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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 143 में से

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पृष्ठ 121

२२४ भावप्रकाशनिघण्टुः
कोचीनेल (इन्द्रगोप) एवं ग्लीसरीन के साथ छोटी इलायची का बना हुआ मद्यसारीय टिंक्चर
औषधों को सुगन्धित एवं रंजित करने के लिये बहुत व्यवहार में लाया जाता है।
छोटी इलायची का उपयोग श्वास, कास, क्षय, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, अजीर्ण, अतिसार, आध्मान
एवं उदर शूल में किया जाता है।
(१) पचन नलिका के शिथिलता प्रधान रोगों में तथा दाहयुक्त रोगों में इसका बहुत प्रयोग
किया जाता है। आंत्रिक रस की उत्पत्ति कम होती हो तथा पित्त का उचित रूप से स्राव न होता
हो ऐसी अवस्थाओं के लिये यह अमूल्य औषध है। वमन तथा हृल्लास में इसका फांट पिलाते हैं।
उदर शूल, आध्मान एवं मरोड आदि में इलायची २ ड्राम, धनियां २ ड्राम, दालचीनी ४ ड्राम,
मुनक्का १ औंस, रक्त चन्दन २ ड्राम एवं मद्यसार (४५%) १ पांइट इसका टिंक्चर २-८ बूंद
देने से बहुत लाभ होता है। केले के अजीर्ण में इलायची का उपयोग किया जाता है। आंव तथा
प्रवाहिका में मक्खन के साथ इसका चूर्ण खिलाया जाता है। यकृत शोथ में ५ र० की मात्रा में
इससे बहुत लाभ होता है।
(२) वृक्क के पीडायुक्त विकारों में खरबूजे के बीज के साथ इसे खिलाते हैं। इससे मूत्र की
मात्रा बढ़ती है। सोजाक में तथा वाजीकरण के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। मूत्रकृच्छ्र में
आंवले के रस के साथ या दही के पानी के साथ इसका चूर्ण लाभदायक होता है।
(३) नेत्र रोगों में इसके सूक्ष्म चूर्ण को बकरी के मूत्र की भावना देकर अञ्जन कराया
जाता है।
(४) हृदय की धड़कन में पिप्पलीमूल के साथ इसको घी में मिला कर खिलाते हैं। गुल्म में
भी इससे लाभ होता है।
(५) नाडीशूल में १५ र० की मात्रा में छोटी इलायची का चूर्ण थोड़ी सी क्विनीन के साथ
मिला कर देने से बहुत लाभ होता है। मस्तिष्क तथा वातनाड़ियों की थकावट में यह लाभदायक
होती है।
(६) चक्कर आते हों तो छिलके सहित इसका क्वाथ गुड़ मिला कर पिलाया जाता है।
प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण- लंका से आने वाली एक जंगली छोटी इलायची होती है जो
कुछ लम्बी, सिकुड़ी हुई एवं गहरे धूसरित भूरे रंग की होती है। इसके बीजों में करीब ४ झुर्रियां
होती हैं। एक अन्य अमोमम् केपुलेगा रंग्गे, बर्कि (Amomum kepulaga Sprague & Bur-
kill) नामक क्षुप से प्राप्त इलायची के बीजों में कपूर की तरह स्वाद रहता है तथा उसमें करीब
१४ खण्डित झुर्रियां रहती हैं।
इसमें बूरा लगी हुई, अपक्व, कीड़ों द्वारा खाई हुई एवं फटी हुई इलायची का व्यामिश्रण
रहता है।
मात्रा— चूर्ण ५-१५ रत्ती ।

अथ त्वक्पत्रम् (तज)। तस्य नामानि गुणांश्चाह

त्वक्पत्रञ्च वराङ्गं स्याद् भृङ्गं चोचं तथोत्कटम् । त्वचं लघूष्णं कटुकं स्वादु तिक्तञ्च रूक्षकम् ॥
पित्तलं कफवातघ्नं कण्डूवाम्यहृचिनाशनम् । हृद्वस्तिरोगवातार्शः कृमीपोनसशुक्रहृत् ॥ ६५ ॥
तज के नाम तथा गुण— त्वक्पत्र, वराङ्ग, भृङ्ग, चोच, उत्कट और त्वच ये सब 'तज' के
संस्कृत नाम हैं। तज-लघु, उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्त रस युक्त, स्वादिष्ट और रूक्ष होती है एवं


