भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
गुडूच्यादिवर्गः ४५३
अथ बिल्वः (बेल) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
बिल्वः शाण्डिल्यशैलूषौ मालूरश्रीफलावपि ।१ श्रीफलस्तुवरस्तिक्तो ग्राही रूक्षोऽग्निपित्तकृत् ।।
वातश्लेष्महरो बल्यो लघुरुष्णश्च पाचनः ।।१३।।
बेल के नाम तथा गुण-बिल्व, शाण्डिल्य, शैलूष, मालूर और श्रीफल ये सब संस्कृत नाम बेल के हैं । बेल-
कषाय तथा तिक्त रस युक्त, ग्राही, रूक्ष, अग्निवर्धक, पित्तकारक, वात कफनाशक, बलकारक, लघु, उष्णवीर्य तथा
पाचक है । [१३]
३. बेल
हिं०-बेल, श्रीफल । बं०, म०-बेल । गु०-बीली । क०-बेलपत्रे । ते०-मारेडु, बिल्वपंडु । ता०-
बिल्वम, बिल्वपझम । मा०-बील, बोलो । मल०-कुवलप-पैझम । सिन्ध०-बिल, कटोरी । उडि०-बेलो । अ०-
सफरजले हिंदी । फा०-वेह हिंदी, बल, शुल्ल । अं०-Bengal Quince (बेंगॉल् क्विन्स); Bael fruit (बेल
फ्रुट) । ले०-Aegle marmelos Corr. (इगल् मार्मेलोस कॉर) । Fam. Rutaceae (रूटेंसी) ।
यह आसाम, ब्रह्मा, बंगाल, बिहार, युक्तप्रान्त, अवध, झेलम, मध्य और दक्षिण हिन्दुस्तान तथा सिलोन में जंगली
और प्रायः सभी स्थानों में बागी दोनों प्रकार से उत्पन्न होता है ।
इसका वृक्ष-मध्यमाकार का ५० फुट से भी ऊँचा होता है । शाखाओं पर सीधे, मोटे, तीक्ष्ण एक इञ्च तक लम्बे
काँटे होते हैं । टहनियों पर पत्ते विषमवर्ती रहते हैं । प्रत्येक सींक पर तीन-तीन पत्रकों से युक्त पत्ते रहते हैं । पत्रक-
कसोंदी के पत्तों के आकार वाले एवं अंडाकार-भालाकार होते हैं । बीचवाला पत्ता अन्य दो से कुछ बड़ा होता है । फाल्गुन-
चैत्र में पुराने पत्ते गिर जाते हैं और चैत्र-वैशाख में क्रम से नवीन पत्ते निकल आते हैं । इसी समय में हरियाली लिये सफेद
रङ्ग के, ४, ५ पंखड़ियों (अन्तर्दल) वाले एवं करीब १ इञ्च चौड़े फूल लगते हैं और उनमें मधु के समान मन्द गन्ध
निकलती है । फल-(बीजिमांसल फल-Berry) गोलाकार ३-८ इञ्च व्यास के, हरिताभ रंग के, पकने पर पीताभ भूरे
रंग के एवं चिकने होते हैं । बहिर्भित्ति (Epicarp) से बाह्य कठोर काष्ठमय छिलका बनता है जो करीब ३ मि० मि०
मोटा, रक्ताभ रंग का एवं अन्दर से रेशेदार होता है । मध्यभित्ति एवं अन्तर्भित्ति से गूदा बनता है जो आवरण से चिपका
हुआ तथा हलके रक्ताभ नारंगी रंग का होता है । बीज-बहुत, १०-१५ समूहों में, बिनौले के सदृश सफेद रोमों से युक्त
एवं चिकने तथा रंगहीन गोंद से लिपटे रहते हैं । फलों में मन्द सुगंध आती है तथा इनका स्वाद गोंद की तरह होता
है । बेल के दो तरह के फल होते हैं । लगाये हुये फल बड़े, सुस्वादु एवं कम बीज वाले होते हैं । जंगली फल छोटे,
कुछ मादक एवं इसके बीज अधिक गोंद से लिपटे होते हैं तथा ये मछली मारने के काम में आते हैं ।
बेल अपने यहाँ बहुत पवित्र माना गया है । सूतिकागार के निर्माण में एवं सूतिका के पलंग की लकड़ी बेल की
लेने का चरकादि में विधान है । सुश्रुत में मेधायुष्कामीय अध्याय (चि० अ० २८) में विशिष्ट पद्धति से ऋग्वेदोक्त श्रीसूक्त
के द्वारा बिल्व की आहुति आदि का विधान किया है जिससे अलक्ष्मी का नाश एवं आयुवृद्धि होती है ।
बेल के मूल, त्वचा, पक्व-अपक्व फल, पत्र एवं पुष्प का औषध में व्यवहार किया जाता है । चूर्णादि के लिये
कच्चे फल का, मुरब्बे के लिये अधपके फल का और पानक के लिये परिपक्व फल का गूदा लेना चाहिये । दशमूल
आदि कषायों में मूल या वृक्ष की त्वचा ली जाती हैं ।
रासायनिक संगठन-बेल के फलों में गोंद एवं पेक्टिन (Pectin) के अतिरिक्त प्रहासक (Reducing) शर्करा
३.७%, संपूर्णशर्करा ४.६%, तैल जिसमें मार्मेलोसिन Marmelosin, C₁₃ H₁₂ O₃) नामक एक महत्त्व का रवेदार
१. गन्धगर्भः शलाटुश्च कण्टकी च सदाफलः । (क्वाचित्कः)
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पदार्थ रहता है तथा उड़नशील तैल रहता है। पक्व फलों में टैनिन सदृश पदार्थ अत्यल्प मात्रा में रहते हैं। इसके मूल,
पत्र एवं छाल में प्रहासक शर्करा एवं टैनिन पाया जाता है। इसके बीजों में एक हलके पीले रंग का तैल होता है।
गुण और प्रयोग-कच्चा बेल कटु, तिक्त, कषाय, स्निग्ध, उष्ण, दीपन, ग्राही, वात-कफनाशक एवं आन्त्र
को बल देने वाला है। पक्व फल-मधुर, सुगन्धित, गुरु, विदाही, विष्टम्भि, दुर्जर, दोषकर, आनुलोमिक एवं दुर्गन्धयुक्त
अधोवायु उत्पन्न करने वाला है। बिल्वपत्र-वातहर, शोथहर, ज्वरहर, श्लेष्मनिःसारक, ग्राही एवं आमशूलघ्न होते हैं।
बिल्वमूल-वातनाड़ीसंस्थान के लिये शामक, मधुर, छर्दिघ्न एवं वातहर है। पुष्प-अतिसार, तृषा एवं वमन में
लाभदायक होते हैं। इसकी मज्जा का तैल उष्ण एवं उत्तम वातहर माना जाता है। इसके बीज- १॥ माशे की मात्रा
में अच्छे विरेचक होते हैं।
बिल्व का उपयोग अतिसार, प्रवाहिका, संग्रहणी, मधुमेह, कर्णरोग, वातरोग, वमन, कामला, अर्श, शोथ एवं
ज्वर में किया जाता है।
(१) इसके पके फल का गूदा मृदुविरेचक होने के कारण इसका जल में शर्बत बनाकर लेने से जीर्ण विबन्ध, अर्श,
आध्मान एवं कुपचन में लाभ होता है। जिन्हें बार-बार विबन्ध एवं अतिसार क्रमशः हुआ करता है उन्हें नित्य सुबह यह
दिया जाता है। स्निग्ध एवं मृदुविरेचक रूप में यह प्रवाहिका की रोग-निर्मुक्तावस्था एवं संग्रहणी की प्रारंभिक अवस्था
में दिया जाता है। प्रवाहिका में इसको लेते रहने से विबन्ध नहीं होता जिससे आन्त्रिक व्रण जल्दी अच्छे होते हैं। संग्रहणी
[L
गुडूच्यादिवर्गः ४५५
(६) बिल्वफल को गोमूत्र के साथ पीसकर अजाक्षीर के साथ तैल सिद्ध कर कर्णबिन्दु के रूप में प्रयोग करने
से बाधिर्य में लाभ होता है।
मात्रा- चूर्ण २-८ माशा; प्रवाहीसत्व १/२-२ ड्राम; क्वाथ १/२-२ औंस।
अथ गम्भारी । तस्या नामानि गुणाँश्चाह
गम्भारी भद्रपर्णी च श्रीपर्णी मधुपर्णिका। काश्मीरी काश्मरी हीरा काश्मर्यः पीतरोहिणी ॥१४॥
कृष्णावृन्ता मधुरसा महाकुसुमिकाऽपि च। काश्मरी तुवरा तिक्ता वीर्योष्णा मधुरा गुरुः ॥१५॥
दीपनी पाचनी मेध्या भेदिनी भ्रमशोषजित्। दोषतृष्णाऽऽमशूलार्शोविषदाहज्वरापहा ॥१६॥
गम्भारी के नाम तथा गुण- गम्भारी, भद्रपर्णी, श्रीपर्णी, मधुपर्णिका, काश्मीरी, काश्मरी, हीरा, काश्मर्य,
पीतरोहिणी, कृष्णावृन्ता, मधुरसा और महाकुसुमिका ये सब संस्कृत नाम गम्भारी के हैं। गम्भारी- मधुर, कषाय तथा
तिक्त रस युक्त, उष्णवीर्य, गुरु, अग्निदीपक, पाचक, मेधा के लिये हितकर तथा मलभेदक होती है। वह भ्रम, शोष,
वातादिक दोष, तृषा, आम, शूल, बवासीर, विष, दाह और ज्वर इन सब रोगों को दूर करने वाली होती है। [१४-१६]
अथ गम्भारीफलगुणानाह
तत्फलं बृंहणं वृष्यं गुरु केश्यं रसायनम्। वातपित्ततृषारक्तक्षयमूत्रविबन्धनुत् ॥१७॥
स्वादु पाके हिमं स्निग्धं तुवराम्लं विशुद्धिकृत्। हन्याद्दाहतृषावातरक्तपित्तक्षतक्षयान् ॥१८॥
इसके फल के गुण- इसका फल बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), गुरु, बालों के लिये हितकर और
रसायन होता है। यह वात, पित्त, तृषा, रक्तक्षय, मूत्र सम्बन्धी विबद्धता का नाशक है और पाक में मधुर रस, स्वाद
में कषाय तथा अम्ल रसयुक्त, शीतवीर्य, स्निग्ध एवं शुद्धिकारक होता है। यह दाह, तृषा, वात, रक्तपित्त, क्षत और
क्षय इन सब रोगों को दूर करता है। [१७-१८]
४. गम्भारी
हिं०, पं०- गम्भारी, खम्भारे, कम्भार, गम्भार, गम्हार, कुम्हार, कासमर। बं०- गामार गाछ, गम्बार। म०-
शिवण। गु०- शीवण, सेवन। क०- सीवनी। ते०- गुमारटेक। ता०- गुमड़ी। आसाम- गोमरी। गरो०- बोल्को
बक। मा०- शेवण, शिवण, कुम्भेरेन। ले०- Gmelina arborea Linn. (मेलीना आर्बोरिआ लिन.)। Fam.
