भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 702, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं। बाह्यदल १.३ से ० मी० लम्बा, रोमश एवं ६-१० मि०मि० लम्बे ५-९ विभागों में रहता है। अन्तर्दल नलिका
१-३ से० मी० तथा उसके खण्ड नलिका के बराबर होते हैं। स्त्री केशर परिपक्व होने पर ६ मि० मि०, गोल, काला
तथा बाह्यदल से घिरा रहता है।
बागवानी में इसके अनेक प्रकार पाये जाते हैं। जिनमें चार मुख्य हैं। (१) मोतिया बेला—इसमें पुष्प द्विगुण एवं
गोल अन्तर्दल युक्त तथा कली गोल रहती है। (२) बेला—इसमें भी द्विगुण अन्तर्दल कुछ लम्बे रहते हैं। (३) हजारा
बेला—इसमें पुष्प के अन्तर्दल द्विगुण नहीं रहते हैं। (४) मोगरा—अन्तर्दल बहु चक्रों में, गोल तथा कलिका १ इञ्च
व्यास में रहती है।
अन्य निघण्टुओं ने जो विभिन्न भेद वार्षिकी, ग्रैष्मी, अतिमुक्ता, मल्लिका लिखे हैं वे सब इसी ज० सम्बॅक् के
ही भेद हैं। वार्षिकी में वर्षाकाल में पुष्प आते हैं। ग्रैष्मी में ग्रीष्म ऋतु में फूल आते हैं। जिसमें फूल छोटे-छोटे होते
हैं उसे अतिमुक्ता कहा गया है। भावप्रकाशकार गुण की दृष्टि से मल्लिका को उष्ण वीर्य लिखते हैं और वार्षिकी को
शीतवीर्य। अतिमुक्ता यह पर्याय भावप्रकाशकार माधवी के लिये लिखते हैं जो दूसरी लता होती है।
इसके पत्र, पुष्प तथा मूल का उपयोग किया जाता है।
रासायनिक संगठन—इसके पुष्पों में एक सुगंधित उड़नशील तैल पाया जाता है।
गुण और प्रयोग—यह त्रिदोषघ्न, शोथघ्न, व्रणरोपक, स्तन्यनाशन एवं गर्भाशयोत्तेजक है।
(१) प्रसूता को स्तनशोथ होने पर इसके पुष्पों को पीसकर बाँधते हैं जिससे दुग्ध स्राव बन्द होकर शोथ कम होता
है।
(२) इसकी ३ माशे जड़ का क्वाथ अनार्तव तथा अनियमितार्तव में देते हैं।
(३) रक्तप्रवाहिका में इसकी ३-४ पत्तियों को जल में पीस, छान, मिश्री मिलाकर २-३ बार में देते हैं।
(४) पुराने व्रणों पर इसकी पत्तियों का लेप किया जाता है।
अथ मालती स्वर्णजाती च (जाई–पीलीजाई)।
तयोर्नामानि गुणाँश्चाह
जातिर्जाती च सुमना मालती राजपुत्रिका। चेतिका हृद्यगन्धा च सा पीता स्वर्णजातिका ।।२७।।
जातीयुगं तिक्तमुष्णं तुवरं लघु दोषजित्। शिरोऽक्षिमुखदन्तार्त्तिविषकुष्ठानिलास्त्रजित् ।।२८।।
जाई-पीलीजाई के संस्कृत नाम—जाति, जाती, सुमना, मालती, राजपुत्रिका, चेतिका और हृद्यगन्धा ये सब
“जाई” के नाम हैं, यदि पीली जाई हो तो उसे “स्वर्णजातिका” कहते हैं। दोनों जाती (जाई-पीलीजाई) तिक्त तथा कषाय
रसयुक्त, उष्ण, लघु, दोषनाशक एवम्-शिर, आँख, मुख और दाँतों के रोगों को दूर करने वाली तथा विष, कुष्ठ, वायु
और रक्तविकार को नष्ट करने वाली होती हैं। [२७-२८]
१२. चमेली
हिं०—चमेली, चम्बेली, चंबेली। बं०—चमेली, जाति। गु०—चंबेली। म०—चमेली। ता०—पिचि। ते०—
जाति। अ०—यासमीन, यास मून। फा०—यास मन। अं०—Spanish Jasmine (स्पैनिश जस्मिन)। ले०—
Jasminum grandiflorum Linn. (जस्मिनम् ग्रैण्डिफ्लोरम्)। Fam. Oleaceae (ओलिएसी)।
यह भारत में सभी स्थानों पर बागों में लगाया मिलता है। इसका आदि स्थान उत्तर पश्चिम हिमालय मानते हैं।
उत्तर प्रदेश में इसकी विस्तृत पैमाने पर खेती की जाती है।