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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

२२२ भावप्रकाशनिघण्टुः
सफेदमरीच १५ भाग दूध में भिगोया जाता है । रोज दूध बदल दिया जाता है । इस प्रकार तीन दिन करने के बाद आदी
के रस में घोटकर १ रत्ती की गोली बनाई जाती है । इसकी १ गोली दिन में ३ बार दी जाती है ।
अथ त्रिकटुकनामलक्षणगुणानाह
विश्वोपकुल्या मरिचं त्रयं त्रिकटु कथ्यते । कटुत्रिकं तु त्रिकटु त्र्यूषणं व्योष उच्यते ।। ६२ ।।
त्र्यूषणं दीपनं हन्ति श्वासकासत्वगामयान् । गुल्ममेहकफस्थौल्यमेदःश्लीपदपीनसान् ।। ६३ ।।
त्रिकटु के लक्षण, नाम तथा गुण— सोंठ, पीपर तथा मरिच इन तीनों के योग को 'त्रिकटु' कहते हैं । कटुत्रिक,
त्रिकटु, त्र्यूषण और व्योष ये संस्कृत नाम 'त्रिकटु' के हैं । त्रिकटु— अग्निदीपक होता है तथा श्वास, कास, चर्मसम्बन्धी
रोग, गुल्म, मेह, कफ, स्थूलता, मेद, श्लीपद और पीनस इन सब रोगों को दूर करता है । [६२-६३]
अथ पिप्पलीमूलस्य नामानि गुणांश्चाह
ग्रन्थिकं पिप्पलीमूलमूषणं चटकाशिरः । दीपनं पिप्पलीमूलं कटूष्णं पाचनं लघु ।। ६४ ।।
रूक्षं पित्तकरं भेदि कफवातोदरापहम् । आनाहप्लीहगुल्मघ्नं कृमिश्वासक्षयापहम् ।। ६५ ।।
पिपरामूल के नाम तथा गुण— ग्रन्थिक, पिप्पलीमूल, ऊषण और चटकाशिर ये संस्कृत नाम 'पिपरामूल' के
हैं । पिपरामूल— अग्निदीपक, कटुरस वाला, उष्णवीर्य, पाचक, लघु, रूक्ष, पित्तकारक, मल को भेदन करने वाला,
कफ, वायु एवम् उदर सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला होता है । तथा आनाह, प्लीहा, गुल्म, कृमि, श्वास और क्षय
इन सब रोगों को नष्ट करने वाला होता है । [६४-६५]
८. पिपलामूल
हिं०— पीपलामूल, पीपरामूल । बं०— पिपुल मूल । म०— पिपली मूल, पिपलमूल, पिपला मूल । गु०— पीपरी
मूलना गंडोडा, पीपली मूल, पीपरी मूल । क०— पिप्पलीयवरु, हिप्पलीयवेरु, हिप्पली मूल । ते०— मोडो, पिप्पली वेरु,
पिप्ली दुम्प । पं०— पिप्पला मूल । मा०— पीपला मूल । ता०— पिप्पली मूल । फा०— फिलफिल्द्रे, फिलफिल् मूयह ।
अ०— फिल्फिलादराज, फिलफिले मोया । अं०— Piper root (पाइपर रूट) । ले०— Root of the Piper
longum Linn. (रूट ऑफ दी पाइपर लॉङ्गम) ।
पीपल लता का गाँठदार जड़ को पीपलामूल कहते हैं । इसकी जगह कितने पंसारी पीपल लता की मोटी शाखाओं
को छोटे-छोटे टुकड़े कर बेचते हैं । इसलिये अच्छी तरह देख भाल कर खरीदना चाहिये ।
गुण और प्रयोग— पीपला मूल पीपल के ही समान लेकिन कम गुण वाली है । यह पीपल से अधिक उत्तेजक
है । डाक्टर देसाई के मतानुसार प्रसव होने में अधिक समय लग रहा हो तो पीपरामूल, ईश्वर मूल और हींग, पान के
साथ खिलाना चाहिये जिससे पीड़ा बढ़कर प्रसव हो जाता है । प्रसव के पश्चात् तुरंत इसका फांट देने से आवल (अपरा)
गिरने में सहायता होती है ।
अथ चतुरूषणस्य लक्षणगुणानाह—
त्र्यूषणं सकणामूलं कथितं चतुरूषणम् । व्योषस्येव गुणाः प्रोक्ता अधिकाश्चतुरूषणे ।। ६६ ।।
चतुरूषण के लक्षण, नाम तथा गुण— त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मरिच) में यदि पिपरामूल मिला दिया जाय तो
इसे चतुरूषण कहते हैं । पहले जितने गुण त्रिकटु के कह आये हैं, वही सब गुण चतुरूषण में अधिक रूप से रहते
हैं । [६६]