Verbenaceae (वर्विनेसी)।
गम्भारी- इस देश के कई प्रान्तों में उत्पन्न होती है, विशेषकर दक्षिण, कोंकण, मध्यभारत, बरार, सिलोन,
पश्चिमोत्तर-हिमालय, चट्टगाँव, पूर्व बंगाल एवं बिहार आदि प्रान्तों में पाई जाती है। इसका वृक्ष- बड़ा होता है। ऊँचाई
में कहीं-कहीं ६० फुट से भी ऊँचा वृक्ष देखने में आता है। छाल का रंग सफेद, ताजी छाल किञ्चित् पीलापन युक्त
हरियाली लिये सफेद तथा सफेदी लिये भूरे रंग की होती है। छाल पर काले चिह्न या छोटे-छोटे गोल दाने होते हैं।
इसकी टहनियाँ- श्वेताभ एवं रोमश होती हैं। काट- प्रायः आधा इञ्च मोटा, बिना रेशे का और हलका या गहरा नारंगी
रंग से मिला रहता है। पत्ते- ४-९ इञ्च लम्बे, ३-७ इञ्च चौड़े, लट्वाकार, चौड़े, प्रायः हृद्वत्, नोकीले, अधरतल पर
प्रायः क्षोदलिप्त, २-६ इञ्च लम्बे वृन्त से युक्त और आमने-सामने, परन्तु प्रायः एक सन्धि के दोनों पत्ते कुछ छोटे-बड़े
होते हैं। वसन्त ऋतु में पुराने पत्ते गिरकर नये पत्ते निकलते हैं। इसी समय ३-८ इञ्च लम्बी मंजरियों में रक्ताभ या पीले
रंग के १-१.५ इञ्च लम्बे फूल आते हैं और उन पर भूरे रंग की छींटें रहती हैं। फल- बहेड़े के समान परन्तु कुछ लम्बाई
लिये अष्ठिल, अभ्यण्डाकार, .७५-१ इञ्च व्यास वाले और २-१ कोश तथा बीज वाले होते हैं। वे जेष्ठ आषाढ़ तक
पक कर भूमि में गिर पड़ते हैं।
४५६भावप्रकाशनिघण्टुः
इसके दो भेद भी पाये जाते हैं जिनमें से एक में पुष्पव्यूह बड़े होते हैं तथा दूसरे में पत्ते कुछ छोटे, चर्मल, अधर
तल पर नसें उभरी हुई तथा पुष्पव्यूह छोटे होते हैं।
यह दशमूल गण की औषध है। इसका 'कासमर' नाम काश्मर्य का और 'गम्हार' गम्भारी की अपभ्रंश है। इसके
फल, मूल, त्वक एवं पत्र का चिकित्सा में उपयोग होता है।
रासायनिक संगठन—इसके मूल में पीतवर्ण का गाढ़ा तैल, राल, क्षाराभ, अत्यल्प बेंजोइक् एसिड एवं मैगॅनीज
रहित राख ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसके फल में ब्यूटिरिक् (Batyric) तथा टार्टरिक् (Tartaric) अम्ल, क्षाराभ,
शर्करा सदृश पदार्थ, राल तथा अत्यल्प टैनिन ये पदार्थ पाये जाते हैं।
गुण और प्रयोग—इसके कोमल पत्र शीतल तथा स्नेहन; फल तृषाहर, दाहशामक, स्नेहन एवं रक्तपित्तघ्न; मूल
कटु, दीपन, बल्य एवं आनुलोमिक; पुष्प बल्य, वृष्य एवं रक्तपित्तनाशक; बीजतैल कफ एवं पित्त का शमन करने वाला
है।
(१) इसके कोमल पत्तों का स्वरस दुग्ध के साथ सोजाक में देते हैं। ग्रीष्मऋतु में होने वाले शिरःशूल में पत्तों
को दुग्ध में पीसकर सर पर मलते हैं।
(२) दाह तथा तृषायुक्त पैत्तिक ज्वर में इसके फल की मज्जा का शीतल क्वाथ शर्करा मिलाकर पिलाते हैं। रक्तपित्त
में मधु के साथ इसके फल की मज्जा का प्रयोग किया जाता है। वायु के कारण गर्भशोष या बालशोष हो तो मुलेठी
के साथ इससे सिद्ध दुग्ध का उपयोग लाभदायक होता है।
(३) इसके मूल का क्वाथ ज्वर, अपचन तथा शोथ में देते हैं। मुलेठी के साथ बनाया हुआ इसका क्वाथ मधु
एवं शर्करा मिलाकर दुग्धवृद्धि के लिये देते हैं। स्तनपुष्टि के लिये इसके रस से सिद्ध तिल तैल में रूई भिगोकर उसके
धारण का विधान है।
मात्रा—मूलचूर्ण ३-६ माशा; फल १-३ माशा।
प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण—(क) अरिया कासमर या बूढ़ीकासमर के नाम की एक अन्य वृक्ष जाति (Premna
flavescens Ham.– प्रेम्ना फ्लॅवेसेन्स हॅम्) भी पाई जाती है जिसके पत्ते गंभारी के पत्तों से मिलते-जुलते हैं। इसकी
पत्तियों में एक मंद प्रिय गंध होती है और इसके पुष्प तथा फल बहुत छोटे होते हैं जिनसे इसका भेद मालूम हो जाता
है।
(ख) हिं०—तुम्ब्री, पिंडार, धवलपेड, पानी-गम्हार। म०—सिवनी, पितारी। बं०—पितालि। ले०—Trewia
nudiflora Linn. (ट्रेविआ न्युडिफ्लोरा लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बिएसी)।
इसके भी गम्हार एवं सिवनी (म०) नाम होने के कारण वास्तविक गम्हार के स्थान पर इसका कहीं-कहीं प्रयोग
लोग करते हैं। इसके बड़े-बड़े वृक्ष होते हैं। छाल—चिकनी और धूसर वर्ण की होती है। पत्ते—लट्वाकार, ३-८ इञ्च
लम्बे एवं ४-७ इञ्च चौड़े होते हैं। पर्णमूल गोल या हृद्वत् और पर्णवृन्त १.५-४ इञ्च लम्बा होता है। पुष्प—हरित-
पीत होते हैं और नवीन पत्तियों के आने के पहले ही निकलते हैं। नरपुष्पों की मंजरियाँ ४-८ इञ्च लम्बी और नीचे की
ओर लटकी हुई तथा स्त्री-पुष्प एकाकी अथवा २-३ और अग्र्य होते हैं। फल—पकने पर छोटे आलू के समान दिखाई
देता है। नवीन शाखाओं पर जातच्युत उपपत्रों के कारण उभरी हुई स्पष्ट रेखाएँ होती हैं जिनके द्वारा वास्तविक गम्हार
से इसकी भिन्नता मालूम होती है। इसके अतिरिक्त गम्हार की तरह इसकी पत्ती में दो छोटी पीली ग्रन्थियाँ नहीं होतीं
यद्यपि दोनों के शिराक्रम में बहुत साम्य होता है। इसके मूल का उपयोग किया जाता है। मूल की छाल मोटी एवं चिकनी
तथा हलके भूरे रंग की होती है। इसका स्वाद कसैला एवं कड़वा होता है। आमवात एवं वातरक्त में मूल को खिलाते
हैं तथा लेप करते हैं। इससे उदरवात, पित्त एवं आमदोष का निर्हरण होता है।
गुडूच्यादिवर्गः ४५७
अथ पाटला (पाढला) घण्टापाटलिंश्च । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह
पाटलि पाटलाऽमोघा मधुदूतो फलेरुहा । कृष्णवृन्ता कुबेराक्षी१ कालस्थाल्यलिवल्लभा ॥१९॥
ताम्रपुष्पी च कथिताऽपरा स्यात्पाटला सिता । मुष्कको मोक्षको घण्टापाटलिः काष्ठपाटला ॥२०॥
पाढल तथा घण्टापाढल के नाम और गुण-पाटलि, पाटला, अमोघा, मधुदूती, फलेरुहा, कृष्णवृन्ता,
कुबेराक्षी, कालस्थाली, अलिवल्लभा और ताम्रपुष्पी ये सब संस्कृत नाम 'पाढल' के हैं। और जो दूसरा 'घण्टापाढल'
है उसके संस्कृत नाम-पाटला सिता, मुष्कक, मोक्षक, घण्टापाटलि तथा काष्ठपाटला ये सब हैं। [१९-२०]
पाटला तुवरा तिक्ताऽनुष्णा दोषत्रयापहा । अरुचिश्वासशोथास्रच्छर्दिहिक्कातृषाहरी ॥२१॥
पाढल-कषाय तथा तिक्तरस युक्त एवं अनुष्णवीर्य है। यह त्रिदोष, अरुचि, श्वास, शोथ, रक्तप्रकोप, वमन,
हिचकी और तृषा को दूर करने वाली है। [२१]
अथ तत्पुष्पफलयोर्गुणानाह
पुष्पं कषायं मधुरं हिमं हृद्यं कफास्रनुत् । पित्तातिसारहृत्कण्ठ्यं फलं हिक्काऽस्रपित्तहृत् ॥२२॥
इसके फूल तथा फल के गुण-फूल-कषाय तथा मधुर रस युक्त, शीतवीर्य, हृदय को हितकर तथा कफ,
रक्तविकार और पित्तातिसार का नाशक एवं कण्ठ के लिये हितकर है। फल-हिचकी तथा रक्तपित्त का नाशक हैं। [२२]
नोट-भावप्रकाशकार पाटला के दो भेद लिखते हैं एक 'पाटला' तथा दूसरी 'सिता पाटला'। किन्तु दोनों के गुणों
में कोई भेद नहीं लिखा है। आधुनिक ग्रन्थकारों ने भी इसके दो प्रकार के वृक्षों का वर्णन किया है जिसमें से नं० ५
(पाटला) के पुष्प बाहर से लाल किन्तु अन्दर से पीली रेखाओं से युक्त होते हैं। यह दक्षिण में कम होने के कारण इसके
स्थान पर वहाँ नं० ६ (सिता पाटला) का प्रयोग किया जाता है जिसके पुष्प पीले तथा गुलाबी रंग के होते हैं। श्री ठा०
बलवन्तसिंह जी का मत है-काष्ठपाटला, मोक्षक यह भिन्न वर्ग तथा प्रजाति का वृक्ष है जिसका लैटिन नाम
Schrebera swietenioides Roxb. (श्रेबेरा स्वीटेनिओइडिस् राक्स०); Fam. Oleaceae (ओलिएसी) है तथा
इसी के क्षार को क्षार श्रेष्ठ कहा गया है। भावप्रकाशकार ने भी इसका (मोक्षक) स्वतंत्र वर्णन आगे वटादिवर्ग में किया
है। इस दृष्टि से मोक्षक यह पाटला का पर्याय असमीचीन लगता है।
५. पाढल
हिं०-पाढ़ल, पाडर, पारल। बं०-पारुल गाछ। म०, गु०-पाड़ल। क०-हुडै। उ०-बोरो, पाटुली।
पं०-पाढ़ल, पाडल। कोल०-कंडियोर। सन्ता०-पपरी, पडेर। ने०-परैर। लि०-सिगियन। गोंड०-उन्तकार,
