भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 503, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें४५२ भावप्रकाशनिघण्टुः
इसका प्रयोग पीनस, कास, कफविकार, आध्मान तथा शोथादि में एवं कफविकारों में अनुपान के रूप में बहुत
किया जाता है। सुपारी, चूना, कत्था एवं इलायची आदि पान के पत्ते में रख कर उसका बीड़ा बनाकर मुखशुद्धि आदि
के लिये लोग खाते हैं। इसको खाते-खाते लोगों को इसका व्यसन हो जाता है। कोकेन खाने वाले पान में कोकेन रखकर
खाते हैं। कई औषधों को पान में रखकर खाने की प्रथा है।
जिसने पान कभी नहीं खाया है उसे प्रथम इसके सेवन के पश्चात् मुँह में जलन-सी मालूम होती है, गले में एक
तरह की जकड़न मालूम होती है, स्वाद ग्रहण करने की शक्ति कम होती है एवं मुँह आदि में छाले पड़ जाते हैं। कुछ
देर तक बेचैनी, जी का धँसना, मूर्च्छा, संन्यास, कुछ उत्तेजना एवं स्वेदोत्पत्ति आदि लक्षण किसी-किसी में होते हैं।
इसके तैल के सेवन के पश्चात् मुख तथा आमाशय में उष्णता का अनुभव होता है। प्रारंभ में केन्द्रीय वातनाड़ी
संस्थान की उत्तेजना के पश्चात् अधिक मात्रा से एक तरह का नशा उत्पन्न होता है। इसमें डायास्टेस (Diastase) की
पर्याप्त मात्रा होने के कारण यह स्टार्च आदि पिष्टमय पदार्थों के पाचन में सहायक होता है। इसके अतिरिक्त पान चबाने
से लालास्राव की वृद्धि होती है जो पाचन में सहायक होती है। भात खाने वालों में इससे विशेष लाभ होता है और
यदि वे पान बंद कर दें तो उनका पाचन ठीक नहीं होता।
पान खाने का जिन्हें व्यसन हो जाता है उन्हें पान खाने से अच्छा मालूम होता है। उनका मन प्रसन्न होता है,
थकावट दूर होती है, प्यास तथा भूख मालूम नहीं पड़ती एवं कुछ कामोत्तेजना होती है। यह तीव्र मादक नहीं होता तथा
इसके व्यसन से कोई विषैले परिणाम नहीं होते। सोकर उठने पर, स्नान के पश्चात्, भोजन के पश्चात् एवं वमन के पश्चात्,
पान के सेवन का विधान है।¹
(१) कफप्रधान रोगों में यह बहुत लाभदायक होता है। तमक श्वास, श्वसनिका शोथ एवं स्वरयंत्र शोथ आदि में
पान का रस पिलाते हैं एवं पान को ऊपर से बाँधते हैं। बच्चों के कास, श्वासकृच्छ्र, श्वसनिकाशोथ एवं प्रतिश्याय आदि
में पान के पत्तों को एरण्डतैल लगाकर, गरम कर छाती पर बाँधने से बहुत लाभ होता है।
(२) रोहिणी (डिप्थीरिया Diphtheria) नामक बच्चों में अधिक होने वाले घातक गले के विकार में ४ पत्तों
का रस थोड़े गरम पानी में मिलाकर गरारा करने को देते हैं। पान के तेल को १ बूँद की मात्रा में करीब आध पाव उष्ण
जल में मिलाकर इसी प्रकार प्रयोग करते हैं तथा उसकी वाष्प सूँघते हैं।
(३) गाँठ, शोथ एवं व्रण पर इसके पत्तों को गरम कर बाँधने से शोथ एवं वेदना कम होती है एवं व्रण जल्दी
अच्छा होता है। इसी प्रकार स्तनों पर बाँधने से दुग्ध रुक जाता है तथा सूजन कम होती है। पान के रस में थोड़ा चूना
मिलाकर शोथ आदि पर पोल्टिस के रूप में व्यवहार करते हैं।
(४) कोंकण की तरह पान के फलों को मधु के साथ खाँसी में देते हैं।
(५) उड़ीसा में इसके मूल को काली मिर्च के साथ संततिनियमन के लिये सेवन करते हैं।
(६) नेत्राभिष्यंद एवं रतौंधी में पत्तों का रस मधु मिलाकर आँख में डाला जाता है।
निषेध-नेत्ररोग, रक्तपित्त, क्षत, वातविकार, विषबाधा, शोथ, मदात्यय, मोह एवं मूर्च्छा में इसका सेवन निषिद्ध
है।²
मात्रा-स्वरस १/२-१ तो०।
१. पथ्यं सुप्तोत्थिते स्नाते भुक्ते वांते च संगरे। समायां विदुषां राज्ञां कुर्यात् तांबूलचर्वणम् ॥
२. न नेत्ररोगे न च रक्तपित्ते क्षते न वाते न विषे न शोषे। मदात्यये नापि च मोहमूर्च्छाश्वासेषु ताम्बूलमुशन्ति वैद्याः ॥
(सुषेणदेवः)