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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 703

६५२ भावप्रकाशनिघण्टुः
इसके गुल्म-बड़े, आरोही तथा फैलने वाले होते हैं। शाखाएँ-धारीदार होती हैं। पत्ते-विपरीत, संयुक्त तथा
२-५ इञ्च लम्बे होते हैं। पत्रक संख्या में ७-११, अंतिम अग्र का पत्रक बड़ा तथा बगल के पत्रक विनाल तथा अग्र
के जोड़े का आधार मिला हुआ रहता है। पुष्प-सुगंधित सफेद, बाहर से कुछ गुलाबी तथा १।। इञ्च तक व्यास में रहते
हैं।
जाती का स्वर्णजाती भेद लिखा हुआ है जिसमें पीले रंग के पुष्प आते हैं। उपर्युक्त जाति (Species) में पीला
फूल नहीं पाया जाता । किन्तु जस्मिन् की एक अन्य जाति, ज० ह्यूमाइल (J. humile) होती है जिसमें पीले सुगंधित
फूल आते हैं। संभवतः यही स्वर्ण जाती हो।
कर्पूरादि वर्ग में गन्धमालती नामक एक द्रव्य का वर्णन आया है। वहाँ पर एक लता ऑर्गनोज़्मा कॅरियोफाइलॅटा
का वर्णन (पृ० २६१) आया है जिसे भी मालती कहते हैं। इसमें पुष्प सफेद आते हैं किन्तु यह ॲपोसाइनेसी
(Apocynaceae) वर्ग की लता है। चमेली के पुष्प तथा पत्तों का उपयोग किया जाता है।
रासायनिक संगठन-इसके पुष्पों में उड़नशील तैल तथा पत्तों में एक क्षाराभ एवं सेलिसिलिक अम्ल होता है।
गुण और प्रयोग-यह शीत तिक्त व्रणरोपह, व्रणशोधन एवं कुष्ठघ्न है।
(१) त्वचा के विकारों में इसके पत्तों का बाह्य प्रयोग किया जाता है। मुखपाक तथा दंतपीड़ा में पत्ते चबाने को
देते हैं। पूतिकर्ण में पत्तों से बनाया तेल कान में डालते हैं। अंगुलियों के बीच का भाग सड़ने पर पत्तों को पीसकर लेप
करते हैं। कॉर्न (Corn) पर ताजा रस लगाते हैं।
(२) पुष्पों का लेप नेत्ररोग, विस्फोट, शिरःशूल आदि में करते हैं। इससे बना तेल शिरःशूल तथा ठंडक के लिए
लगाया जाता है।
अथ यूथिका पीतयूथिका च (जूही-सुवर्णजूही) ।
तयोर्नामानि गुणाँश्चाह
यूथिका गणिकाऽम्बष्ठा सा पीता हेमपुष्पिका । यूथीयुगं हिमं तिक्तं कटुपाकरसं लघु ।। २९ ।।
मधुरं तुवरं हृद्यं पित्तघ्नं कफवातलम् । व्रणास्रमुखदन्ताक्षिशिरोरोगविषापहम् ।। ३० ।।
जूही तथा सुवर्ण जूही के संस्कृत नाम-यूथिका, गणिका, अम्बष्ठा ये नाम जूही के हैं, यदि पीली जूही हो
तो उसे "हेमपुष्पिका" कहते हैं। दोनों जूही-शीतल, तिक्त-मधुर तथा कषाय रस युक्त, एवम् पाक में तथा आस्वाद
में कटुरसयुक्त, लघु, हृदय को हितकर, पित्तनाशक, कफ तथा वात जनक और व्रण, रक्तविकार, मुख-दाँत-नेत्र-
शिरसम्बन्धी समस्त रोग तथा विष विकार को दूर करने वाली हैं। [२९-२०]
१३. जूही
हिं० - जूही । क० - कदर मल्लिगे । ते० - मागधी । ता० - उसिमल्लिगै । ले० - Jasminum auriculatum
Vahl. (जस्‌मिनम् ऑरीक्युलेटम्) । Fam. Oleaceae (ओलिएसी) ।
यह दक्षिण, कर्नाटक तथा पश्चिमाँ प्रायद्वीप में होती है। भारत के सभी स्थानों पर इसकी खेती होती है। उत्तर
प्रदेश में तो व्यापारिक दृष्टिकोण से इसकी खेती करते हैं।
इसका गुल्म-मृदुरोमश, लता के समान आरोहणशील या फैला हुआ रहता है। पत्ते-प्रायः साधारण, कभी-
कभी त्रिपत्रक जिसमें दो नीचे के पत्रक बहुत छोटे या कभी-कभी अनुपस्थित, बीच का पत्रक २-३.२ × १-१.५ से०
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