पड़र। मील०-पन, डन। म०-पाडल, पडियालु। ले०-Stereospermum suaveolens DC. (स्टेरियोस्पर्मम्
स्वावियोलेन्स डीसी)। Fam. Bignoniaceae (बिग्नोनिएसी)।
यह प्रायः समस्त भारत, हिमालय की तराई से ट्रावनकोर और टेन स्रीम तक तथा सिलोन में किन्तु श्वेत भेद
की अपेक्षा कुछ शुष्क भागों में पाया जाता है। इसका वृक्ष-३० से ६० फुट तक ऊँचा एवं सुन्दर होता है। इसके
ऊँचे स्तम्भ पर शाखाएँ दिखाई पड़ती हैं। इसके नवीन भाग चिपचिपे, रोमश और ग्रन्तिमय होते हैं। छाल-चौथाई इञ्च
मोटी, लगभग चिकनी, धूसर और काटने पर हलके पीले रंग की होती है और उसमें कड़े तथा मुलायम पर्त बारी-बारी
से निकलते हैं। पत्ते-विपरीत, १-२ फीट लम्बे और अयुग्म पक्षाकार होते हैं। पत्रक-संख्या में ५-९ प्रायः ७,
१. काचस्थाली इति पाठ०।
४५८ भावप्रकाशनिघण्टुः
अंडाकार या आयताकार, ३-८ इञ्च लम्बे, २-३॥ इञ्च चौड़े, यकायक लम्बाग्र, अवृन्त या छोटे वृन्त वाले, प्रायः
मृदुरोमश परन्तु छोटे पौधे के पत्रक खुरखुरे और तीक्ष्ण दन्तुर होते हैं। वसन्त ऋतु में इसके पुराने पत्ते गिरकर नवीन
पत्ते निकल आते हैं और प्रायः इसी समय वृक्षों पर नलिकाकार फूल आते हैं। पुष्प-सुगन्धित, १-१.५ इञ्च लम्बे, बाहर
से लाल परन्तु भीतर पीली रेखाओं से युक्त होते हैं। फलियाँ-१८ से २४ इञ्च तक लम्बी, गोल एवं पृष्ठ पर बिन्दुकित
होती हैं। बीज-सपक्ष होते हैं और कार्क सदृश और लम्बगोल रचनाओं में छिपे रहते हैं।
यह भी दशमूलगण का एक प्रसिद्ध द्रव्य है। इसके फल के भीतर से लम्बगोल टुकड़े निकाल कर जुलपित्ती
तथा अधकपारी में बाँधे जाते हैं इसलिए कहीं-कहीं इस वृक्ष को अधकपारी कहते हैं। इसका छाल, पुष्प तथा फलमज्जा
का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है।
रासायनिक संगठन-इसके सूखे हुए फूलों में शर्करा, एक तरह का लुआब तथा मांसल पदार्थ पाये जाते हैं।
पुष्प जल में डालने से जल सुगन्धित हो जाता है।
गुण और प्रयोग-इसके पुष्प वाजीकर, पौष्टिक एवं शीतल होते हैं। इसकी छाल कफघ्न, वातहर, अधोभाग
दोषहर, त्रिदोषघ्न, विषघ्न एवं शोथहर हैं।
कफ तथा वातप्रधान रोगों में पाटला का प्रयोग करते हैं।
(१) फूलों का रस मधु के साथ हिचकी में देते हैं।
(२) मधुमेह, अश्मरी एवं मूत्राघात में इसके पंचांग का क्षार तैल के साथ खिलाते हैं।
(३) इसके छाल का फांट अम्लपित्त में देते हैं।
(४) इसके फूलों का गुलकन्द पौष्टिक माना जाता है।
(५) इसके मूल के घन क्वाथ में तैल मिलाकर अग्निदग्ध व्रण पर लगाते हैं तथा कोमल पत्तों से व्रणबन्धन
करते हैं।
मात्रा-चूर्ण १-३ माशा।
६. सफेद पाढ़ल (घंटा पाढ़र)
हिं०-सफेद पाढ़ल, पाडर, परारी, घण्टा पाढ़र, कठपाडर। बं०-घंटा पारुल। म०, गु०-पाडल। ता०-
पादिरि। ते०-कलिगोट्टु। कोल०-कंडियोर। ने०-पररी। भील०-पडुरनी। उ०-कोगारी पाटुली। अं०-
Trumpet flower (ट्रम्पेट फ्लावर)। ले०-Stereospermum chelonoides DC. (स्टेरिओस्पर्मम् केलोनॉइडिस्
डीसी०)।
यह आसाम से सिलोन तक की गीली भूमि में, कुमाऊँ के पहाड़ पर, मध्य और दक्षिण हिन्दुस्तान तथा राजपूताना
आदि कई प्रान्तों में होता है। यह दक्षिण में पहाड़ी प्रान्तों में विशेषकर पाया जाता है।
इसका वृक्ष-३०-४० फुट तक ऊँचा होता है तथा कहीं-कहीं ६० फुट ऊँचा वृक्ष भी देखने में आता है।
स्तम्भ-सीधा, बहुत ऊँचा एवं मोटा होता है और उस पर अनेक शाखाप्रशाखाएँ होती हैं। नीचे की शाखाएँ भूमि के
समानान्तर एवं ऊपर की सीधी होती हैं। छाल-भूरे रंग की, मोटी तथा खुरदरी होती है। पत्ते-१२-१८ इञ्च लम्बे,
अयुग्म पक्षाकार, विपरीत और छोटी-छोटी टहनियों के अग्र पर समूहबद्ध होकर रहते हैं। पत्रक-संख्या में ७-११,
चिकने, अंडाकार और ३.५-५ इञ्च बड़े होते हैं। फूल-बड़े, तूर्याकृति, पीले और गुलाबी रंग के, सुगन्धित एवं रुचिकर
होते हैं। फलियाँ-१०-२० इञ्च लम्बी, पतली, घेरे में गोल न होकर सपक्ष या चार उभरी हुई रेखाओं से युक्त होती
हैं।
गुडूच्यादिवर्गः ४५९
प्रथम पाढल दक्षिण में कम मिलने के कारण वहाँ इस वृक्ष की छाल तथा पुष्प का पाटला के स्थान पर प्रयोग
किया जाता है।
रासायनिक संगठन-इसमें एक रवेदार कड़वा पदार्थ पाया जाता है।
गुण और प्रयोग-यह शीतल, वातहर एवं ज्वरघ्न है। मस्तिष्क तथा वातनाड़ी संस्थान पर इसकी अवसादक
क्रिया होती है।
इसके मूल का फांट ज्वर में रोगी को शांतता लाने के लिये देते हैं। इसके फूलों का रस पाचन ठीक होकर दूषित
पित्त का निर्हरण हो इसलिये देते हैं।
मात्रा-चूर्ण १-३ माशा।
अथाग्निमन्थः । (अगेथू, अरनी इति च लोके) तस्य नामानि गुणाँश्चाह
अग्निमन्थो जयःसस्याच्छ्रीपर्णी गणिकारिका । जया जयन्ती तर्कारी नादेयी वैजयन्तिका ।।२३।।
अग्निमन्थः श्वयथुनुद्दीर्घोष्णः कफवातहृत् । पाण्डुनुक्तटुकस्तिक्तस्तुवरो मधुरोऽग्निदः ।।२४।।
अगेथू या अरनी के नाम तथा गुण-अग्निमन्थ, जय, श्रीपर्णी, गणिकारिका, जया, जयन्ती, तर्कारी, नादेयी
और वैजयन्तिका ये सब संस्कृत नाम 'अगेथू' या 'अरनी' के हैं। अरनी या अगेथू शोथनाशक, उष्णवीर्य, कफवात
तथा पाण्डु रोग को दूर करने वाला, कटु, तिक्त, कषाय तथा मधुर रस युक्त एवं अग्निवर्धक है। [२३-२४]
नोट-भावप्रकाशकार ने यद्यपि एक ही अग्निमंथ का वर्णन किया है तथापि अन्य निघंटुओं में लघु एवं बृहद् ऐसे
दो भेद अग्निमंथ के लिखे हैं। दोनों के गुणों में विशेष अन्तर नहीं हैं किन्तु लघु अग्निमंथ को लेप, उपनाह एवं शोफ
में विशेष उपयोगी लिखा है। 'लघ्वाग्निमंथस्य गुणाः प्रोक्ताः वृद्धाग्निमंथवत् । विशेषाल्लेपने चोपनाहे शोफे च कीर्तितः ।।'
(नि० र०)। सुश्रुत के वरुणादि गण में तर्कारी और अग्निमंथ ये दोनों शब्द आये हैं। इससे ऐसा मालूम होता है कि
ये दोनों भिन्न द्रव्य हैं। आधुनिक ग्रन्थकारों ने प्रेम्ना इण्टैग्रिफोलिआ (बृहद् अग्निमंथ) एवं क्लेरोडेण्ड्रम फ्नोमाइडीस् (क्षुद्र
अग्निमंथ) ऐसे दो द्रव्यों का वर्णन किया है। ये दोनों ही एक वर्ग के हैं तथा इनके गुणों में भी साम्य होने के कारण
दोनों को एक दूसरे के स्थान में प्रयोग किया जा सकता है। इनमें से प्रथम को कुछ लोगों ने तर्कारी माना है तथा द्वितीय
को अग्निमंथ माना है। कुछ लोग इसके विपरीत मानते हैं जो अधिक उचित है क्योंकि क्लो० फ्लोमाइडिस्का स्थानिक
नाम 'टेकार', तर्कारी का अपभ्रंश मालूम होता है। यहाँ दोनों का अलग-अलग वर्णन दिया जा रहा है।
७. क्षुद्राग्निमंथ
हिं०-अरनी(णी), टेकार, उरिन। बं०-अरनी, गणियारी। संथा-पनजोत। मुंगे०-रैन। गु०-अरणी।
म०-ऐरण, टांकली। ता०-थलंजी। ते०-तलूंकि। क०-तग्गि। मल०-तिरूतालि। ले०-Clerodendrum
phlomidis Linn. f. (क्लेरोडेण्ड्रम् फलोमाइडीस् लिन. । Fam. Verbenaceae (वर्बिनेसी)।
यह महाराष्ट्र, गुजरात, सिंध आदि सब प्रान्तों में प्रायः बाडों पर या सूखी जगहों में पाई जाती है।
इसके गुल्म-बड़े (छोटे वृक्ष), प्रायः शाखाएँ-प्रसरणशील और टहनियाँ हलके खाकी रंग की तथा मृदुरोमश
होती हैं। पत्ते-विपरीत, चौड़े लट्वाकार अथवा कुछ-कुछ तिर्यगायताकार, अखण्ड या दूर-दूर गोलदन्तुर, प्रायः
२ x १.५ इञ्च बड़े, सवृन्त और मृदुरोमश (नवीन) या चिकने होते हैं। पुष्प-श्वेत, सुगंधि, पत्रकोणीय या अग्र्य गुच्छों
में आते हैं। आभ्यंतर नाल .७५-.१ इञ्च बड़ा और मुख व्यास में .७५ इञ्च होता है। फल-अष्ठिल फल, करौंदे इतने
बड़े, शीर्ष पर दबे हुए परन्तु अन्त में शुष्क होकर चार खण्डों में फट जाते हैं। जानवरों के प्रवाहिका तथा कृमिरोग
में क्षुद्राग्निमंथ का उपयोग ग्रामीण करते हैं। बृहद् अग्निमंथ के अभाव में इसके पंचांग, मूल तथा पत्र का उपयोग किया
जाता है।
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४६० भावप्रकाशनिघण्टुः
