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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २२१
सफेद मरिच को-बं० में ‘सादा मरिच’, म०–में ‘पांढरेमिरे, गु०– में ‘धोला मरी’, क०–में ‘विलेय मेणसु’ और
ता०–में ‘मिलाओ’ कहते हैं।
रासायनिक संगठन- इसमें उड़नशील, जल में न घुलनेवाला, पाइपरीन नामक एक रवेदार क्षाराभ ५-९%,
पाइपेरीडीन ५%, चविसीन नामक कटुराल, एक अन्य हरे रंग की कटुराल ६%, उड़नशील तैल १-२.५%, स्टार्च
३०%, ईथर में घुलनशील न उड़ने वाला पदार्थ ६%, प्रोटोड ७% तथा लिगनिन, गोंद आदि कुछ अन्य द्रव्य पाये जाते
हैं।
गुण और प्रयोग- मरिच का प्रयोग अनेक योगों में किया जाता है। यह सुगन्धित, उत्तेजक, पाचक, अग्निदीपक,
रुचिकर, स्वेदकर, कफघ्न एवं कृमिहर है। इसका उत्तेजक प्रभाव आंत्र एवं मूत्र संस्थान की श्लेष्मल कला पर पड़ता
है। इसके सेवन से मूत्र की मात्रा बढ़ती है और इसका उपयोग पुराने सुजाक में किया जाता है। इसके सेवन से आमाशयिक
रस की वृद्धि होती है और पाचन की क्रिया सुधरती है। घृत के पाचन में यह विशेष उपयोगी है। इसका उपयोग आध्मान,
अपचन, प्रवाहिका, आमाशय शैथिल्य आदि में अच्छा होता है।
(१) प्रवाहिका में इसके सूक्ष्म चूर्ण को हींग एवं अफीम के साथ दिया जाता है।
(२) स्याहजीरा एवं काली मिरच मधु के साथ नित्य सेवन से गुदा को श्लेष्मकला का संकोच होकर गुदभ्रंश एवं
अर्श में बहुत लाभ होता है।
(३) इसके पाइपरीन नामक क्षार के ज्वरघ्न गुण के कारण इसका उपयोग मलेरिया में क्वीनीन् के साथ अधिक
प्रभावकारी है।
(४) विसूचिका के प्रारम्भ में मरिच, अफीम तथा हींग तीनों समान मात्रा में लेकर २ रत्ती की मात्रा में प्रत्येक दो
या चार घण्टे के बाद में देने से लाभ होता है।
(५) खाँसी में मधु एवं घृत के साथ देने एवं दही के साथ सेवन करना चाहिये।
अधिक मात्रा में मरिच के सेवन से उदरशूल, वमन, बस्ति एवं मूत्र मार्ग प्रदाह, उदर्द आदि विकार उत्पन्न होते
हैं।
बाह्य प्रयोग- अनेक चर्म विकारों में एवं वायु के विकारों में किया जाता है।
(१) इससे सिद्ध तैल की मालिश आमवात, गठिया, अङ्गघात एवं कण्डू, पामा आदि में उपयोगी है।
(२) घृत के साथ इसका लेप अर्श के मस्से पर करने से वातार्शशूल एवं शिथिलता दूर होती है।
(३) फोड़े, फुन्सियों की आमावस्था में उनको बैठाने के लिए उन पर इसको पीस कर लगाया जाता है।
(४) विषैले कीड़ों के काटने पर विनेगार (सिरका) के साथ इसको पीस कर लगाना चाहिये।
(५) दही के साथ घिसकर इसके अञ्जन से अनेक नेत्र रोग जैसे रात्र्यंध, कण्डू आदि में लाभ होता है।
(६) सर की दद्रु के कारण यदि सर के बाल झड़ गये हों तो इसे प्याज और नमक के साथ लगाने से लाभ होता
है। इसी प्रकार इसका लेप शिरःशूल में भी उपयोगी है।
(७) इसके क्वाथ से कुल्ला करने से दंतशूल दूर होता है एवं बढ़ी हुई उपजिह्वा में भी लाभ होता है।
(८) इसका दंतमंजनों में भी व्यवहार होता है
मात्रा- चूर्ण २-४ रत्ती।
श्वेत मरिच- काली मरिच के समान ही गुण वाली लेकिन उससे कुछ हीन गुण होती है। इसका एक विशेष
प्रयोग श्लीपद में शोथ के साथ बार-बार ज्वर के आक्रमण को रोकने के लिए किया जाता है। बचनाग एक भाग और