है ? राजा ने अपने
संमुख बुलाया और पूछा । वह बोला—
'हे मतवाले हाथियों के दाता महाराज, आपके दान रूपी जलनिधि में
डूबते हुए दारिद्र्य को कोई हाथ का सहारा भी नहीं दे रहा है ।'
तो प्रसन्न हुए राजा ने उसे तीस गजराज दे डाले ।
ततः प्रविशति पत्नीसहितः कोऽपि विलोचना विद्वान् 'स्वस्ति' इत्यु-
क्त्वा प्राह—
'निजानपि गजान्भोजं ददानं प्रेक्ष्य पार्वती ।
गजेन्द्रवदनं(२)पुत्रं रक्षत्यद्य पुनः पुनः' ॥ १६७ ॥
ततो राजा सप्त गजांस्तस्मै ददौ ।
तदनंतर कोई नेत्र हीन पंडित पत्नी सहित आया और 'स्वस्ति' कहकर
बोला—
'अपने हाथियों को भी दे डालने के इच्छुक भोज को देखकर पार्वती
आज अपने गजराज के मुखवाले पुत्र की रक्षा बार-बार कर रही है ।'
तो राजा ने सात हाथी उसे दे दिये ।
ततो राजा विद्वत्कुटुम्बं तदैव पुरतः स्थितं वीक्ष्य ब्राह्मणं प्राह—
'क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ।'
तब राजा ने विद्वान् के कुटुम्ब को पूर्वोक्त रूप में ही सम्मुख खड़ा देख
कहा—'बड़े जनों की क्रिया सिद्धि पौरुष से होती है, न कि साधन से ।'
वृद्धद्विजः प्राह—
'घटो जन्मस्थानं मृगपरिजनों भूर्जवसनो
वने वासः कन्दान्दिकमशनमेवंविधगुणाः ।
अगस्त्यः पाथोधिं यदकृत कराम्भोजकुहरे
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे' ॥
(१) त्वद्दानसमुद्रे । (२) गजाननमिति यावत् ।
६ भोज०

८२ भोजप्रबन्धः
ततो राजा बहुमूल्यानपि षोडशमणींस्तस्मै ददौ ।
जन्म स्थान है घड़ा, परिजन मृग, भोज पत्र के वस्त्र, वास कानन में,
कंद मूल भोजन है—ऐसे साधन वाले मुनि अगस्त्य ने करसरोज के संपुट में
रखकर जलनिधि को पी डाला । बड़े जनों की क्रिया सिद्धि पौरुष से होती है न
कि साधन से । तो राजा ने बहुमूल्य सोलह मणियाँ भी उसे दे दीं ।
ततस्तत्पत्नीं प्राह राजा—'अम्ब, त्वमपि पठ ।' देवी—
'रथस्यैकं चक्रं भुजगयमिताः सप्त तुरगा
निरालम्बो मार्गश्चरणविकलः सारथिरपि ।
रविर्यात्येवान्तं प्रतिदिनमपारस्य नभसः
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे' ॥ १६६ ॥
राजा तुष्टः सप्तदश गजान्सप्त रथांश्च तस्यै ददौ ।
तत्पश्चात् राजा ने उसकी पत्नी से कहा—'माँ तुम भी पढ़ो ।' उस देवी
ने पढ़ा—
रथ का चक्का एक, सांप की रस्सी में बँधे सात घोड़े, निराधार है पंथ
चरणहीन है सारथि-रथ चालक, सूरज प्रतिदिन ही जाता है अन्त-भाग तक
विस्तृत नभ के । बड़े जनों की क्रिया सिद्धि पौरुष से होती है, न कि साधन से ।
संतुष्ट राजा ने सत्रह हाथी और सात रथ उसे दिये ।
ततो विप्रपुत्रं प्राह राजा —'विप्रसुत, त्वमपि पठ' । विप्रसुतः—
'विजेतव्या लङ्का चरणतरणीयो जलनिधि-
र्विपक्षः पौलस्त्य रणभुवि सहायाश्च कपयः ।
पदातिर्मर्त्योऽसौ सकलमवधीद्राक्षसकुलं
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ॥ १७० ॥
तुष्टो राजा विप्रसुतायाष्टादश गजेन्द्रान्प्रादात् ।
तब राजा ने ब्राह्मण पुत्र से कहा—'हे विप्रसुत, तुम भी पढ़ो। ब्राह्मण
के बेटे ने पढ़ा—
लंका नगरी जेय थी, पयोनिधि चरणों से तिरना था, प्रति पक्षी पुलस्त्य का
बेटा रावण था, संग्राम भूमि में सहायक थे बंदर, पैदल मानव राम, उन्होंने
संहारा सारा राक्षस कुल, बड़े जनों की क्रियासिद्धि पौरुष से होती है; न कि
साधन से । राजा संतुष्ट होकर ब्राह्मण पुत्र को अठारह गजराज दिये ।

