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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 143 में से

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१८२ भावप्रकाशनिघण्टुः
१०-२०% एवं जल में करीब ५०-७५% घुल जाती है। सौ डिग्री उष्णता पर सुखाने से २०-३०%
इसका तौल कम हो जाता है।
गुण और प्रयोग- कस्तूरी कटु, तिक्त, उष्ण, वृष्य, वक्ष्य, विषघ्न, सौमनस्यजनन, हृदय एवं
मस्तिष्क के लिये बलप्रद, आक्षेपहर, उद्वेष्टननिरोधी तथा कफविकार, वातविकार, शीत, दुर्गन्ध
एवं शोथ को दूर करने वाली होती है।
यह सुषुम्नाशीर्ष के लिये अत्यन्त तीव्र उत्तेजक तथा निपात (Collapse) में बहुत
लाभदायक मानी जाती है। इससे रक्तप्रवाह की वृद्धि होती है तथा नाड़ियों में तनाव (Ten-
sion) बढ़ता है। यह मूत्रजननरेन्द्रिय एवं श्वसन केन्द्र के लिये उत्तेजक है। इससे प्रथम
रक्तवह संस्थान एवं मस्तिष्क को उत्तेजना मिलती है तथा बाद में इसका मादक एवं स्वेदजनक
प्रभाव दिखलाई देता है। वातप्रकृति के लोगों में यह ज्यादा प्रभावशाली होती है। इसका
उत्सर्ग मूत्र, स्वेद एवं दुग्ध के द्वारा होता है। मुदालियर, डेविड एवं रेड्डी (१९२९) के प्रयोगों
से यह देखा गया कि जिन लोगों में श्वेतकणापकर्ष (Leucopenia-ल्यूकोपेनिया) हुआ रहता
है उनमें कस्तूरी के टिंक्चर के १०-२० बूंद १ औंस जल के साथ पिलाने से ½-१ घण्टे में श्वेत
कणों की वृद्धि होतो है। स्वस्थ व्यक्ति में कम प्रभाव दिखलाई देता है। डा. कर्नल चोपरा लिखते
हैं कि उपर्युक्त तथ्य गलत हैं। उनके प्रयोग में स्वस्थ एवं कालज्वर पीड़ित रोगियों में जिनमें श्वेत-
कणापकर्ष हुआ रहता है, ½ र. कस्तूरी भोजन के २½ घण्टे पश्चात् खिला कर उसके २, ३ घंटे बाद
उन लोगों की तथा उनके रक्त की परीक्षा की गई। सात दिन तक यह प्रयोग किया गया। उनके मत
से नाडी की गति, रक्त का दबाव, तनाव, श्वेतकणों की संख्या आदि किसी में कोई परिवर्तन नहीं
हुआ। कुछ लोगों ने कस्तूरी खाने के बाद आमाशय में कुछ उष्णता तथा अच्छेपन का अनुभव किया
जो प्रभाव किसी वातानुलोमक मिश्रण (Carminative mixture) की तरह मालूम होता था।
कर्नल चोपरा के मत से कस्तूरी का हृदय, श्वसन एवं वातनाडीसंस्थान के लिये उत्तेजक एवं वृष्य
प्रभाव कस्तूरी की तीव्र गंध के कारण नासिका द्वारा प्रत्यावर्त्तन क्रिया (Reflex-action-
रिफ्लेक्स ॲक्शन) के कारण एवं आमाशय में कुछ प्रक्षोभ के कारण है लेकिन अपस्मार, कंपवात
एवं बच्चों के आक्षेप में इसकी उपयोगिता का कोई आधार नहीं है। अपतन्त्रक आदि अन्य
आक्षेपयुक्त रोगों में ह्रींग, हुलेरियन आदि तीव्र गन्धयुक्त औषधों की तरह एवं कुकास तथा शूल
आदि में अन्य सुगन्धि तेलों की तरह इसका प्रभाव पड़ता है। कर्नल चोपरा का कहना है कि
कस्तूरी को वृथा अधिक महत्त्व दिया गया है और उसमें कोई विशेष औषधीय गुण नहीं है।
उनका कहना है कि अधिकतर कस्तूरी मिलावटी होने के कारण अत्यन्त विश्वस्त स्थानों
से प्राप्त कस्तूरी का ही प्रयोग किया गया था। कस्तूरी को थोड़े से मद्यसार में घोंटकर फिर उसमें
जल मिलाकर २४ घण्टे रख कर, छान कर प्रयोग किया गया। इसमें करीब ७०-७५% भाग
घुल जाता है।
कस्तूरी का उपयोग योषोपस्मार, हिक्का, उद्वेष्टनयुक्त तमकश्वास, हृदय एवं मस्तिष्क की
दुर्बलता, हृदय की धड़कन, वातिक उन्माद, अपस्मार, संन्यास, विस्मृति, पक्षाघात, अर्दित, शून्यता,
कंपवात, कुकास, शूल, बच्चों के आक्षेप आदि वातिक तथा श्लैष्मिक विकारों में एवं उत्तेजक तथा
हृद्य औषध के रूप में आन्त्रिक ज्वर, फुफ्फुसपाक, श्वसनिका शोथ, प्लेग एवं मस्तिष्कावरण शोथ
आदि में किया जाता है। हृदय की दुर्बलता के लिये चन्द्रोदय, बृहत् कस्तूरीभैरव का उपयोग
बलामूल के साथ लाभदायक है।


