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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ४५१
२. पान
हिं०-पान। बं०-पान। म०-नागवेल, विड्याचेपान। ते०-तमाल पाकु। ता०-वेत्तिलै। गु०, मा०-
नागरवेल। मला०-वेत्तिल। फा०-तंबोल, बर्गे तम्बोल। अ०-तंबूल। अं०-Betel Leaf (बिटल लीफ)।
ले०-Piper betel Linn. (पाइपर बीटल लिन.)। Fam. Piperaceae (पाइपरेसी)।
पान-सर्वप्रसिद्ध और सर्वप्रिय एक बेल के पत्र हैं। भारतवर्ष, लंका एवं मलयद्वीप के उष्ण एवं आर्द्रप्रदेशों में
इसकी खेती की जाती है। इसकी मूलारोहिणी लता-अत्यन्त सुहावनी और कोमल होती है। कांड-अर्धकाष्ठमय,
मजबूत तथा गाँठों पर मोटा रहता है। पत्ते-पीपल के पत्तों के समान बड़े, चौड़े, अंडाकार, कुछ हृदयाकृति, कुछ
लम्बाग्र, प्रायः ७ शिराओं से युक्त, चिकने, मोटे एवं करीब १ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त रहते हैं। पुष्प-अवृन्त काण्डज
(Spike) पुष्पव्यूहों में आते हैं। फल-करीब दो इञ्च लम्बे, मांसल, लटकते हुये व्यूहाक्ष में छोटे-छोटे बहुत फल
रहते हैं। पान में मनोहर गंध रहती है तथा इसका स्वाद कुछ उष्ण एवं सुगंधयुक्त रहता है।
इसके खेत की जमीन बीच में ऊँची और दोनों किनारे नीचे होते हैं। इससे खेत में पानी नहीं ठहरता। धूप और
पाले से बचाव के लिये खेत के चारों ओर फूस की दीवार और छाजनी बना देते हैं। खेत के भीतर क्यारी बनाकर फरहद,
जियल इत्यादि की डालियाँ लगा देते हैं। इन्हीं के सहारे पान की बेल फैलती है। बंगला, साँची, महोबा, महाराज पुरी,
विलोआ, कपूरी, फुलवा इत्यादि नामों से इसकी कई जातियाँ होती हैं। ध० नि० में इसके कृष्ण और शुभ्र ये दो भेद
लिखे हुये हैं। रा० नि० में श्रीवाटी (सिरिवाडीपान), अम्लवाटी (अंबाडेपर्ण), सतसा (सातसीपर्ण), गुहागरे (अडगरपर्ण),
अम्लसरा (मालव में होने वाला अंगरापर्ण), पटुलिका (आंध्र में होने वाला पोटकुली पर्ण) एवं ह्रेसणीया (समुद्रदेशपर्ण)
ये पान के सात भेद लिखे हैं जिनके अलग-अलग गुण भी लिखे हैं।१ स्थानादि भेद से पान विभिन्न प्रकार का होता
है। अति प्राचीनकाल से अपने यहाँ पान का व्यवहार मुखशुद्धि, रुचिवृद्धि एवं सुगन्धि के लिये किया जाता है। चरक
में मात्राशितीय अध्याय में 'धार्याण्यास्येन वैशद्यरुचिसौगन्ध्यमिच्छता... कंकोलफलं पत्रं तांबूलस्य शुभं तथा एवं सुश्रुत
में अन्नपानविधि अध्याय में इसका उल्लेख है।
रासायनिक संगठन-पान के पत्तों में एक सुगन्धि उड़नशील तैल (०.२-१.०%), स्टार्च, शर्करा, टॅनिन एवं
डायास्टेस (Diastase, 0.8-1.8%) ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसका तैल इसके पीले रंग का, सुगन्धि, स्वाद में तीक्ष्ण
तथा दाहकारक एवं ०.९५८-१.०५७ वि० गु० वाला रहता है। इस तैल में चविकॉल (Chavicol), कंडेनीन
Candenene), चविबेटॉल (Chavibetol), यूजेनॉल का सामाजिक (Isomeride of Eugenol) एवं सेस्क्विटर्पेन
(Sesquiterpene) ये पदार्थ पाये जाते हैं। जावा एवं मनिला के तैल में फेनॉल (Phenols) की मात्रा बहुत रहती
है। पुराने पत्तों की अपेक्षा नवीन पत्तों में तैल, डायास्टेस एवं शर्करा की मात्रा अधिक रहती है। चविकॉल यह कार्बोलिक
एसिड की अपेक्षा ५ गुना अधिक प्रतिदूषक (Antiseptic) है जो इसके स्वरस में रहता है।
गुण और प्रयोग-पान उत्तम दीपन, पाचन, श्लेष्मघ्न, वातहर, पित्तप्रकोपक, उष्ण, स्वर्य, सुगंधि, शोथघ्न,
व्रणरोपक, प्रतिदूषक, कृमिघ्न, वृष्य एवं मुँह की कंडू-मल-क्लेद-दुर्गन्धनाशक है।
१. श्रीवाटी मधुरा तीक्ष्णा वातपित्तकफापहा। रसाढ्या सरसा रुच्या विपाके शिशिरा स्मृता ॥
स्यादम्लवाटी कटुकाम्लतिक्ता तीक्ष्णा तथोष्णा मुखपाककर्त्री। विदाहपित्तास्रविकोपनी च विष्टंभदा वातनिबर्हणी च ॥
सतसा मधुरा तीक्ष्णा कटुरुष्णा च पाचनी। गुल्मोदराध्मानहरा रुचिकृद्दीपनी परा ॥
गुहागरे सप्तशिरा प्रसिद्धा तत्पर्णजूतातिरसोऽतिरुच्या। सुगन्धितीक्ष्णा मधुरातिहृद्या सन्दीपनो पुंस्त्वकराऽतिबल्या ॥
नाम्नाऽन्याऽम्लसरा सुतीक्ष्णमधुरा रुच्या हिमा दाहनुत्। पित्तोद्रेकहरा सुदीपनकरी बल्या मुखामोदनी ॥
स्त्रीसौभाग्यविवर्धनी मदकरी राज्ञां सदा वल्लभा। गुल्माऽऽध्मानविबन्धजिच्च कथिता, सा मालवे तु स्थिता ॥
अन्ध्रे पटुलिका नाम कषायोष्णा कटुस्तथा। मलापकर्षा कंठस्य पित्तकृद्वातनाशनी ॥
हेसणीया कटुस्तीक्ष्णा हृद्या दीर्घदला च सा। कफवातहरा रुच्या कटुदीपनपाचनी ॥ (रा० नि०)