गुण और प्रयोग—यह उष्ण, दीपन, सारक, बल्य, रसायन, शोथहर एवं वात-कफहर है।
वायु, कफ तथा सूजन जिन-जिन रोगों में होता है उनमें इसका उपयोग करते हैं। आमवात तथा आन्तरिक ज्वर
में इसकी जड़ सोंठ एवं मिरिच के साथ दी जाती है। इसके मूल का क्वाथ सोजाक, विस्फोटक ज्वरों की रोगमुक्तावस्था,
आमवात तथा नाड़ीशूल में देते हैं। इसके पत्र तथा काण्ड का उपयोग मधुमेह में उपयोगी पाया गया है। आध्मान में
इसके पत्ररस से लाभ होता है। मोच तथा शरीरपीड़ा में पत्तों को पीसकर उसका लेप किया जाता है। त्वचा के रोगों
में १/२ औ० पत्ररस दिन में दो बार पिलाते हैं।
मात्रा—चूर्ण १-२ माशा।
८. बृहदग्निमंथ
हिं०—अरनी, अरणी, अंगेथु, गणियारी, गनियार, गनियारी, वाकर। बं०—गनिर, गनियारि। मा०—अरणी।
म०—नरवेल, अरणी। प्र०—अगेथु, गनियार। गु०—अरणी। संथा०—कण्ड्रा-मिया। फा०—गनियार। अवधी—
गन्नियारी। गढ़वाल—बकोरचा। ता०—इरुमै मुल्लै, मुन्नै। ने०—गिनेरी। उडि०—गन्धौना। ते०—घेबुनेल्लिल। मला०—
अप्पेल। उत्क०—अगबिथ। ले०—(प्रेम्ना इण्टेग्रिफोलिआ लिन.)। (वर्बिनेसी)।
वह बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश, अवध, गढ़वाल, राजपुताना, दक्षिण-हिन्दुस्तान, बम्बई, सिलोन तथा अन्यान्य
प्रान्तों में विशेष रूप से समुद्री किनारों पर पाई जाती है।
इसका झाड़ीदार वृक्ष—३०-३५ फुट तक ऊँचा होता है। स्तम्भ छोटा तथा बहुत सी काँटेदार टहनियाँ नीचे लटकी
हुई रहती हैं। छाल—पतली सफेदी-युक्त हलके पीले रंग की और लकड़ी हलकी किंचित् दृढ़ होती है। पत्ते—विपरीत,
लम्बे, पर्णवृन्त से युक्त, साधारण हृदया-कृति किन्तु अग्र कुछ कटा हुआ तथा चिकने रहते हैं। चैत्र-वैशाख में छोटे-
छोटे हरापन लिये सफेद रंग के फूल झूमकों में आते हैं। फल—छोटी मकोय के समान झूमकों में लगते हैं और पकने
पर काले हो जाते हैं। पूरे वृक्ष में एक प्रकार की उग्र गंध आती है। इसका स्वाद खट्टा सा तथा कषाय रहता है। इसके
मूल तथा पत्तों का व्यवहार किया जाता है।
इसका एक अन्य भेद प्रेम्ना लैटिफोलिया राक्स. (Premna latifolia Roxb.) पाया जाता है। इसके पत्ते
कुछ-कुछ दुर्गन्धयुक्त, प्रायः लट्वाकार, कभी-कभी अंडाकार, ३-५ इञ्च लम्बे, २-३ इञ्च चौड़े, अखंड, लम्बे नोकवाले
तथा एक ओर (नीचे) या नवीन रहने पर दोनों तलों पर मृदुरोमश होते हैं। पुष्पव्यूह-त्रि-विभक्त और व्यास में २-५ इञ्च,
रोमश और कोण पुष्पकों से युक्त होता है। बाह्यकोश शीर्ष पर दन्तुर होता है और दाँत पाँच होते हैं। आभ्यन्तर कोश
स्पष्टतः द्वयोष्ठ होता है। फल—गोल, अग्र पर दबा हुआ और .२५ इञ्च बड़ा होता है।
इसका जो भेद इस प्रान्त के शाल वनों में मिलता है उसे प्रे० मक्रोनॅटा राक्स (P. mucronata Roxb.) कहते
हैं। यह नम स्थानों में प्रायः बहुत बड़ा हो जाता है। नवीन शाखाओं पर प्रायः १-३ इञ्च लम्बे मजबूत कांटे होते हैं
और इनकी पत्तियाँ तीन-तीन या चार-चार एक चक्र में होती हैं। काट प्रायः १/२ इञ्च मोटा, सफेद और बिना रेशे का
होता है। पत्तियाँ मसलने पर गंधयुक्त और सूखने पर काली हो जाती हैं। इस वृक्ष की लकड़ियों को परस्पर रगड़ने से
आग पैदा होती है। इसके अन्य भी कई भेद होते हैं।
गुण और प्रयोग—यह कटु, उष्ण, तिक्त, शोथघ्न, वातहर, दीपन, श्लेष्मघ्न, ज्वरघ्न, सारक, शीत प्रशमन,
अनुवासनोपग तथा गर्भाशय के लिये अवसादक है।
इसका प्रयोग वातरोग, कफरोग, शोथ, आमवात, नाड़ीशूल, पांडु, अर्श, अग्निमांद्य, विबंध, प्रतिश्याय, ज्वर एवं
पर्यायिक तथा विस्फोटक ज्वर में किया जाता है।
गुडूच्यादिवर्गः ४६१
(१) इसकी २ छटाक जड़ को चौगुने जल में १५ मिनट उबाल कर १-२ छटाक की मात्रा में दीपन, पाचन,
पौष्टिक रूप में दो बार पिलाते हैं।
(२) गंडमाला तथा शोथ में इसको खिलाते हैं तथा बाह्य लेप भी करते हैं। ग्रन्थि पर बाँस के पत्तों के साथ इसकी
जड़ का लेप करने से लाभ होता है।
(३) अर्श में इसके क्वाथ में बैठाने से पीड़ा शांत होती है।
(४) उरुस्तम्भ में इसकी जड़ को गोमूत्र में पीस कर लेप करते हैं या करंज के साथ क्वाथ बनाकर उससे सिंचन
करते हैं।
(५) वसामेह तथा इक्षुमेह में इसकी जड़ का क्वाथ पिलाया जाता है।
(६) इसकी जड़ को पीसकर घृत के साथ सेवन करने से १ सप्ताह में शीतपित्त, उददर्द तथा कोठ आदि अच्छे
होते हैं।
(७) अतिस्थौल्य में इसका रस दिया जाता है।
मात्रा- चूर्ण १-२ माशा।
अथ श्योनाकः (सोनापाठा-अरलू)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह
श्योनाकः शोषणश्च स्यान्नटकट्वङ्गटुण्डुकाः । मण्डूकपर्णपत्रोर्णशुकनासकुटन्नटाः ॥२५॥
दीर्घवृन्तोऽरलुश्चापि पृथुशिम्बः कटम्भरः । श्योनाको दीपनः पाके कटुकस्तुवरो हिमः ।
ग्राही तिक्तोऽनिलश्लेष्मपित्तकासप्रणाशनः ॥२६॥
सोनापाठा या अरलू के नाम तथा गुण-श्योनाक, शोषण, नट, कट्वङ्ग, टुण्टुक, मण्डूकपर्ण, पत्रोर्ण,
शुकनास, कुटन्नट, दीर्घवृन्त, अरलु, पृथुशिम्ब और कटम्भर ये सब संस्कृत नाम 'सोनापाठा' के हैं। सोनापाठा-
अग्निदीपक, पाक में कटुरस तथा स्वाद में कषाय और तिक्तरस से युक्त, शीतवीर्य और मलसंग्राहक है। यह वात, कफ,
पित्त तथा कास का विनाशक है। [२५-२६]
अथ श्योनाकस्य बालप्रौढफलयोर्गुणानाह
टुण्डुकस्य फलं बालं रूक्षं वातकफापहम् ॥२७॥
हृद्यं कषायं मधुरं रोचनं लघु दीपनम् । गुल्मार्शःकृमिहत् प्रौढं गुरु वातप्रकोपणम् ॥२८॥
इसके कोमल तथा प्रौढ़ फल के गुण-सोनापाठा का कोमल फल रूक्ष, वातकफनाशक, हृदय को हितकर,
कषाय तथा मधुररस युक्त, रोचक, लघु तथा अग्निदीपक एवं गुल्म, बवासीर तथा कृमि का नाशक होता है। इसका
प्रौढ़ (पूरा तैयार) फल-गुरु तथा वात को प्रकुपित करने वाला होता है। [२७-२८]
९. सोनापाठा
हिं०-सोनापाठा, शोनाक, सोनपत्ता, टेंटू, अरलु। बं०-शोण, सोनागाछ। म०-टेंटू। गु०-टेंटु। ते०-
दुन्दिलुम्, पंपन। उ०-पम्पोनिया। पं०-मुलिन, तात्पलङ्ग। ता०-पन, वंग। ने०-तोतिल्ल। कोल०-अरेंगेवनुं।
सन्ता०-बनहाटक। गोंड०-जयमंगल। आसा०-केरिंग। का०-तातर। वर्मा-क्योंग-शा। सिलो०-तोतिल्ल।
ले०-Oroxylum indicum Vent. (ओरोक्झाइलम् इण्डिकम् वेण्ट)। Fam. Bigoniaceae (बिग्नोनिएसी)।
यह सब प्रान्तों में कहीं-कहीं पाया जाता है किन्तु पश्चिम प्रान्त की सूखी भूमि में यह देखने में नहीं आता।
इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है तथा शाखाएँ थोड़ी होती हैं। छाल-चौथाई इञ्च तक मोटी, कार्कयुक्त तथा
बादामी सफेद रङ्ग की चिकनी, हल्की और कोमल होती है। इसको काटने से किंचित् हरियाली लिये रस निकलता है।
४६२ भावप्रकाशनिघण्टुः
काट-१/२-१ इञ्च मोटा, अन्दर की ओर रेशेदार, पीला और बाहर की ओर हरिताभ होता है। लकड़ी-पीलापन युक्त
सफेद, हल्की और सार रहित होती है। पत्ते-२-४ फीट लम्बे, द्विपक्षवत् सदल तथा शाखग्रों पर प्रायः समूहबद्ध होकर
पाये जाते हैं। पत्रनाल और पत्रदण्ड पर दाने पड़े होते हैं। पत्रक-२।।-५ इञ्च लम्बे, १।।-४ इञ्च चौड़े, लट्वाकार या
अंडाकार, लम्बाग्र तथा अखण्ड होते हैं। फूल-बहुत बड़े, मांसल और जामुनी रंग के तथा अग्र्य मंजरियों में
सवृन्तकाण्डज क्रम से निकले रहते हैं। इनकी गन्ध अच्छी नहीं होती। फलियाँ-१-३ फुट लम्बी, २-३।। इञ्च चौड़ी,
चिपटी, तलवार के समान टेढ़ी एवं कठोर होती हैं। बीज-सफेद, चिपटे, गोल, २-३ इञ्च व्यास वाले तथा आधार
के अतिरिक्त चारों ओर पंखयुक्त होते हैं। इसके मूल की छाल का दशमूल में उपयोग किया जाता है। यह हलके पीले
रंग की रहती है तथा इसका स्वाद कुछ कड़वा तथा कुछ तीता रहता है। इसमें गन्ध नहीं होती।
रा० नि० ने इसके यद्यपि दो भेद लिखे हैं तथापि गुणों में अन्तर नहीं लिखा है। कुछ लोग 'अरलू' नाम से