कर्पूरादिवर्गः १८३
उद्वेष्टन निरोधि प्रभाव के कारण हनुस्तम्भ, जलसंत्रास, तीव्र श्वसनावरोध एवं कुकास
आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। अन्य औषधों के साथ वाजीकरण के लिये इसका बहुत
उपयोग करते हैं। दक्षिण के वैद्य बच्चों के आक्षेप में अफीम के साथ कस्तूरी का प्रयोग करते हैं।
मन्दज्वर, जीर्णकास, दुर्बलता, वातरक्त एवं विसूचिका आदि में यह लाभदायक है।
कस्तूरी का प्रयोग मधु के साथ अथवा मृगमदासव (भै. र.) के रूप में तथा मकरध्वज के
साथ किया जाता है। उष्ण प्रकृति वालों के लिये यह हानिकारक तथा शिरःशूलजनक होती है
तथा इसके दुष्परिणाम को दूर करने के लिये गुलाबजल एवं वंशलोचन का प्रयोग करना चाहिये।
मात्रा-१-४ र०, आसव या टिंक्चर-१०-३० बूंद।

अथ लताकस्तूरी (मुष्कबीज) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह
लता कस्तूरिका तिक्ता स्वाद्वी वृष्या हिमा लघुः ।
चक्षुष्या छेदिती श्लेष्मतृष्णावस्यास्यरोगहृत् ॥ ९॥
लता कस्तूरी के गुण-लताकस्तूरी-तिक्त रस युक्त, सुस्वादु, वृष्य (वीर्यवर्धक), शीतवीर्य,
लघु, नेत्रों के लिये हितकर, छेदक (गाढे कफादि का छेदन करने वाली), कफ, प्यास, बस्ति
तथा मुखसम्बन्धी रोग को दूर करने वाली होती है ॥ ९॥

४ लता कस्तूरी
हि०, बं०-लताकस्तूरी, कस्तूरी दाना, मुश्कदाना। म०-कस्तूरीमेंडा। मा०-मुश्कदाणा।
गु०-लता कस्तूरी। ते०-कर्पूरीबेंडा। ता०-वेत्तिल कस्तूरी, कट्टुक कस्तूरी। पं.-बोनार कस्तूरी।
अ०-हब्बुलमि(मु)ष्क। फा०-मुश्कदाना। अं०-Musk-mallow (मस्क-मॅलो)। ले०-Hibi-
scus abelmoschus, Linn. (हिबिस्कस् एबेल्मोस्कस्, लिन.)। Fam. Malvaceae
(माल्वेसी)।
यह बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश तथा विशेषकर इस देशके गरम प्रदेशों में उत्पन्न होती है।
इसको बागों में लगाते हैं और यह आपही आप जंगली भी उत्पन्न होती है।
इसका क्षुप-२-३ फुट तक ऊँचा, रोमश तथा जंगली भिंडी के क्षुप के आकार वाला होता है
किन्तु कहीं-कहीं इससे भी ऊँचा क्षुप देखने में आता है। पत्ते-भिंडी के पत्तों के आकारवाले, गोला
कार गहरे कटे किनारीदार एवं ३ से ५ भागों में विभक्त रहते हैं। फूल-भिंडी के फूलों के समान
ही ३-४ इञ्च के घेरे में घंटाकार चमकीले पीले रंग के होते हैं। फली-२॥-३ इञ्च लम्बी, पहल-
दार रोमश किञ्चित् नुकीली भिंडी की ही तरह होती है और बीज-भिण्डी के बीजो के समान
किन्तु वृक्काकार, कुछ चिपटे तथा काले रंग के होते हैं।
इन बीजों को मसलने से कस्तूरी की तरह गंध आती है। इसके पत्र, मूल तथा बीजों का
औषध में व्यवहार किया जाता है।
लताकस्तूरी के नाम से यह बोध होता है कि इसकी लता होती है। 'निघण्टुरत्नाकर' में
लिखा है कि इसकी लता दक्षिण में पाई जाती है परन्तु लता देखने में नहीं आली, इसका क्षुप ही
होता है जिसका वर्णन ऊपर किया गया है। श्रीविश्वनाथजी द्विवेदी अपनी भावप्रकाश की
टीका में लताकस्तूरी का पर्याय वेदमुष्क लिखते हैं। वास्तव में वेदमुष्क लताकस्तूरी से अलग है