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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 143 में से

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पृष्ठ 120

२२२ भावप्रकाशनिघण्टुः
बड़ी इलायची की बहुत-सी उपजातियाँ भारतवर्ष में पाई जाती हैं जिनमें से (ले०) अमोमम्
ॲरोमॅटिकम् राक्स (Amomum aromaticum Roxb. ); हिं०, बं०-मोरंग इलायची पूर्वी
बंगाल तथा आसाम के आस-पास बहुत उत्पन्न होती है। यह बंगाल कार्डेमोम् (Bengal
Cardamom) नाम से भी कही जाती है। हिमालय की तराई में आसाम तथा बंगाल के आर्द्र
प्रदेशों में इसकी खेती की जाती है। इसके क्षुप-के-२-३ फीट लम्बे काण्ड, राइजोम से एक साथ
गुच्छों में निकलते हैं। पुष्प-हलके पीले रंग के अवृन्तकाण्डज व्यूहों में निकलते हैं। फल-अभि-
अण्डाकार या लट्वाकार करीब बड़े जायफल के इतने बड़े कुछ खुरदरे तथा ३ हिस्सों में विभक्त
होते हैं। बीज-प्रत्येक कोष में अनेक तथा करीब ३ मि० मि० लम्बे होते हैं।
रासायनिक संगठन- बड़ी इलायची में एक हलके पीले रंग का उडनशील तैल पाया
जाता है। इस तैल में सिनिओलू (Cineol) नामक पदार्थ बहुत रहता है।
गुण और प्रयोग-यह किंचित् उष्ण, पाचक, सुगन्धि, उत्तेजक एवं वातानुलोमक है। इसके
गुण छोटी इलायची के सदृश हैं तथा उसके प्रतिनिधि रूप में इसका व्यवहार किया जाता है।
प्राचीन ग्रन्थों में बड़ी एला का बहुत कम प्रयोग किया गया है। इलायची के स्थान में हमेशा
छोटी इलायची का ही प्रयोग करना चाहिये जबतक कि विशेष रूप से बड़ी इलायची के लेने का
निर्देश न हो। अनेक कड़वी, उत्तेजक तथा विरेचक औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता
है। इसके तैल का उपयोग सुगन्ध के लिये करते हैं।
मन्दाग्नि, आध्मान, शूल, अतिसार, यकृच्छोथ तथा मूत्रकृच्छ्र में इसका उपयोग किया
जाता है।
(१) दाँत तथा मसूड़ों के विकारों में इसके क्वाथ से कुल्ला कराया जाता है।
(२) पाचन संस्थान के कुछ विकारों में जिनमें आन्त्रिक स्राव गाढ़े तथा कम हो जाते हैं
इसको ५२० की मात्रा में खिलाते हैं। इससे पित्त का स्राव ठीक होकर यकृत्शोथ कम
होता है।
(३) मूत्रक औषध के रूप में अश्मरी में इसको खरबूजे के बीज के साथ खिलाते हैं।
(४) नाड़ीशूल में २ माशे की मात्रा में इसको क्विनीन के साथ देने से लाभ होता है।
मात्रा-५-१५ र० ।
अथैला (गुजराती इलायची) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह
सूक्ष्मोपकुञ्चिका तुत्था कोरङ्गी द्राविडी त्रुटिः । एला सूक्ष्मा कफश्वासकासार्शोमूत्रकृच्छ्रहृत् ।
रसे तु कटुका शीता लघ्वी वातहरी मता ॥ ६३ ॥
छोटी इलायची (गुजराती इलायची) के नाम तथा गुण - सूक्ष्मा, उपकुञ्चिका, तुत्था, कोरङ्गी,
द्राविडी, त्रुटि तथा सूक्ष्मका ये सब 'छोटी इलायची' के संस्कृत नाम हैं।
छोटी इलायची-कफ, श्वास, कास, अर्श (बवासीर) और मूत्रकृच्छ्र इन सब रोगों को दूर
करने वाली होती है तथा कटु रसयुक्त, शीतवीर्य, लघु एवं वातनाशक होती है ॥ ६३ ॥
२४ छोटी इलायची
हि०-छोटी इलायची, गुजराती इलायची, चौहरा इलायची, सफेद इलायची । बं०-छोट
इलायच । गु०-एलची कागदी, एलची, मलबारी एलची । म०-बारीक वेलदोडे, एलची। ते०-