Alianthus excelsa Roxb. (ऐलेन्थस् एक्सेल्सा राक्स.) लेते हैं और उसी को रा० नि० का श्योनाक भेद मानते
हैं। ऐलेन्थस् एक्सेल्सा को कुछ लोगों ने महानिंब माना है।
रासायनिक संगठन-इसकी छाल में ओरोक्झाइलिन् (Oroxylin) नामक एक कडुवा रवेदार ग्लूकोसाइड,
कटुपदार्थ, पेक्टिन, तैल एवं मोम आदि पदार्थ पाये जाते हैं।
गुण और प्रयोग-सोनापाठा के मूल की छाल उत्तम स्वेदजनन, कुछ वेदनास्थापन, दीपन, बस्तिरोगहर, स्तम्भन,
व्रणरोपण एवं शोथहर है। इसके बीज रेचक होते हैं। इसकी छाल का प्रयोग आमवात, अतिसार, कास, अरुचि एवं
ज्वर में किया जाता है।
(१) शोथ तथा वातप्रधान रोगों में श्योनाकमूल देते हैं। यह नवीन आमवात में बहुत लाभ करता है। सोंठ के
साथ इसका फांट (१ : १०) बनाकर १ औंस दिन में त्रिबार देते हैं। इसके चूर्ण के साथ अफीम मिलाई जा सकती है।
यह डोवर्स् पाउडर (Dover's powder) की अपेक्षा उत्तम स्वेदजनन तथा वेदनाहर है। छाल का क्वाथ अधिक
स्तम्भन होने के कारण इसके फांट का प्रयोग उचित है। विवन्ध होने पर एरंड तैल का प्रयोग करना चाहिये। आमवात
में इसके क्वाथ से शोथयुक्त संधियों को सेंकते हैं जिससे सूजन तथा पीड़ा कम होती है।
(२) इसकी छाल के कल्क तथा पद्मकेसर को गंभारी एवं कमल के पत्तों में लपेटकर, पुटपाक करके निकला
हुआ रस शीत होने पर मधु मिलाकर, अतिसार में दिया जाता है।
(३) इसकी छाल से सिद्ध तैल का उपयोग कर्णस्राव तथा कर्णशूल में किया जाता है। बहुत दिन के प्रयोग के
बाद इससे लाभ होता है।
(४) कहा जाता है कि अठन्नी भर छाल पीसकर छानकर दूध के साथ पिलाने से मिर्गी में लाभ होता है।
(५) कर्णमूल शोथ में इसके बीज और हरिमेद दोनों पीसकर लगाये तथा पिलाये
जाते हैं।
मात्रा-चूर्ण १०-२० र० त्रिकटु के साथ।
अथ बृहत्पञ्चमूलम् । तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह
श्रीफलः सर्वतोभद्रा पाटला गणिकारिका। श्योनाकः पञ्चभिस्तैःतैः पञ्चमूलं महत्स्मृतम् ।। २९ ।।
पञ्चमूलं महत् तिक्तं कषायं कफवातनुत्। मधुरं श्वासकासघ्न्नमुष्णं लघ्वग्निदीपनम् ।। ३० ।।
बृहत् पञ्चमूल के लक्षण तथा गुण-बेल, गम्भारी, पाढल, अरनी और सोनापाठा इन पाँचों वृक्षों के मूल एकत्र
करने से 'बृहत् पञ्चमूल' होता है। बृहत् पञ्चमूल-तिक्त, कषाय तथा मधुर रसयुक्त, कफवातनाशक एवं श्वास तथा
कास को दूर करने वाला, उष्णवीर्य, लघु और अग्निदीपक होता है। [२९-३०]
गुडूच्यादिवर्गः ४६३
अथ शालपर्णी (सरिवन) तस्या नामानि गुणाँश्चाह
शालपर्णी१ स्थिरा सौम्या त्रिपर्णी पीवरी गुहा । विदारिगन्धा दीर्घाङ्गी२ दीर्घपत्राऽशुमत्यपि ॥३१॥
शालपर्णी गुरुश्छर्दिज्वरश्वासातिसारजित् ।।३२।।
शोषदोषत्रयहरी बृंहण्युक्ता रसायनी । तिक्ता विषहरी स्वादुः क्षतकासकृमिप्रणुत् ।।३३।।
'सरिवन' के नाम तथा गुण—शालपर्णी, स्थिरा, सौम्या, त्रिपर्णी, पीवरी, गुहा, विदारिगन्धा, दीर्घाङ्गी, दीर्घपत्रा
तथा अंशुमती ये सब संस्कृत नाम 'सरिवन' के हैं। सरिवन—पाक में गुरु और वमन, ज्वर, श्वास, अतिसार, शोष तथा
त्रिदोष का नाशक है एवं बृंहण, रसायन, तिक्त तथा मधुर रसयुक्त और विष, क्षयकास तथा कृमि का भी नाशक है। [३१-
३३]
१०. शालपर्णी
४६४ भावप्रकाशनिघण्टुः
इसका प्रयोग ज्वर, वातरोग, अतिसार, वमन, शोथ, प्रमेह, अर्श, कृमि, राजयक्ष्मा एवं क्षत कास में किया जाता
है। श्वासनलिकाशोथ, फुप्फुसशोथ तथा सूतिकाज्वर में इससे विशेष लाभ होता है। इसके पंचांग के क्वाथ में कालीमिर्च
मिलाकर रक्तविकार में प्रयोग करते हैं।
मात्रा—चूर्ण १/२-१ तोला।
अथ पृश्निपर्णी (पिठवन) तस्या नामानि गुणाँश्चाह
पृश्निपर्णी पृथक्पर्णी चित्रपर्ण्यहिपर्ण्यपि¹। क्रोष्टुविन्ना सिंहपुच्छी कलशी धावनिर्गुहा ॥३४॥
पृश्निपर्णी त्रिदोषघ्नी वृष्योष्णा मधुराऽसरा। हन्ति दाहज्वरश्वासरक्तातीसारतृड्वमीः ॥३५॥
पिठवन के नाम तथा गुण—पृश्निपर्णी, पृथक्पर्णी, चित्रपर्णी, अहिपर्णी, क्रोष्टुविन्ना, सिंहपुच्छी, कलशी, धावनी
और गुहा ये सब संस्कृत नाम पिठवन के हैं। पिठवन—त्रिदोष को दूर करने वाली, वृष्य, उष्णवीर्य, मधुर रस युक्त तथा
संग्राही होती है। यह दाह, ज्वर, श्वास, रक्तातिसार, तृषा और वमन को दूर करती है। [३४-३५]
११. पृश्निपर्णी (१)
हिं०- पिठवन, डाब्रा। बं०- शंकरजटा। पं०- देतेर्दानी। म०- पृश्निपर्णी, पिठवण। गु०- पीठवण, पीलो
समेरवो। ले०- Uraria picta Desv. (युरेरिआ पिक्टा डेस्व.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)।
यह देहरादून और बाहरी हिमालय में प्रायः ऊसर भूमि एवं खुले हुए जंगलों में पाया जाता है।
इसके क्षुप—२-६ फीट ऊँचे, स्वावलम्बी तथा अल्प शाखाओं वाले होते हैं जिसमें पत्ते एक ही क्षुप में भिन्न तरह
के होते हैं। पत्ते—नीचे के पत्ते छोटे और लगभग वृत्ताकार, इनके ऊपर ३-५ पत्रक सदलपर्ण जिनके पत्रक रेखाकार
और इनके साथ कभी-कभी बड़े-बड़े आयताकार, भालाकार, ६ × १ १/२ इञ्च बड़े अपत्रक पर्ण भी रहते हैं। ऊपर के पत्ते
५-९ पत्रक तथा पत्रक ३ १/२-६ इञ्च बड़े होते हैं। पत्रकों के मध्य में पीलापन लिये भूरे या पीले सफेद रंग के पट्टे होते
हैं। पुष्प—छोटे, लाल और ३-४ इञ्च लम्बी, सघन, अग्र्य और रंभाकार मंजरियों में निकले रहते हैं। फलवती होने
पर ये मंजरियाँ पुच्छाकार मालूम होती हैं। फली—छोटी तथा ३-६ संधियों वाली होती है। अधिकांश लोग इसे पृश्निपर्णी
मानते हैं। इसे शालपर्णी मानना उचित नहीं है। पृश्निपर्णी (२) को शालपर्णी माना जा सकता है क्योंकि उसके पत्र
शालपत्र जैसे होते हैं।
गुण और प्रयोग—पृश्निपर्णी उष्ण, लघु, त्रिदोषघ्न, दीपनीय, वृष्य, वातहर, संग्राही, सन्धानीय, शोथहर, अंगमर्द
प्रशमन तथा जीवाणुनाशक है।
इसका उपयोग ज्वर, कास, रक्तातिसार, रक्तार्श, तृषा एवं दाह में किया जाता है।
(२) अस्थिभग्न में मांसरस के साथ इसके मूल का चूर्ण २१ दिन तक सेवन करना चाहिये।
(३) इसके पंचांग का स्वरस फुरसा (Echis carinata) नामक सर्प के विष में लाभदायक माना जाता है।
मात्रा—१/२-१ तोला।
१२. पृश्निपर्णी (२)
हिं०- पिठवन, पिठोनी, पितवन। बं०- चाकुले, चाकुलिआ। म०- डवला, पिठवण। पं०- पिठोनी, पिठौनी।
मा०- पिठपन। गु०- नहानो समेरवो। क०- नबियल बोने। ते०- कोलकूपौन्ना। ले०- Uraria lagopoides
DC. (युरेरिआ लँगोपॉइडिस् डीसी.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)।
१. अंघ्रिपर्ण्यपि इति पाठा०।
गुडूच्यादिवर्गः ४६५
यह नेपाल, बंगाल, छोटा नागपुर तथा अन्य उष्ण प्रान्तों के जंगली स्थानों में होती है।
इसके क्षुप-बहुवर्षायु काष्ठीय मूल से प्रतिवर्ष निकलते हैं। शाखाएँ-प्रसरी या अत्यन्तप्रसरी और लगभग १२
इञ्च लम्बी होती हैं, जो मूल के समीप निकलती हैं। पत्ते-किंचित् वृत्ताकार या चौड़ाई लिये हुए आयताकार, एकपत्रक
और त्रिपत्रक दोनों प्रकार के पत्ते मिले या कभी-कभी केवल अपत्रक पत्ते होते हैं। पुष्प-पुष्पमंजरी ८-१२ इञ्च तक लम्बी,
गोल तथा पुच्छाकार होती है जो स्थायी बाह्यकोश के पंख सदृश खण्डों के कारण बहुत सघन और शृगालपुच्छ
(क्रोष्टुविन्ना) जैसी दिखाई देती हैं इसी से कहीं-कहीं जंगलों में इसे सियारपुछिया भी कहते हैं। फली-एक इञ्च लम्बी,
टेढ़ी-मेढ़ी तथा चिकनी होती है। इसके मूल का व्यवहार किया जाता है।
इसकी एक अन्य जाति युरेरिआ हँमोसा वाल. (Uraria hamosa Wall.) होती है जिसमें मंजरियाँ लम्बी परन्तु
सघन नहीं होतीं तथा पर्ण अपत्रक या त्रिपत्रक होते हैं। इसे लड़ीसा में सालपानी (शालपर्णी) कहते हैं। वस्तुतः
'सालपानी' नाम कई जाति के पौधों को दिया जाता है।
गुण और प्रयोग-यह रसायन, बल्य, श्लेष्मघ्न एवं त्रिदोषघ्न है। इसके मूल का व्यवहार १/२-१ तोला की