भोजप्रबन्धः ८३
ततः सुकुमारमनोझनिखिलाङ्गावयवालङ्कृतां शृङ्गाररसोपजातमूर्ति-
मेव चम्पकलतामिव लावण्यगात्रयष्टिं विप्रस्नुषां वीक्ष्य 'नूनं भारत्याः
काऽपि लीलाकृतिरियम्' इति चेतसि नमस्कृत्य राजा प्राह—'मातः त्व-
मप्याशिषं वद । विप्रस्नुषा—'देव, शृणु ।
धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी चञ्चलदृशां
दृशां कोणो बाणः सुहृदपि जडात्मा हिमकरः ।
स्वयं चैकोऽ(१)नङ्गः सकलभुवनं व्याकुलयति
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ॥ १७१ ॥
चमत्कृतो राजा लीलादेवीभूषणानि सर्वाण्यादाय तस्यै ददौ । अन-
व्यांश्च सुवर्णमौक्तिकवैदूर्यप्रवालांश्च प्रददौ ।
तदनन्तर सुकुमार और मनोहर समस्त अंगों से सुशोभित, मानो
शृंगार रस की उपजात मूर्ति के सदृश चंपक की लता के समान सुन्दर देह-
यष्टि धारिणी ब्राह्मण की पुत्र वधू को देख कर और 'निश्चय ही यह वाग्देवी
की कोई लीलामयी रचना हैं' ऐसा मान मन ही मन नमस्कार करकेउससे राजा ने
कहा—'माँ, तुम भी कुछ आशीर्वचन स्वरूप कहो ।' ब्राह्मण-पुत्र-वधू ने कहा—
'महाराज, सुनिए—
फूलों का धनु, प्रत्यंचा मधुकर श्रेणी की,
चपल नयनिओं के कटाक्ष के बाण, जडात्मा चंद्र मित्र है,
स्वयम् अकेला अंगहीन यह काम सकल भुवन को है व्याकुल कर देता,
बड़े जनों की क्रिय! सिद्धि होती पौरुष से, न कि साधन से ।
चमकृत राजा ने लीला देवी के सब आभूषण लेकर उसे दे डाले और
तदनन्तर सोना, मोती, वैदूर्य ( लहसुनिया ) और मूँगे भी दिये ।
ततः कदाचित्सीमन्तनामा कविः प्राह—
'पन्थाः संहर दीर्घतां त्यज निजं तेजः कठोरं रवे
श्रीमन्विन्ध्यगिरे प्रसीद सदयं सद्यः समीपे भव ।
इत्थं दूरपलायनश्रमवतीं दृष्ट्वा निजप्रेयसीं
श्रीमन्भोज तव द्विषः प्रतिदिनं जल्पन्ति मूर्च्छन्ति च ॥ १७२ ॥
( १ ) देहरहित इति यावत् ।

८४ भोजप्रबन्धः
तत्पश्चात् कभी सीमंत नामक कवि ने कहा—
'हे मार्ग, तुम लम्बाई को त्याग दो, हे सूर्य, तुम अपने कठोर तेज को
छोड़ दो, हे श्रीमान् विन्ध्याचल, तुम प्रसन्न होकर दयापूर्वक शीघ्र ही निकट
हो जाओ'—हे राजा भोज, आपके शत्रु (डर कर) दूर भागने के कारण
थकी अपनी प्रेयसी को देखकर प्रतिदिन ऐसी बकवास करते हैं और मूर्च्छित
हो जाते हैं।'
तस्मिन्नेव क्षणे कश्चित्सुवर्णकारः प्रान्तेषु पद्मरागमणिमण्डितं
सुवर्णभाजनमादाय राज्ञः पुरो मुमोच। ततो राजा सीमन्तकविं प्राह—
'सुकवे, इदं भाजनं कामपि श्रियं दर्शयति।' ततः कविराह—
'धारेश त्वत्प्रतापेन पराभूत(१)स्त्विषांपतिः।
सुवर्णपात्रव्याजेन देव त्वामेव सेवते' ॥ १७३॥
ततस्तुष्टो राजा तदेव पात्रं मुक्ताफलैरापूर्य प्रादात्।
उसी क्षण एक सुनार ने चारों ओर पद्म राग मणि-जड़ा सोने का एक
पात्र लाकर राजा के सम्मुख रखा। तब राजा ने सीमन्त कवि से कहा—
'हे सुकवे, देखो यह वरतन कितना सुन्दर है।' तो कवि ने कहा—
'हे धारा के स्वामी, आपके प्रताप के सम्मुख हारा सूर्य सुवर्ण पात्र के
मिस हे देव, आपकी सेवा कर रहा है।'
तो संतुष्ट होकर राजा ने उसी पात्र को मोतियों से भर कर उसे दे दिया।
कदाचिद्राजा मृगया रसेन पुरः पलायमानं वराहं दृष्ट्वा स्वयमेका-
कितया दूरं वनान्तमासादितवान्। तत्र कञ्चन द्विजवरमवलोक्य प्राह—
'द्विज, कुत्र गन्तासि।'
द्विजः—'धारानगरम्।'
भोजः—'किमर्थम्।'
द्विजः—'भोजं द्रष्टुं द्रविणेच्छया। स पण्डिताय दत्ते। अहमपि मूर्खं
न याचे।
भोजः—विप्र, तर्हि त्वं विद्वान कविर्वा।
द्विजः—महाभाग, कविरहम्।
(१) सूर्यः।