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सर्वकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 143 में से

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पृष्ठ 101

१८४ भावप्रकाशनिघण्टुः
तथा उसका लेटिन नाम सैलिक्स कंप्रिया (Salix caprea Linn.) है। चरक-सुश्रुतादि ग्रन्थों
में मुखशुद्धि के लिये एवं मुख में रुचि तथा सुगन्धि लाने के लिये मुख में धारण करने के लिये
जातीफल, कङ्कुक, पूग, कंकोल, ताम्बूल, सूक्ष्मला, लवङ्ग एवं कर्पूर का उपयोग लिखा है। टीका-
कारों ने कङ्कुक शब्द का अर्थ लताकस्तूरी किया है। कुछ लोगों ने कङ्कुक का अर्थ लघुकक्कोल
(छोटी कबाबचीनी) किया है तथा कक्कोल का अर्थ बृहत्ककोल (बड़ी कबाबचीनी) किया है।
रासायनिक संगठन—इसमें गोंद, एक रवेदार पदार्थ, सुगन्धद्रव्य, राल, अल्ब्यूमिन एवं
एक उड़नशील तैल रहता है। यह तैल हरापन लिये पीला होता है तथा वायु में खुला रखने पर
गाढ़ा हो जाता है।
गुण और प्रयोग—इसके बीज शीतल, दीपन, वाजीकर, बल्य, वातानुलोमक, नेत्र्य, रोचक,
बस्तिशोधक, तृषाशामक एवं उद्वेष्टननिरोधी हैं।
इनका उपयोग कफरोग, बस्तिविकार, मुखरोग, अपतन्त्रक, दुर्बलता, स्नायुदौर्बल्य, कुपचन,
अग्निमान्द्य एवं ज्वर में किया जाता है।
(१) इसके फाण्ट को २ से ४ तो० की मात्रा में कफविकार, तमकश्वास एवं ज्वर में
दिया जाता है। इससे श्वासमार्ग में स्निग्धता उत्पन्न होकर श्वासनलिकाओं का उद्वेष्टन दूर होता
है। उत्तेजक होने के कारण इससे हृदय को भी बल प्राप्त होता है।
(२) इसको मुख में रखकर चबाने से मुख स्वच्छ एवं सुगन्धित होता है तथा खाने पर रुचि
बढ़ती है। स्वरभङ्ग एवं मुखशोष में इसका धूम्रपान उपयोगी है।
(३) २॥ औंस बीज तथा २० औंस मद्यसार में इसका टिंक्चर बनाकर १-२ ड्रा० की मात्रा
में उत्तेजक, उद्वेष्टननिरोधी एवं वातानुलोमक रूप में अपतन्त्रक, दुर्बलता तथा अन्य वातिक विकारों
में दिया जाता है।
(४) सूखी खुजली में दूध में पीसकर इसके उबटन का प्रयोग किया जाता है। सर्पदंश पर
इसके चूर्ण को मद्यसार में भिगोकर लगाते हैं तथा आन्तरिक प्रयोग भी करते हैं। महीन चूर्ण
को नेत्र में लगाने से लाभ होता है।
(५) इसके मूल तथा पत्तों का लुआब निकाल कर मिश्री मिलाकर सोजाक, रतिजन्य रोग
एवं बस्तिविकारों में दिया जाता है। शुक्रमेह में बीजों का चूर्ण खिलाते हैं।
(६) औषधीय तैलों को सुगन्धित करने के लिये इसके बीजों का उपयोग किया जाता है।
(७) कॉफी के साथ इसका प्रयोग किया जाता है।
अधिक मात्रा—२ ड्रा० से अधिक टिंक्चर के प्रयोग से शिरःशूल एवं चक्कर आते हैं।
मात्रा—चूर्ण २-४ मा०; टिंक्चर—१-२ ड्रा०।
अथ गन्धमार्जारवीर्यम् (जबादकस्तूरी)। तस्य नामानि गुणांश्चाह
गन्धमार्जारवीर्यन्तु वीर्यकृत्कफवातहृत् । कण्डूकुष्ठहरं नेत्र्यं सुगन्ध्यं स्वेदगन्धनुत् ॥ १० ॥
गन्धमार्जार का वीर्य अर्थात् जबादकस्तूरी के गुण—गन्धमार्जारवीर्य—वीर्यजनक, कफवात-
नाशक, खुजली तथा कुष्ठ को दूर करने वाला, नेत्रों के लिये हितकर, सुगन्धयुक्त तथा पसीने की
दुर्गन्ध को दूर करनेवाला होता है ॥ १० ॥
कर्पूरादिवर्गः १८५
५ जबाद कस्तूरी