मात्रा में किया जाता है।
अथ वार्त्ताकी (बड़ी कटेरी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह
वार्त्ताकी क्षुद्रभण्टाकी महती बृहती कुली। हिङ्गुली राष्ट्रिका सिंही महोष्ट्री दुष्प्रधर्षिणी ।।३६।।
कटुतिक्ताऽऽस्यवैरस्यमलारोचकनाशिनी । उष्णा कुष्ठज्वरश्वासशूलकासाग्निमान्द्यजित् ।।३७।।
बड़ी कटेरी के नाम तथा गुण-वार्त्ताकी, क्षुद्रमण्टाकी, महती, बृहती, कुली, हिङ्गुली, राष्ट्रिका, सिंही, महोष्ट्री
और दुष्प्रधर्षिणी ये सब संस्कृत नाम बड़ी कटेरी के हैं। बड़ी कटेरी-संग्राही (मलरोधक), हृदय को हितकर, पाचक,
कफवात-नाशक, कटु तथा तिक्तरस-युक्त होती है। यह मुख की विरसता तथा मल और अरुचि का नाश करने वाली,
उष्णवीर्य तथा कुष्ठ, ज्वर, श्वास, शूल, कास और अग्नि की मन्दता इन सबों को दूर करने वाली होती है।। [३६-३७]
१३ बृहती (बड़ी कटेरी)
हिं०-वनभंटा, वनभांटा, बड़ी कटाई, बड़ी कटेरी, बरहंटा, अंजड। बं०-व्याकुड, व्याकुर। म०-डोरले,
चिंचुरटी वांगी। गु०-उभी रिंगणी। ते०-तेल्ल मुलक। ता०-पप्पर मुल्ली। क०-किरिगुलि। मा०-उभीकटाली।
मला०-चेरुचुण्ड। पं०-कंडयारी। फा०-टाई कलाँ। ले०-Solanum indicum Linn. (सोलेनॅम् इण्डिकम्
लिन.)। Fam. Solanaceae (सोलेनेॅसी)।
यह भारत के प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाई जाती है, विशेषकर ऊसर भूमि में अधिक मिलती है।
इसका क्षुप-३-६ फीट ऊँचा ठीक मण्टे के क्षुप के समान होता है। शाखाएँ-श्वेत रोमश और किंचित् टेढ़े
तथा मृदु कांटो से भरी रहती हैं। पत्ते-३ से ६ इञ्च तक लम्बे तथा १ से ४ इञ्च तक चौड़े, कटे किनारे वाले या लहरदार,
ठीक भण्टे के पत्तों के आकार के लट्वाकार या आयताकार होते हैं। अधरतल पर रोमश होने के कारण ये मैले सफेद
रंग के और ऊपरी तल पर तारकाकार रोमों के कारण कुछ-कुछ खुरखुरे होते हैं। नीचे के तल पर मध्यपर्णक पर अथवा
नसों पर मृदु कंटकों से युक्त रहते हैं। फूल-भंटा के फूल के समान बैंगनी रंग के या कभी-कभी श्वेताभ, .७५ इञ्च
व्यास के और पाँच दल वाले होते हैं। फल-गोल, कच्ची अवस्था में हरे, पकने पर पीले, तिहाई इञ्च व्यास के एवं
प्रायः चिकने होते हैं। इनका स्थायी बाह्यकोश पहले जैसा छोटा ही रहता है। फल तथा फूल सालभर लगते रहते हैं।
ताजे फल कड़वे तथा कटु रहते हैं लेकिन सूखने पर इनका कड़वापन चला जाता है।
३३ भाव.I
४६६ भावप्रकाशनिघण्टुः
इसका एक भेद ठंडे तथा आर्द्र स्थानों में पाया जाता है जिसे ले०-Solanum torvum Swartz (सोलॅनम्
टॉर्व्हम् स्वाज्र्ट्) तथा सं०-श्वेतबृहती कहते हैं।
इसके क्षुप-६-१० फीट ऊँचे तथा उपर्युक्त बृहती के समान होते हैं। ये अधिक ऊँचे, सीधे तथा शाखाएँ अल्प,
सीधी, प्रायः मुलायम और उन पर काँटे बहुत कम होते हैं। पत्ते-३-७ इञ्च लम्बे, २-४ इञ्च चौड़े, ऊपर कम और
नीचे अधिक रोमश (रोम तारकाकार) होते हैं। काँटे भी प्रायः मध्यशिरा पर नीचे की ओर केवल एक या दो होते हैं।
फूल-श्वेत तथा बाह्यकोश में काँटे नहीं होते। फल-पहले से बड़े, .५ इञ्च व्यास के तथा पीले होते हैं।
इसका एक अन्य भेद शुष्क भागों में पाया जाता है जिसे ले०-Solanum melongena Linn. (सोलॅनम्
मेलोंगेना लिन.) एवं हिं०-वनभण्टा, जंगली बैंगन, रोको, ठोको, गठेगनी कहते हैं।
यह बैंगन की ही जंगली जाती होती है जिसमें काँटे होते हैं। पत्ते-अंडाकार, ४-७ इञ्च बड़े, न्यूनाधिक अखंड,
लहरदार या किंचित् खंडित (खंडगोल) होते हैं। फूल-नीले और प्रायः व्यास में १ इञ्च होते हैं। बाह्यकोश फल में
बढ़ा हुआ रहता है। फल-चिकने, श्वेताभ-पीत, गोल और व्यास में करीब १ इञ्च होते हैं। इसके कृषिजन्य भेद में
फल के रंग तथा आकारादि में बहुत भिन्नता आ जाती है।
नोट-प्राचीनों ने बृहतीद्वय का उल्लेख किया है जिससे कुछ लोग बृहती (बड़ी कटेरी) तथा कंटकारी (भटकटैया)
ये दो द्रव्य लेते हैं। कुछ लोगों का मत है कि बृहतीद्वय अलग है तथा कंटकारी अलग है। बृहती के कई भेद प्राप्त
भी होते हैं।
रासायनिक संगठन-इसमें सोलेनीन एवं सोलेनिडीन नामक दो क्षाराभ पाये जाते हैं।
गुण और प्रयोग-यह उष्ण, दीपन, पाचन, ग्राही, वातघ्न, कफघ्न, हृद्य, कण्ठ्य, हिक्कानिग्रहण, शोथहर तथा
अंगमर्द प्रशमन है।
इसका मूल कफ रोगों में दिया जाता है। इससे ज्वर कम होता है एवं श्वासावरोध कम होता है। इसके प्रयोग
से उदरगत वात कम होने से शूल एवं मरोड़ दूर होती है। मूत्रकृच्छ्र में इसका उपयोग करते हैं। त्वग्रोगों में इसके पत्तों
का लेप किया जाता है। वमन रोकने के लिये इसके पत्तों का स्वरस आर्द्रक के साथ पिलाते हैं। इसके फल अग्निदीपक
माने जाते हैं तथा शिरःशूल में इसका लेप लाभदायक होता है।
मात्रा-चूर्ण १-२ माशा।
अथ कण्टकारी (भटकटैया, कटेरी) । तस्या नामान्याह
कण्टकारी तु दुःस्पर्शा क्षुद्राव्याघ्री निदिग्धिका । कण्टालिका कण्टकिनी धावनी बृहती तथा ।।३८।।
भटकटैया के नाम-कण्टकारी, दुःस्पर्शा, क्षुद्रा, व्याघ्री, निदिग्धिका, कण्टालिका, कण्टकिनी, धावनी और
बृहती ये सब संस्कृत नाम भटकटैया के हैं। [३८]
❖ उभे च बृहत्यौ । यत आह सुश्रुत
क्षुद्रा या क्षुद्रभण्टाकी बृहतीति निगद्यते ।।३८।।
दोनों ही अर्थात् बड़ी कटेरी तथा भटकटैया (छोटी कटेरी) 'बृहती' कहलाती हैं क्योंकि 'सुश्रुत' महर्षि ने भी कहा
है कि-क्षुद्रा (भटकटैया) और क्षुद्रभण्टाकी (बड़ी कटेरी) जो यह दो प्रकार की कटेरी होती है वे दोनों ही 'बृहती' नाम
से कहलाती हैं। [३८]
अथ श्वेतपुष्पायाः कण्टकार्या नामान्याह
श्वेता क्षुद्रा चन्द्रहासा लक्ष्मणा क्षेत्रदूतिका । गर्भदा चन्द्रमा चन्द्री चन्द्रपुष्प्या प्रियङ्करी ।।३९।।
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गुडूच्यादिवर्गः ४६७
सफेद फूल वाली भटकटैया के नाम—श्वेता, क्षुद्रा, चन्द्रहासा, लक्ष्मणा, क्षेत्रदूतिका, गर्भदा, चन्द्रमा, चन्द्री,
चन्द्रपुष्पा और प्रियङ्करी ये सब संस्कृत नाम सफेद फूल वाली भटकटैया के हैं। [३९]
अथ कण्टकारीगुणानाह
कण्टकारी सरा तिक्ता कटुका दीपनी लघुः ।।४०।।
रूक्षोष्णा पाचनी कासश्वासज्वरकफानिलान् । निहन्ति पीनसं पार्श्वपीडाकृमिहृदामयान् ।।४१।।
भटकटैया के गुण—भटकटैया—दस्तावर, तिक्त तथा कटुरसयुक्त, अग्निदीपक, लघु, रूक्ष, उष्णवीर्य और
पाचक होती है। यह खाँसी, श्वास, ज्वर, कफ, वात, पीनस, पार्श्वपीडा (पसुली का दर्द), कृमि तथा हृद्रोग इन सबों
को दूर करती है। [४०-४१]
अथ कण्टकारीद्वयफलगुणानाह
तयोः फलं कटु रसे पाके च कटुकं भवेत् । शुक्रस्य रेचनं भेदि तिक्तं पित्ताग्निकृल्लघु ।।
हन्यात्कफमरुत्कण्डूकासमेदःकृमिज्वरान् ।।४२।।
दोनों कटेरियों के फल के गुण—छोटी तथा बड़ी कटेरी के फल—पाक में कटुरसयुक्त, शुक्र का रेचन करने
वाले, मल को भेदन करने वाले, कटु तथा तिक्तरसयुक्त, पित्त तथा अग्निवर्धक और लघु होते हैं और कफ, वात,
खुजली, खाँसी, मेदरोग, कृमि तथा ज्वर को दूर करने वाले होते हैं। [४२]
अथ श्वेतपुष्पकण्टकार्या गुणानाह
तद्वत्प्रोक्ता सिता क्षुद्रा विशेषाद् गर्भकारिणी ।।४३।।
श्वेत फूल वाली भटकटैया के गुण—सफेद फूल वाली भटकटैया भी पूर्वोक्त इन सभी गुणों से युक्त होती
है तथापि विशेष करके यह गर्भ धारण कराने वाली होती है। [४३]
१४. कंटकारी
हिं०—कटेरी, लघुकटाई, कंटकारी, छोटी कटाई, भटकटैया, रेंगनी, रिगणी, कटाली, कटयाली। बं०—
कंटकारी। म०—रिङ्गणी, भुईरिङ्गणी। गु०—बेठी भोरिंगणी, भोयरिंगणी। क०—नेल्ल गुल्लु। ते०—चल्लन मुलग।
मा०—पसरकटाई। पं०—कंडियारी, बरुम्ब। ता०—कंडनकत्तरि। अ०—हदक, इसिम, शौकतुलअकरब। फा०—
