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सर्वकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

भोजप्रबन्धः ७३
ततः सर्वे विचारयन्ति स्म-अहो, इयं साक्षात्सरस्वती पुंरूपेण
सर्वेषामस्माकं परित्राणायागता । नायं भवितुमर्हतिमर्त्यः । अद्यापि
किमपि केनापि न ज्ञायते। ततः शीघ्रमेव गृहमासाद्य शकटेभ्यो भारमुत्तार्य
प्रातः सर्वैरपि राजभवनमागन्तव्यम् । न चेच्चारण एव निवेदयिष्यति ।
ततो झदिति गच्छाम।' इति योजयित्वा तथा चक्रुः ।
तब वे सब विचारने लगे--'अहो, यह साक्षात् सरस्वती ही पुरुष रूप में
हमारी रक्षा के लिए आयी थी । यह मनुष्य नहीं हो सकता । अभी तक
किसी को कुछ भी नहीं मालूम हुआ है । सो शीघ्र ही घर पहुँच और गाड़ियों
से समान उतार कर प्रभात में सबको राज भवन में पहुँचना ठीक होगा,
अन्यथा चारण ही निवेदन कर देगा । सो झट चल देते हैं।' ऐसी योजना
बनाकर उन्होंने उसी के अनुसार किया ।
ततो राजसभां गत्वा राजानमालोक्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा विविशुः ।
ततो बाणः प्राह--'देव, सर्वज्ञेन यत्त्वया पठ्यते तदीश्वर एव वेद ।
केऽमी वराका उदरम्भरयो द्विजाः ।
तथाप्युच्यते-
तुलणं (१) अणु अणुसरइ ग्लोसो मुहचन्दस्स खु एदाए ।
अणु इंदि वण्णयदि कहं अणुकितिं तस्सप्पडिवदि चन्दस्स ॥१५४॥
तदनन्तर वे राजा सभा में जाकर राजा को देख 'स्वस्ति' ऐसा कह कर
बैठ गये । तब बाण बोला--'महाराज, सर्वज्ञ आपके द्वारा जो पढ़ा गया,
उसे तो ईश्वर ही जानता है, हम बेचारे पेट भरू ब्राह्मणों की तो गणना ही
क्या ? तथापि निवेदन है--
'कभी न हो सकता है चंदा इस मुखेंदु के तुल्य ।
प्रतिपद को प्रतिक्षीण चंद्रमा--नहीं सुमुखि, मुख तुल्य ।'
राजा यथाव्यवसितस्याभिप्रायं विदित्वा 'सर्वथा कालिदासो दिवसप्रा-
प्यस्थाने निवसति । उपायैश्च सर्वं साध्यम्' इत्याह । ततो बाणाय रु-
क्माणां पञ्चदशलक्षाणि प्रादात् । सन्तोषमिषेणैव विद्वद्वृन्दं स्वं स्वं
सदनं प्रेषितम् ।
(१) तुलनामन्वनुसरति ग्लोसो मुखचन्द्रस्य खल्वेतस्याः ।
अन्विति वर्ण्यते कथमनुकृतिस्तस्य प्रतिपदि चन्द्रस्य ॥ इति च्छाया।