हि०-जबाद कस्तूरी, जवाद, बेट अजीर, मुश्क बिलाव कस्तूरी, गन्ध ओतु । गु०-जवादिया
कस्तूरी। ता०-पुनुगु, जवादी। अ०-ज(जु)बाद, ज(जु)बाद। अं०-Civet (सिहेट)। प्राणिनाम—
हि०-मुश्क बिल्ली, खतास । ने०-भ्रान । बं०-माचमोंदर, बगदास, पूडोंगंद । ता०-पुनुगु पूने ।
फा०-गुर्बए जवाद । अं०-Civet cat ( सिहेट कॅट ) । ले०-Viverra zibetha, Linn. (वाइ-
वेरा झिबेथा, लिन.) ।
यह सुगन्धिपदार्थ गन्धमार्जार नामक एक प्रकार की बिल्ली के पूंछ के नीचे की थैली से
प्राप्त द्रव्य है। यह प्राणी अफ्रीका, दक्षिण एशिया एवं भारतवर्ष के मालाबार प्रान्त में पाया
जाता है। इसका कद बिल्ली का सा किन्तु दुम बड़ी लम्बी होती है। शरीर पर गहरे रंग के
धब्बे होते हैं। गुदा और जननेन्द्रिय के बीच में पूंछ के नीचे एक बड़ी थैली होती है जो दो
भागों में विभक्त रहती है। इस थैली में जो द्रव पदार्थ बनता है उसको भी सिहेट ही नाम
दिया जाता है। प्राकृतिक दशा में सिहेट की गन्ध अत्यन्त तीक्ष्ण या असह्य होती है, किन्तु
जब वह अन्य वस्तुओं के साथ मिलाकर तैयार की जाती है, तो उसमें कस्तूरी की सी सुगन्ध आने
लगती है। इस बिल्ली को एक तंग पिंजरे में खड़ाकर देते हैं और थैली में से द्रव पदार्थ को
निचोड़ लेते हैं।
मलावार की तरफ कृषक लोग खेतों में बांस गाड़ देते हैं। यह मार्जार उस पर अपना शिश्न
घर्षण करके वीर्य निकाल देता है जो बांस पर लग जाता है। कृषक लोग उसे संग्रह करके
बेच देते हैं।
कई लोग इस मार्जार को मारकर उसका अण्डकोष उल्टा करके ग्रन्थियां फेंक देते हैं और
उल्टे हुवे कोष में तृण भरकर शुष्क करके बेच देते हैं। कलकत्ता में यह शुष्क कोष 'खट्टाशी'
नाम से मिलता है। बंगाली वैद्य नारायण तैल आदि को सुगन्धित करने के लिये खट्टाशी उसमें
छोड़कर मन्द अग्नि से पकाते हैं।
गन्धमार्जारवीर्य नया होने पर पीताभ श्वेत वर्ण का, नरम और प्रायः मधु के समान गाढ़ा
होता है। पुराना होने पर रंग में कुछ श्यामता आ जाती है। यह श्वेत रंग का निकृष्ट समझा
जाता है। दक्षिण भारत के बंगलोर, मैसूर, मदुरा आदि शहरों में यह पुनुगु या जबादी नाम
से सुगन्धि द्रव्य बेचने वालों के यहां मिलता है। इसमें छोटे बाल, तन्तु, लकड़ी तथा अमोनिया
आदि मिले रहते हैं।
परीक्षा—'गंजबादावद' में जवाद की परीक्षण विधि इस प्रकार लिखी है—
इसे सुजली के सिरे पर लगाकर अग्नि के समीप रखने से पिघल कर तेल हो जाय तो कृत्रिम
और यदि एकत्रीभूत होकर सिरे पर लगा रहे तो असली समझे। इसे अग्नि पर गरम करें या
दोनों हाथों से इतना मलें कि गरमी पैदा हो जाय, उस समय सूंघने से जो चीज उसमें मिली होगी
वह व्यक्त हो जायगी।
रासायनिक संगठन—इसमें स्वतन्त्र अमोनिया, राल, वसा, कार्यकारी सत्त्व एवं उड़नशील
तैल आदि पदार्थ पाये जाते हैं जिनके कारण इसमें सुगन्ध होती है।
गुण और प्रयोग—यह उष्ण, वृष्य, नेत्र्य, सुगन्धि, उत्तेजक, सौमनस्यजनन, आविजनन,
हृदय एवं ज्ञानेन्द्रियों के लिये बलकारक, उद्वेष्टननिरोधी तथा कफ, वायु, कण्डू और स्वेद की दुर्गन्ध
को दूर करने वाला एवं स्थानिक पीड़नाशामक है। इसका प्रयोग अपतन्त्रक, वातनाड़ी दुर्बलता-