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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 521

४७० भावप्रकाशनिघण्टुः
**गुण और प्रयोग—**गोखरू शीतल, स्नेहन, मूत्रविरेचनीय, शोथहर, वातहर, बल्य, वृष्य एवं वेदनास्थापन है ।
मूत्र-संस्थान की श्लेष्मकला पर इसका प्रभाव बकु (Buchu) के पत्र एवं उह्याअर्सी (Uva-ursi) के पुष्प सदृश होता
है । इसका मूत्रल प्रभाव इसमें के नाइट्रेट् एवं उड़नशील तैल के कारण होता है । यह शीतवीर्य होते हुये वृक्कोत्तेजक
है । अधिक मात्रा से इससे शौच साफ होता है ।
इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, सोजाक, अश्मरी, बस्तिरोग, वृक्कविकार, प्रमेह, स्वप्नदोष, नपुंसकता एवं वीर्यक्षीणता
में किया जाता है ।
इसके फलों का फांट वृक्कविकार, अश्मरी तथा वातरक्त में मूत्रल औषधि के रूप में बहुत उपयोगी है । इसका
उपयोग मूत्राघात, कास तथा हृदय विकार में भी किया जाता है । सोजाक तथा बस्तिशोथ में इसका क्वाथ देते हैं । इसका
वेदना स्थापन गुण अल्प होने के कारण इसके साथ खोरासानी अजवाइन या अफीम मिलाई जाती है ।
मूत्रकृच्छ्र में इससे सिद्ध दुग्ध का प्रयोग किया जाता है । मूत्र में बहुत अम्ल होने पर तथा मूत्रकृच्छ्र में इसके क्वाथ
में यवक्षार मिलाकर देते हैं । बस्तिशोथ या वृक्कशोथ में जब मूत्र क्षारीय, दुर्गन्ध युक्त एवं गंदला रहता है तब इसके
क्वाथ में शिलाजीत देते हैं ।
इसके चूर्ण को मधु के साथ खाकर ऊपर से बकरी का दूध सात दिन पीने से अश्मरी में लाभ होता है ।
गोखरू तथा तिल इनका समभाग चूर्ण मधु एवं बकरी के दूध के साथ सेवन करने से हस्तमैथुनजन्य षांढ्य में
लाभ होता है । गर्भाशय शुद्ध होकर वन्ध्यत्व नष्ट होने के लिये गोखरू देते हैं ।
**मात्रा—**३-६ माशा ।
१६. गोखरू (बड़ा)
**हिं०—**बड़ा गोखरू, फरीदबूटी, दक्षिणी गोखरू । **बं०—**बड गोखरू । **म०—**मोठें गोखरू । **गु०—**ऊभा गोखरू,
म्होटा गोखरू, कडवा गोखरू । **पं०—**गोखरू कलां, बड़ा भखडा (रा) । **उडि०—**गोक्षुरा । **क०—**आनेनेग्गिलु । ते०—
पेड्डा पल्लेरू । **ता०—**पेरूनैरूंजि । **मल०—**कट्टुनेरिंजल । **सिंह०—**अतिनेरंचि । **अ०—**हसके कबीर । **फा०—**खारेखसह-
के कलां, खसके कलाँ । ले०—Pedalium murex Linn. (पेडॅलिअम् म्यूरेक्स लिन.) । Fam. Pedaliaceae
(पेडॅलिएसी) ।
यह दक्षिण में समुद्र के किनारे, गुजरात तथा सिलोन में बहुत उत्पन्न होता है ।
इसका **क्षुप—**वर्षायु, नरम, मांसल तथा चिकना होता है । **शाखाएँ—**६-१८ इञ्च लम्बी तथा उत्थित प्रसरी होती
हैं । **पत्ते—**न्यूनाधिक विपरीत, १-२ इञ्च लम्बे, अंडाकार तथा लहरदार दन्तुर किनारे वाले होते हैं । **पुष्प—**पीले रंग के,
१ इञ्च लम्बे तथा पत्रकोणों में निकले हुए होते हैं । इनको मसलने से कस्तूरी जैसी सुगन्ध आती है । **फल—**चौकोनी,
करीब १/२ इञ्च लम्बा, १/४ इञ्च चौड़ा तथा आधार की ओर प्रत्येक कोन पर एक-एक सीधा काँटा होता है । इसके ऊपर
का भाग शंक्वाकार और भीतर से दो कोशवाला होता है । **बीज—**प्रत्येक कोश में दो-दो बीज होते हैं । इसके पत्तों को
जल में डालने पर जल एकदम लुआबदार हो जाता है । इसमें न स्वाद होता है न गन्ध होती है तथा कुछ समय बाद
इसका लुआब भी निकल जाता है । इसके पत्ते तथा फलों का चिकित्सा में व्यवहार होता है ।
**रासायनिक संगठन—**इसके फलों में एक क्षाराभ, वसा, तथा राख ५% होती है ।
**गुण और प्रयोग—**बड़ा गोखरू स्नेहन, मूत्रजनन, बल्य तथा बाजीकर है । इसका मूत्रजनन धर्म बहुत उत्तम है
तथा त्वरित मालूम पड़ता है ।