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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 217

१६४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
अथ दोषजान् व्याधीनाह-
❖ दोषजाः-मिथ्याऽऽहारविहारप्रकुपितवातपित्तकफजाः। ननु मिथ्याहारविहाराणामपि प्राक्तनसुकृतेन
नैरूज्यं दृश्यत एव। ततो दोषजेष्वपि प्राक्तनं दुष्कर्मैव कारणम्, तत्कथं दोषजा इति ? उच्यते-दोषजेष्वपि
वस्तुत आदिकारणं दुष्कर्म वर्तत एव, किन्तु तत्र मिथ्याऽऽहार-विहारदूषिता दोषा हेतवो दृश्यन्त इति दोषजा
इत्युच्यन्त इति समाधिः।
'दोषज' व्याधि- 'दोषज' व्याधि वे कहलाती हैं जो मिथ्या (अवैध) आहार-विहार करने से कुपित हुये वात, पित्त
तथा कफ से उत्पन्न होती है। यहाँ यदि ऐसा कहा जाय कि जब मिथ्या आहार-विहार करने वाले लोगों को भी प्राक्तन
पुण्य के बल से रोग रहित देखते हैं, अतः दोषों से उत्पन्न होने वाले रोगों का भी प्राक्तन पाप ही प्रधान कारण है, तब
व्याधियाँ कैसे 'दोषज' होती हैं ? इसका उत्तर यह है कि- यद्यपि दोषज व्याधियों में भी प्राक्तन पाप ही प्रधान कारण
होता है, किन्तु तो भी यहाँ पर मिथ्या आहार-विहार से दूषित दोष भी कारणरूप से अवश्य दिखाई पड़ते हैं अतः पूर्वोक्त
.व्याधियाँ दोषज कहलाती हैं।
अथ कर्मदोषोद्भवान् व्याधीनाह-
स्वल्पदोषा गरीयांसस्ते ज्ञेयाः कर्मदोषजाः ॥२॥
कर्म तथा दोष दोनों से उत्पन्न व्याधि- 'जो व्याधियाँ स्वल्प दूषित वातादि दोषों से उत्पन्न होने पर भी अधिक
बढ़ जायें, उन्हें 'कर्मदोषज' समझना चाहिये ॥२॥
❖ अत्र कारणं दुष्कर्म प्रबलं यतो दोषल्पत्वेऽपि व्याधेर्गरीयस्त्वं तत्कर्मक्षयादेव क्षीणं भवति।
दोषाः स्वल्पा अपि निदानत्वेनोक्ता दृश्यन्त एवेति दोषाणां कारणतां मन्यत इति कर्मदोषोद्भवाः ॥३॥
पूर्वोक्त 'कर्मदोषज' व्याधियों में प्राक्तन दुष्कर्म ही प्रबल कारण होते हैं क्योंकि दोषों की दुष्टता में कमी होने पर
भी व्याधियों की भयङ्करता बनी रहती है और भोग के द्वारा कर्मक्षय होने से ही क्षीण होती है और दोषों की स्वल्पता होने
पर भी वे उत्पन्न होने में निदान (कारण) रूप से दिखलाई पड़ते हैं। अतः वे (दोष) भी कारण माने जाते हैं। इस भाँति
से ये रोग 'कर्मदोषज' कहलाते हैं ॥३॥
अथ रोगक्षयहेतूनाह-
कर्मक्षयात्कर्मकृता दोषजाः स्वस्वभेषजैः। कर्मदोषोद्भवा यान्ति कर्मदोषक्षयात् क्षयम् ॥४॥
कर्मजादि रोगों के क्षीण होने के कारण-भोग के द्वारा प्राक्तन दुष्कर्मों का क्षय होने से 'कर्मज' व्याधियों
का, अपनी-अपनी ओषधियों के अर्थात् जिस दोष की जो ओषधियाँ हैं, उनके सेवन करने से 'दोषज' व्याधियों का एवं
भोगों के द्वारा प्राक्तन अशुभ कर्मों तथा ओषधियों के द्वारा दोषों के क्षय होने से 'कर्मदोषज' व्याधियों का क्षय होता है ॥४॥
❖ दोषजाः स्वस्वभेषजैरिति। दोषजेषु आदिकारणं दुष्कर्म तद्भेषजार्थं द्रव्यक्षयादिजनितदुःखभोगेन
कटुतिक्तकषायाद्यहृद्यभक्षणादिजनितदुःखभागेन च क्षयं याति। शेषा दुष्टा हेतवो दोषास्ते स्वस्वभेषजैः क्षयं
यान्तीत्यर्थः ॥४॥
'दोषजाः स्वस्वभेषजैः' इसका तात्पर्य यह है कि-दोषज व्याधियों में भी प्रधान कारण तो प्राक्तन दुष्कर्म ही है
अतः वह (दुष्कर्म) औषध तैयार करने में जो धन का क्षय होने से दुःख होता है उसी का भोग करने के द्वारा एवं कटु-
तिक्त तथा कषायादि रसों से युक्त होने से अप्रिय औषधों के भक्षण आदि से उत्पन्न हुये दुःख का भोग करने के द्वारा
नष्ट होता है और इसके अतिरिक्त जो अवशिष्ट कारण वातादि दुष्ट दोष हैं, वे अपने-अपने औषधों के सेवन के द्वारा क्षीण
होते हैं ॥४॥
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