कर्पूरादिवर्गः २२५
यह पित्त उत्पन्न करने वाली, कफ तथा वात को दूर करने वाली, खुजली, आम, अरुचि, हृद्रोग,
बस्तिसम्बन्धी रोग, वात, अर्श, कृमि, पीनस तथा शुक्र का भी नाश करने वाली होती है ॥६४-६५॥
तज— दालचीनी का ही एक भेद है। दालचीनी के अनेक जातियों के वृक्ष पाये जाते हैं।
लंका से आने वाली दालचीनी पतली छाल वाली होती है जो सबसे अच्छी होती है। इसके वृक्ष
को (लॅ.) सिनेमोमम झैलैनिकम् कहते हैं। उसका वर्णन आगे स्वतंत्र किया गया है। एक
दालचीनी चीन देश से आती है जिसके वृक्ष को (लै.) सिनेमोमम् कॅशिया कहा जाता है।
इसी के जाति का एक वृक्ष भारतवर्ष में पाया जाता है जिसे (लै.) सिनेमोमम् तमाल कहते हैं।
इसी की छाल को कुछ लोग तज कहते हैं तथा इसके पत्तों को तमालपत्र (तेजपत्र) कहते हैं।
इसको कहीं-कहीं दालचीनी नाम से ही या असली सिंगापुरी दालचीनी में मिलावट करके बेचते
हैं क्योंकि सिंगापुरी दालचीनी बहुत मंहगी होने के कारण बजार में कम आती है। इसके अनेक
जाति के वृक्ष होने के कारण भिन्न-भिन्न लेखकों ने दालचीनी, तज तथा तमालपत्र इनके लैटिन
नाम अलग-अलग दिये हैं। प्रायः मोटी छाल को तज एवं पतली छाल को दालचीनी कहा जाता
है। तेजपत्र और तज एक ही वृक्ष के छाल और पत्र हैं। कुछ इन्हें अलग-अलग वृक्षों के मानते
हैं। यहां पर वर्णन चीनी दालचीनी का किया जा रहा है। तेजपत्र तथा असली दालचीनी का
आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है। कुछ लोग मोटी जाति की तज को नालुका नाम से भी बेचते
हैं जिसका लेपादि में बहुत व्यवहार किया जाता है।

२५ तज

हि०, गु०, उर्दू- तज । वं०- दालचीनी । म०, उड़िया- दालचीनी । पं०- लुरुण्ड ।
तां०, मलं०- लवंगपत्ते । अं०- Cassia cinnamon (कॅशिया सिनॅमोन्), Chinese cassia
(चाइनीज कॅशिया)। लै०- Cinnamomum cassia, Blume (सिनॅमोमम् कॅशिया,
ब्लूम)। Fam. Lauraceae (लॉरेसी) ।
चीन एवं बर्मा में अवा नामक स्थान में इसकी खेती की जाती है।
इसका वृक्ष चिकना तथा सदाइरित होता है। पत्ते- आयताकार-भालाकार या भालाकार,
पतले ६-८ मि. मि. लम्बे पर्णवृन्त से युक्त, तीन नाडियों से युक्त, फलक मूल की तरफ कुछ संकु-
चित होते हुये, ३-४ इञ्च लम्बे, सम्बाध युक्त, चर्मवत् एवं अस्पष्ट नाड़ीजाल से युक्त होते हैं।
पुष्प- छोटे तथा परिपुष्प (Perianth) के बराबर या कुछ अधिक लम्बे तथा पतले पुष्पवृन्त
(Pedicle) से युक्त, बहुव्यर्यक्ष सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों में, पत्र के अक्ष में या छोटी शाखाओं
के अन्त में रहते हैं। परिपुष्प करीब ३ मि. मि. लम्बे तथा कुछ सिल्क के समान रहते हैं जिनके
दल (पंखुड़ियां) आयताकार भालाकार होते हैं। फल- मटर के बराबर, चिकने, अण्डाकार एवं
रसदार अष्ठिफल (Drupes) होते हैं। परिपुष्पासन बहुत बड़ा हुआ नहीं होता तथा वह ६ खण्डों
में विभक्त रहता है जिनके अग्र कटे हुये मालूम पड़ते हैं या प्रायः खण्ड पूर्ण रूप में स्थायी रहते
हैं। इसके काण्ड की सूखी हुई छाल को चीनी दालचीनी कहते हैं। यह २-४० से. मि. लम्बी
तथा मुडी होती है। बाहर से यह हल्के धूसर भूरे रंग की, करीब-करीब चिकनी तथा कुछ आड़ी
झुर्रियों से युक्त रहती है। अन्दर से यह रक्ताभ भूरे रंग की एवं रेशेदार होती है। इसे तोड़ने से मद्य
छोटा तथा असम होता है। इसकी गन्ध मनोहर एवं स्वाद उष्ण, मधुर तथा सुगन्धि रहता है।
रासायनिक संगठन- इसमें ०'८% उड़नशील तैल, ४% राल, १४.६% गोंद युक्त निस्सार
(टैनिन सहित), ६४.३% लिगनिन (Lignin) तथा बैस्सोरिन (Bassorin), १६.३% जल
15 एवं रंजक द्रव्य ये पदार्थ पाये जाते हैं।
१५ भा० नि०