बादंगानवरीं, कटाई खुर्द। ले०—Solanum xanthocarpum Schrad & Wendl. (सोलैनम् झैन्थोकार्पम् श्रैंड,
वेण्ड.)। Fam. Solanaceae (सोलेनेसी)।
यह प्रायः सब प्रान्तों में और सब प्रकार की मिट्टी में पाई जाती है परन्तु रेतीली भूमि में यह अधिक उत्पन्न होती
है। दक्षिण-पूर्व एशिया, मलाया एवं आस्ट्रेलिया के उष्ण प्रदेशों में भी यह पाई जाती है।
इसका परिप्रसरी क्षुप—बहुवर्षायु तथा अत्यन्त काँटेदार होता है। काण्ड—टेढ़े-मेढ़े एवं अनेक शाखाओं से युक्त
रहते हैं। काँटे—सीधे, पीले, चिकने, चमकीले एवं .५-.७ इञ्च तक लम्बे होते हैं। इनमें साथ में छोटे काँटे भी होते
हैं। पत्ते—२-४ इञ्च लम्बे, १-३ इञ्च चौड़े, लट्वाकार, आयताकार या अंडाकार, गहरे कटे हुए या पक्षवत् खण्डित
होते हैं। पत्रखण्ड पुनः खण्डित या दन्तुर होते हैं। ये तारकाकार रोमों के कारण खुरदुरे होते हैं। फूल—गहरे नीले रंग
के आते हैं। फल—गोल, .५-१ इञ्च व्यास के, चिकने और पीले या कभी-कभी सफेद होते हैं तथा हरी धारियों से
युक्त होते हैं। बीज—चिकने एवं छोटे होते हैं। इसके मूल का उपयोग किया जाता है। यह हमेशा ताजा उपयोग में
लाना चाहिये।
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४६८ भावप्रकाशनिघण्टुः
श्वेतकंटकारी का पौधा वर्षायु, कुछ छोटा एवं हलके रंग का होता है। पुष्प श्वेत रंग के आते हैं। मूल छोटा
एवं पतला तथा शाखायुक्त होता है। यह शीतऋतु में होता है तथा वर्षा में गल जाता है। श्वेतकंटकारी का एक पर्याय
लक्ष्मणा होने के कारण तथा यह भी 'गर्भकारिणी' होने के कारण 'लक्ष्मणा' के स्थान पर इसका उपयोग किया जाता
है। लक्ष्मणा का आगे स्वतंत्र वर्णन आया है। यह पौधा उपर्युक्त कंटकारी का केवल स्थानभेद से उत्पन्न प्रकार
(Variety) है या स्वतंत्र जाति (Species) है इस संबंध में अभी शोध चालू है। इसके स्वतंत्र स्पीसीज सिद्ध होने
की अधिक संभावना है।
रासायनिक संगठन— इसमें सोलेनीन सदृश सोलेकार्पिडिन (Solacarpidin, C₂₆ H₄₄ O₃ N) नामक एक
क्षाराभ बहुत अल्पमात्रा में होता है जो फल में अधिक होता है। पत्तों की अपेक्षा मूल में यह अधिक होता है। इसके
पंचांग में पोटैशियम् क्लोराइड् एवं पोटे-शियम नाइट्रेट् (Potassium chloride and Potassium nitrate) पाये
जाते हैं।
गुण और प्रयोग— यह उत्तम मूत्रल, कफनिःसारक एवं ज्वरहर है। इसके बीज वेदनास्थापक हैं।
इसका उपयोग कास, श्वास, प्रतिश्याय, ज्वर, अंगमर्द, पार्श्वपीड़ा, हृद्रोग, आध्मान, विबंध, अश्मरी तथा वमन
में किया जाता है।
(१) गुडुचं एवं इसकी जड़ का क्वाथ ज्वर एवं कास में बल्य रूप में दिया जाता है। इससे शरीर की पीड़ा कम
होती है, कुछ पसीना होता है एवं मूत्र की मात्रा भी कुछ बढ़ती है।
(२) इससे गला एवं श्वासनलिका की शुष्कता कम होकर कफ ढीला होने लगता है इसलिये गले का शोथ,
स्वरयन्त्रशोथ एवं श्वासनलिकाशोथ इनकी प्रथमावस्था में इससे अच्छा लाभ होता है। कफ की प्रथमावस्था में मूल के
क्वाथ के साथ मधु एवं सैंधव दिया जाता है। द्वितीयावस्था में पत्रस्वरस या मूलक्वाथ में छोटीपीपल एवं मधु मिलाकर
देते हैं जिससे खाँसी की तकलीफ कम होती है। तमक श्वास एवं उद्वेष्टन युक्त कास में इसके मूल के क्वाथ में सैंधव
एवं हींग मिलाकर देते हैं। सुश्रुत ने तमक श्वास के लिये इसका मूलचूर्ण १ तोला तथा हींग १/२ तोला, मधु के साथ
३ दिन सेवन करने को लिखा है। कास, श्वास तथा स्वरभेद में इससे सिद्ध घृत का उपयोग लिखा है। कास में इसके
स्वरस से सिद्ध मुद्गयूष आँवले की खटाई डालकर उपयोग करने को लिखा है।
(३) इसके मूल का स्वरस मद्य मिलाकर पिलाने से वमन बन्द होता है।
(४) इसके मूल के क्वाथ को मूत्रकृच्छ्र, बस्तिगत अश्मरी एवं जलोदर में देते हैं। मूत्रदोष में इसके स्वरस में
मधु मिलाकर पिलाते हैं। अश्मरी में बृहती तथा कंटकारी के मूल का चूर्ण मीठे दही के साथ ७ दिन पीने का विधान
है।
(५) इसके बीज के धूम्रपान से कृमिदन्तजन्य शूल कम होता है तथा कभी-कभी तत्काल लाभ होता है। मुखपाक
में पंचांग क्वाथ से गण्डूष कराते हैं। पीड़ायुक्त अर्श में इसके बीज की धूनी दी जाती है। वेदनायुक्त अंगों पर इसके
पत्तों का लेप किया जाता है।
(६) आमवात में इसके पत्रस्वरस में काली मिर्च मिलाकर पिलाते हैं तथा पत्तों का लेप करते हैं।
(७) गले की सूजन में फलों का स्वरस उपयोगी है।
(८) सोजाक में पंचांग का क्वाथ पिलाते हैं।
मात्रा— पत्रस्वरस १/४-१/२ तोला; मूलक्वाथ (अष्टमांश) २-४ तोला; मूलचूर्ण १-२ माशा।
श्वेतकंटकारी— इसकी ताजी जड़ दूध में पीसकर मासिक के चौथे दिन पिलाने से गर्भधारण होता है।
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गुडूच्यादिवर्गः ४६९
अथ गोक्षुरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
गोक्षुरः क्षुरकोऽपि स्यात्त्रिकण्टः स्वादुकण्टकः । गोकण्टको गोक्षुरको वनशृङ्गाट इत्यपि ।।४४।।
पलङ्कषा श्वदंष्ट्रा च तथा स्यादिक्षुगन्धिका । गोक्षुरः शीतलः स्वादुर्बलकृद्बस्तिशोधनः ।।४५।।
मधुरो दीपनो वृष्यः पुष्टिदश्चाश्मरीहरः । प्रमेहश्वासकासार्शः कृच्छ्रहृद्रोगवातनुत् ।।४६।।
गोखरू के नाम तथा गुण-गोक्षुर, क्षुरक, त्रिकण्ट, स्वादुकण्टक, गोकण्टक, गोक्षुरक, वनशृङ्गाट, पलङ्कषा,
श्वदंष्ट्रा तथा इक्षुगन्धिका ये सब संस्कृत नाम गोखरू के हैं। गोखरू-शीतवीर्य, स्वादु, बलकारक, बस्तिशोधक,
मधुररसयुक्त, अग्निदीपक, वृष्य तथा पुष्टिकारक होता है। यह पयरी, प्रमेह, श्वास, खाँसी, बवासीर, मूत्रकृच्छ्र, हृद्रोग
तथा वात को दूर करने वाला होता है। [४४-४६]
१५. गोखरू (छोटा)
हिं०-गोखरू छोटा गोखरू, हाथीचिकार। बं०-गोक्षुर, गोखुरी। म०-सराटे, काटे गोखरू। क०-
नेग्गिलुमुल्लु, नेगलु। गु०-न्हाना गोखरू, बेठा गोखरू। ते०-पल्लेरु मुल्लु। ता०-नेरिंजिल, नेरुंजी। पं०-
मखड़ा, मखर। फा०-खारे खसक, खारे मेहगोशा। अ०-इसक, बजरुल खस्क। अं०-Small Caltrops
(स्मॉल कॅल्ट्रोप्स)। ले०-Tribulus terrestris Linn. (ट्रिब्युलस् टेरेस्ट्रिस् लिन.)। Fam. Zygo-phyllaceae
(झाइगोफाइलॅइसी)।
छोटा गोखरू-प्रसर जाति की वनौषधि है। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है विशेषकर बंगाल, बिहार, उत्तर
प्रदेश, पश्चिमोत्तर प्रदेश, राजपूताना और मद्रास में अधिक उत्पन्न होता है। यह अन्य उष्ण प्रदेशों में भी पाया जाता है।
इसका प्रसर-१ १/२ फीट से ४ फीट के घेरे में भूमि पर फैला हुआ रहता है। मूल-पतला, चीमड़, करीब ५
इञ्च लम्बा, गोल एवं हलके भूरे रंग का रहता है। इसमें थोड़ी सी सुगन्ध रहती है एवं इसका स्वाद कुछ मिठास लिये
हुए कसैला होता है। शाखाएँ-१-२ फीट लम्बी, रोमश तथा जमीन पर फैली हुई रहती हैं। पत्ते-विपरीत, २-३
इञ्च लम्बे, प्रायः असम तथा जोड़ी में आते हैं। पत्रक-आयताकार, ४-७ जोड़े, छोटे, ०.८-१.२ से० मि० लम्बे,
आधार की तरफ कुछ तिरछे एवं इनका अग्र रोमश रहता है। फूल-छोटे-छोटे, पाँच पंखड़ी वाले, पीले रंग के तथा
पत्रकोणों में आते हैं। फल-छोटे-छोटे गोल किञ्चित् चिपटे होते हैं और उन पर पाँच जोड़े बड़े काँटे लगे रहते हैं।
ये पाँच दलवाले होते हैं और सूखने पर प्रायः पाँचों दल त्रिकोणाकार पृथक्-पृथक् हो जाते हैं तथा उनके दोनों छोर पर
एक-एक बड़े काँटे, आधार पर दो छोटे काँटे एवं अन्य सतह पर सूक्ष्म काँटे रहते हैं। प्रत्येक दल में अनेक बीज पाये
जाते हैं जिनके बीच में आड़े परत होते हैं।
इसके मूल एवं फल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। प्रायः चूर्ण के लिये फल एवं क्वाथ के लिये मूल
काम में लेते हैं।
इसी का एक जातिभेद सिंध, पंजाब तथा बलूचिस्तान में होता है। इसे ले०-Tribulus alatus Del.