कर्पूरादिवर्गः २२३
एलाकि । ता०-एलाक्के, चिन्न एलं । मा०-छोटी इलायची । क०-एलाक्कि । फा०-हीलववा,
हील, खैरबवा, इलायची खुर्द, हीलउन्सा । अ०-काकुलह सिगार, शूशमीर । आं०-Cardamom
Fruit (कार्डेमोम् फ्रूट ); Lesser Cardamom (लेसर कार्डेमोम् ) । ले०-Elettaria carda-
momum Maton (इलेट्टेरिआ कार्डेमोमम् मेटन )। Fam. Zingiberaceae झिंज़ीबरेसी ) ।
यह पश्चिम तथा दक्षिण भारत में, कनारा, मैसूर, कुर्ग, वैनाड, ट्रावंकोर तथा कोचीन में आर्द्र
पहाड़ी जंगलों में उत्पन्न होती है। सीलोन तथा दक्षिणी प्रायःद्वीप के चाय, कॉफी एवं रबर के
बगानों में इसकी खेती की जाती है। बर्मा के जंगलों में भी यह उत्पन्न होती है।
इसका क्षुप-अदरख के क्षुप के समान तथा बहुवर्षायु होता है और इसकी जड़ के नीचे मोटा,
मांसल तथा अनुप्रस्थ फैला हुआ राइजोम (मौमिक काण्ड ) रहता है। राइजोम से ८-२० की
संख्या में सीधे, चिकने, हरे रंग के चमकीले तथा ६-९ फीट ऊँचे काण्ड निकलते रहते हैं जिन
पर एकान्तरित पत्र लगे होते हैं। पत्ते-१-२ फुट लम्बे, ३ इञ्च तक चौड़े, आयताकार-भालाकार
तथा कोषाकार होते हैं। पुष्पद्ण्ड-कांड के आधार भाग से १-२ फीट लम्बा पुष्पद्ण्ड निकला
रहता है जो जमीन पर फैला रहता है। पुष्प-पुष्पव्यूहों में तथा किंचित् नील लोहिताभ वर्णयुक्त
छोटे-छोटे होते हैं। पंखड़ियों के ओष्ठ श्वेत होते हैं। फल-हलके पीले या हरिताभ पीत रङ्ग के,
१-२ से० मि० लम्बे, अण्डाकार, बड़े फल कुछ तिकोने, ३ कोषवाले, अनेक महीन खड़ी धारियों
से युक्त सामान्य स्फोटी फल (Capsule) होते हैं जिनका स्फुटन पाश्विक सन्धियों (Loculici-
dal) पर होता है। बीज-फलों के अन्दर अनेक छोटेबीज होते हैं जो प्रत्येक कोष में दो-दो कतारों
में एवं अक्षलक्ष्य जरायु से लगे हुए एक साथ रहते हैं। यह हलके या गहरे रक्ताभ भूरे रङ्ग के, ४
मि० मि० लम्बे, ३ मि० मि० चौड़े, अनियमित कोण युक्त, कड़े एवं ६-८ आड़ी झुर्रियों (Rug-
ae-रूगी) से युक्त होते हैं। प्रत्येक बीज महीन वर्णहीन आवरण (Aril-ॲरिल्) से युक्त रहता
है। इसका स्वाद कुछ कटु तथा शीतल एवं गन्ध मनोहर होती है। इलायची के प्रयोग के समय
ही उसके बीजों को निकालना चाहिये। निकाल कर रखे हुए बीज खराब हो जाते हैं।
भेद-(१) मैसूरी इलायची ही अधिकतर बिकती है। यह अण्डाकार, १०-२० मि० मि०
लम्बी, हलके क्रीम के रंग की, करीब-करीब चिकनी तथा मजबूत रहती है। यह मलाबारी इला-
यची की अपेक्षा अधिक टिकाऊ रहती है।
(२) मलबारी इलायची कुछ छोटी, कम चौड़ी, मरी हुई एवं लम्बाई में झुर्रीदार रहती है।
(३) मंगलोरी इलायची, मलबारी इलायची की ही तरह होती है किन्तु यह गोल, बड़ी
तथा इसकी सतह खुरदरी होती है।
(४) अलेप्पी इलायची, मलबारी इलायची की ही सदृश किन्तु हरी या हरिताभ पीत रङ्ग
की रहती है।
रासायनिक संगठन-छोटी इलायची के बीजों में ३-८% एक उड़नशील तैल पाया जाता
है जिसमें प्रधान रूप में टर्पीनीन (Terpinene ) एवं टर्पिनिओल (Terpineol ) रहते हैं।
इसमें टर्पिनिल अॅसिटेट (Terpinyl acetate ) एवं अल्प मात्रा में सीनिओल् (Cineol ) भी
पाये जाते जाते हैं। उड़नशील तैल के अतिरिक्त बीजों में ३-४% स्टार्च, नाइट्रोजन युक्त गोंद
एवं पीत रंजक द्रव्य पाये जाते हैं।
गुण और प्रयोग-छोटी इलायची दीपन, पाचन, रोचन, मूत्रल, वातानुलोमक, उत्तेजक
एवं सुगन्धि है। अन्य सुगन्धि पदार्थों के साथ वातानुलोमक औषधों में तथा विरेचक औषधों के
साथ मरोड़ न हो इसलिये इसका उपयोग किया जाता है। पाश्चात्य चिकित्सा में जोरा, दारुचीनी,