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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 216

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम्
अथ वाग्भटोक्तं व्याधेर्लक्षणम्-
रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता। रोगा दुःखस्य दातारो ज्वरप्रभृतयो हि ते ।।१।।
रोग के लक्षण-दोषों की विषमता ही को रोग तथा दोषों की समता ही को अरोगता (रोगों का न रहना) कहते
हैं, इनमें से जो रोग हैं वे प्राणियों को दुःख देनेवाले होते हैं और वे ज्वर आदि कहलाते हैं ।।१।।
ते च स्वाभाविकाः केचित्केचिदागन्तवः स्मृताः। मानसाः केचिदाख्याताः कथिताः केऽपि कायिकाः ।।२।।
चार प्रकार के रोग-उन रोगों में कोई 'स्वाभाविक', कोई 'आगन्तुक', कोई 'मानस' और कोई 'कायिक'
कहलाते हैं ।।२।।
❖ तत्र स्वाभाविकाः = शरीरस्वभावादेव जाताः क्षुत्पिपासासुषुप्तिजरामृत्युप्रभृतयः। अथवा
स्वभावादुत्पत्तेर्जाता स्वाभाविकाः = सहजा इति यावत्। ते च जन्मान्धत्वादयः। आगन्तवोऽभिघातादिजनिताः।
अथवा जन्मोत्तरभाविनः। मानसाः = कामक्रोधलोभमोहभयाभिमानदैन्यपैशुन्यशोकविषादेर्ष्याऽसूया-मात्सर्यप्रभृतयः,
अथवा उन्मादापस्मारमूर्च्छाभ्रममोहतमःसंन्यासप्रभृतयः। कायिकाः = पाण्डुरोगप्रभृतयः ।।२।।
उनमें 'स्वाभाविक' रोग वे कहलाते हैं जो शरीर के स्वभाव से ही उत्पन्न होते हैं, जैसे—भूख, प्यास, गाढ़ निद्रा,
वृद्धता तथा मृत्यु आदि। अथवा जो जन्म से (माँ के पेट से) ही उत्पन्न होते हैं, वे भी 'स्वाभाविक' कहलाते हैं। जैसे—
जन्म से ही अन्धा, बहिरा आदि। आगन्तुक-रोग वे हैं जो चोट आदि लगने से अथवा जन्म के बाद होनेवाले हैं। 'मानस'
रोग वे कहलाते हैं, जो मन में उत्पन्न होते हैं, जैसे-काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, अभिमान, दीनता, पिशुनता
(चुगलखोरी), शोक, विषाद, ईर्ष्या, असूया और मत्सरता आदि, अथवा उन्माद (पागलपन), अपस्मार (मिर्गी), मूर्च्छा,
भ्रम, मोह, अन्धकार और संन्यास आदि। 'कायिक' रोग वे कहलाते हैं, जो शरीर में उत्पन्न होते हैं, जैसे-पाण्डु
आदि ।।२।।
अथ व्याधिभेदानाह-
कर्मजाः कथिताः केचिद्दोषजाः सन्ति चापरे। कर्मदोषोद्भवाश्चान्ये व्याधयस्त्रिविधाः स्मृताः ।।३।।
व्याधियों के भेद—कोई व्याधियाँ 'कर्मज' और कोई 'दोषज' तथा कोई कर्मज तथा दोषज दोनों होने से
'कर्मदोषोद्भव' अर्थात् 'कर्मदोषज' कहलाती हैं। इस प्रकार हेतुभेद से व्याधियों के तीन भेद होते हैं ।।३।।
तत्र कर्मजान् व्याधीनाह-
यत्राक्तनं दुष्कर्म प्रबलं केवलभोगनाश्यम्, प्रायश्चित्तनाश्यं वा, ततो जाताः, न तु दुष्टवातादिदोषेण
जनितास्तथा-
यथाशास्त्रं तु निर्णीतो यथाव्याधिचिकित्सतः। न शमं याति यो व्याधिः स ज्ञेयः कर्मजो बुधैः ।।१।।
'कर्मज' व्याधि—जो पूर्वजन्मकृत दुष्कर्म (पाप) प्रबल होते हैं वे केवल भोग से अथवा प्रायश्चित्त से नाश होने
वाले होते हैं, अत एव जो व्याधियाँ उन्हीं से उत्पन्न हैं, किन्तु दूषित वातादि दोषों से नहीं उत्पन्न हुई हैं, वे ही 'कर्मज'
कहलाती हैं। उसका लक्षण यह है कि—'जिसका शास्त्रानुसार निर्णय करके उसी निर्णीत के अनुकूल चिकित्सा भी हुई
हो किन्तु फिर भी जो शान्त न हो उसी को 'कर्मज' व्याधि जानना चाहिये ।।१।।