(ट्रिब्युलस् एलॅटस् डेल); अं०-Winged caltrops (विंग्ड् कॅल्ट्रोप्स); सिंध-लतक; हिं०-गोखुरेकलान; पं०-
हसक कहते हैं। इसके फल एक तरफ मोटे तथा दूसरी तरफ संकुचित होते हैं एवं इसे पंख रहते हैं। इनमें दो बीज
होते हैं। इसके गुण गोखरू के समान ही होते हैं। इससे पाखाना साफ होता है एवं प्रसूता को इसके फल की पेया
पिलाते हैं।
रासायनिक संगठन-इसके फलों में अत्यल्प मात्रा में एक क्षाराभ, ३.५% स्थिर तैल, कुछ उड़नशील तैल,
राल एवं अधिक मात्रा में नाइट्रेट (Nitrates) ये पदार्थ पाये जाते हैं।
४७० भावप्रकाशनिघण्टुः
**गुण और प्रयोग—**गोखरू शीतल, स्नेहन, मूत्रविरेचनीय, शोथहर, वातहर, बल्य, वृष्य एवं वेदनास्थापन है ।
मूत्र-संस्थान की श्लेष्मकला पर इसका प्रभाव बकु (Buchu) के पत्र एवं उह्याअर्सी (Uva-ursi) के पुष्प सदृश होता
है । इसका मूत्रल प्रभाव इसमें के नाइट्रेट् एवं उड़नशील तैल के कारण होता है । यह शीतवीर्य होते हुये वृक्कोत्तेजक
है । अधिक मात्रा से इससे शौच साफ होता है ।
इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, सोजाक, अश्मरी, बस्तिरोग, वृक्कविकार, प्रमेह, स्वप्नदोष, नपुंसकता एवं वीर्यक्षीणता
में किया जाता है ।
इसके फलों का फांट वृक्कविकार, अश्मरी तथा वातरक्त में मूत्रल औषधि के रूप में बहुत उपयोगी है । इसका
उपयोग मूत्राघात, कास तथा हृदय विकार में भी किया जाता है । सोजाक तथा बस्तिशोथ में इसका क्वाथ देते हैं । इसका
वेदना स्थापन गुण अल्प होने के कारण इसके साथ खोरासानी अजवाइन या अफीम मिलाई जाती है ।
मूत्रकृच्छ्र में इससे सिद्ध दुग्ध का प्रयोग किया जाता है । मूत्र में बहुत अम्ल होने पर तथा मूत्रकृच्छ्र में इसके क्वाथ
में यवक्षार मिलाकर देते हैं । बस्तिशोथ या वृक्कशोथ में जब मूत्र क्षारीय, दुर्गन्ध युक्त एवं गंदला रहता है तब इसके
क्वाथ में शिलाजीत देते हैं ।
इसके चूर्ण को मधु के साथ खाकर ऊपर से बकरी का दूध सात दिन पीने से अश्मरी में लाभ होता है ।
गोखरू तथा तिल इनका समभाग चूर्ण मधु एवं बकरी के दूध के साथ सेवन करने से हस्तमैथुनजन्य षांढ्य में
लाभ होता है । गर्भाशय शुद्ध होकर वन्ध्यत्व नष्ट होने के लिये गोखरू देते हैं ।
**मात्रा—**३-६ माशा ।
१६. गोखरू (बड़ा)
**हिं०—**बड़ा गोखरू, फरीदबूटी, दक्षिणी गोखरू । **बं०—**बड गोखरू । **म०—**मोठें गोखरू । **गु०—**ऊभा गोखरू,
म्होटा गोखरू, कडवा गोखरू । **पं०—**गोखरू कलां, बड़ा भखडा (रा) । **उडि०—**गोक्षुरा । **क०—**आनेनेग्गिलु । ते०—
पेड्डा पल्लेरू । **ता०—**पेरूनैरूंजि । **मल०—**कट्टुनेरिंजल । **सिंह०—**अतिनेरंचि । **अ०—**हसके कबीर । **फा०—**खारेखसह-
के कलां, खसके कलाँ । ले०—Pedalium murex Linn. (पेडॅलिअम् म्यूरेक्स लिन.) । Fam. Pedaliaceae
(पेडॅलिएसी) ।
यह दक्षिण में समुद्र के किनारे, गुजरात तथा सिलोन में बहुत उत्पन्न होता है ।
इसका **क्षुप—**वर्षायु, नरम, मांसल तथा चिकना होता है । **शाखाएँ—**६-१८ इञ्च लम्बी तथा उत्थित प्रसरी होती
हैं । **पत्ते—**न्यूनाधिक विपरीत, १-२ इञ्च लम्बे, अंडाकार तथा लहरदार दन्तुर किनारे वाले होते हैं । **पुष्प—**पीले रंग के,
१ इञ्च लम्बे तथा पत्रकोणों में निकले हुए होते हैं । इनको मसलने से कस्तूरी जैसी सुगन्ध आती है । **फल—**चौकोनी,
करीब १/२ इञ्च लम्बा, १/४ इञ्च चौड़ा तथा आधार की ओर प्रत्येक कोन पर एक-एक सीधा काँटा होता है । इसके ऊपर
का भाग शंक्वाकार और भीतर से दो कोशवाला होता है । **बीज—**प्रत्येक कोश में दो-दो बीज होते हैं । इसके पत्तों को
जल में डालने पर जल एकदम लुआबदार हो जाता है । इसमें न स्वाद होता है न गन्ध होती है तथा कुछ समय बाद
इसका लुआब भी निकल जाता है । इसके पत्ते तथा फलों का चिकित्सा में व्यवहार होता है ।
**रासायनिक संगठन—**इसके फलों में एक क्षाराभ, वसा, तथा राख ५% होती है ।
**गुण और प्रयोग—**बड़ा गोखरू स्नेहन, मूत्रजनन, बल्य तथा बाजीकर है । इसका मूत्रजनन धर्म बहुत उत्तम है
तथा त्वरित मालूम पड़ता है ।
गुडूच्यादिवर्गः ४७१
(१) नये सोजाक में ताजे पंचांग का हिम करीब एक पाव की मात्रा में प्रत्ये समय ताजा बनाकर देना चाहिए।
फल का काढ़ा देना हो तो उसके साथ मुलेठी एवं नागरमोथा मिलाना चाहिये। इससे मूत्रत्याग के समय जलन नहीं होती।
इसके पत्तों का चूर्ण एक तोला दुग्ध एवं शर्करा के साथ सोजाक में तथा तज्जन्य संधिवात में देते हैं।
(२) स्वप्नदोष, कामशक्ति का ह्रास तथा अपने आप पेशाब हो जाना इन अवस्थाओं में इसके फल का फांट देते
हैं। २ १/२ तोला फल चूर्ण को २५ तोला उबलते जल में डालकर १ घंटे पश्चात् छान लें तथा बार-बार थोड़ा-थोड़ा
पिलावें। फलचूर्ण को २ माशे की मात्रा में शर्करा, घृत एवं दुग्ध के साथ भी दे सकते हैं। इसका पौष्टिक तथा वाजीकर
गुण कभी-कभी स्पष्ट प्रतीत होता है।
(३) प्रसूति रोग में फलों का क्वाथ या पत्रस्वरस पिलाते हैं।
(४) यकृत तथा प्लीहा वृद्धि में पंचांग का रस या क्वाथ पिलाते हैं।
मात्रा-पत्रचूर्ण १ तोला; फल २-३ तोला फांट बनाकर; फल
४७२ भावप्रकाशनिघण्टुः
इन्हीं दो का यहाँ वर्णन किया गया है। कुछ लोगों ने ड्रेगिआ होल्यूविलिस् (Dregia volubilis) को जीवन्ती लिखा
है जिसे कहीं-कहीं 'लाखन' कहा जाता है तथा उसका मूर्वा के स्थान पर कहीं-कहीं प्रयोग किया जाता है। पंजाबी में
जिउन्ती नाम सिमिसिफ्यूजा फिटिडा (Cimicifuga toetida) को दिया हुआ है जो जीवन्ती शाक से बिलकुल भिन्न
मालूम होती है।
श्रीयुत् यादवजी ने इसके दो लेटिन नाम लेप्टाडेनिआ रेटिक्युलेटा एवं होलोस्टेमा एन्युलेर लिखे हैं तथा इसके
नव्यमत में श्री डॉ० देसाई के होलोस्टेमा हिडिआनम् का वर्णन किया है। होलोस्टेमा हिडिआनम् (हो० एन्युलेर) को
कुछ विद्वानों ने अर्कपुष्पी माना है तथा उसे जीवन्ती का भेद लिखा है। अर्कपुष्पी का आगे स्वतंत्र वर्णन आया हुआ है।
१७ जीवन्ती (१)
हिं०-जीवन्ती, डोडो। गु०-दोडी, डोडी, खरखोडी, राडारुडी। म०-डोडी, राईडोडी, खीरखोडी। ले०-
Leptadenia reticulata W. & A. (लेप्टाडेनिआ रेटिक्युलॅटा)। Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडॅसी)।
यह लता सहारनपुर, शिवालिक के नीचे तथा बरकाला, रानीपूर एवं दक्षिण में भी मिलती है। देहरादून में
मोध्रानवाला के समीप घास के मैदानों में भी होती है। इसकी मधुर कलियों का रुचिकर शाक बनता है अतः शाकश्रेष्ठ
जीवन्ती इसे मानना चाहिये।
इसकी लता-क्षुपजातीय तथा चक्रारोही होती है। इसके पुराने काण्ड कार्क युक्त होते हैं और नवीन भाग श्वेताभ
मृदु रोमश होते हैं। पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे, १-१॥ इञ्च चौड़े, लट्वाकार-आयताकार या अंडाकार, नोकीले, सरल धार,
चर्म सदृश और अधःपृष्ठ पर नीलाभ श्वेत रज से ढके होते हैं। इनका आधार प्रायः गोल या नोकीला होता है। पुष्प-
कुछ मटमैले हरिताभ पीत रंग के होते हैं। फलियाँ-एकाकी, २-३ इञ्च लम्बी, ।।-।।। इञ्च मोटी, सीधी, सरस परन्तु
कठोर, चिकनी और उनका अग्रभाग मोटा परन्तु चोंचदार (टेढ़ा) होता है।
गुण और प्रयोग-जीवन्ती जीवनीय, शीतल, मधुर, लघु, त्रिदोषनाशक, चक्षुष्य, स्वर्य, ग्राही, बल्य एवं वृष्य है।
इसका उपयोग रक्तपित्त, क्षय, दाह, ज्वर, अतिसार, विषदोष, नक्तान्ध्य एवं व्रण में किया जाता है।
(१) ज्वरजन्य दाह में इसके मूल के क्वाथ में घृत मिलाकर पीने से लाभ होता है।
(२) इसका साग घृत के साथ पकाकर खाने से रतौंधी में लाभ होता है।
(३) अतिसार में इसका साग दही, अनार तथा स्नेह के साथ उपयोगी होता है।
मात्रा-३-६ माशा।
१८ जीवन्ती (२)
सं०-स्वर्ण जीवन्ती (?)। हिं०-जिवसाग्। बं०-जिबै, जीवन्ती। गु०-जिवन्ती। ले०-Dendrobium
macraei Lindl. (डेण्ड्रोबिअम् मेक्रीइ लिंड)। Fam. Orchi-daceae (ऑर्किडॅसी)।
यह हिमालय पहाड़ सिक्किम, नीलगिरि के पहाड़ एवं दक्षिण, सीलोन, वर्मा तथा मलाया आदि में होती है।
इसके बांदे जामुन के वृक्षों पर पाये जाते हैं। जड़े-(भौमिक काण्ड) प्रसरणशील तथा वलय युक्त होती हैं जिससे
अनेक लटकते हुए, चमकीले तथा २-३ फीट लम्बे काण्ड निकले रहते हैं। काण्ड पर विभिन्न दूरी पर मूलकाकार,
कुछ दबे हुवे चमकीले तथा २-२।। इञ्च लम्बे कूटकंद (Pseudobulbs) रहते हैं। पत्र-कूटकंद के अग्रभाग से,
एकाकी, ४-८ इञ्च लम्बा, करीब १ इञ्च चौड़ा, रेखाकार-आयताकार, कुण्ठिताग्र एवं अनेक समानान्तर पतली शिराओं
से युक्त होता है। पुष्प-पत्र के आधार से निकले हुए, १-३, करीब १ इञ्च बड़े तथा श्वेत वर्ण के रहते हैं। इनके
ओष्ठ एवं चंचु (Spur) पीतवर्ण के रहते हैं। पुष्प कुछ ही घंटे विकसित रहते हैं।
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