भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
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शय्या के विषय में अन्य मत १३९ | सन्ध्या काल के निषिद्ध कर्म १४८
शरीर दबवाने के गुण १३९ | रात्रि की चाँदनी, ओस और अन्धकार के गुण १४९
धीरे तथा जोरों से बहती हुई वायु सेवन के गुण १३९ | रात्रि भोजन का विधान १४९
पूर्वी वायु (पुरवइया हवा) के सेवन से गुण दोष १३९ | इच्छा होने पर मैथुन न करने से दोष १४९
दक्षिणी तथा पश्चिमी वायु सेवन के गुण-दोष १४० | स्त्रियों की बालादि अवस्था का विचार १४९
उत्तरी वायु के गुण-दोष १४० | बाला, तरुणी और प्रौढा स्त्री सेवन का समय १४९
आग्नेय, नैर्ऋत्य, वायव्य, ईशान तथा चौतरफा | सद्यः बल उत्पन्न करने वाले पदार्थ १५०
बहने वाली वायु के गुण १४० | सद्यः बल को हरण करने वाले पदार्थ १५०
पङ्खे की वायु के गुण १४० | तरुणी और वृद्धा स्त्रीसंभोग का फल १५०
दिन में सोने का निषेध १४१ | नियम पूर्वक स्त्री संभोग के गुण १५०
दिन में सोने योग्य जन १४१ | ऋतु भेद से स्त्री सेवन का प्रकार १५०
शयन, मर्दन आदि का गुण १४१ | वसन्तादि ऋतुओं में स्त्रीसेवन के मध्यन्तर काल १५०
उदर में अन्न के ठहरने के कारण १४१ | ऋतुभेद से स्त्रीसेवन के समय १५१
खाये हुए अन्न के उदर में न ठहरने के हेतु १४२ | स्त्रीसम्भोग का निषिद्ध समय १५१
भोजन के बाद परित्याग करने के योग्य अन्यान्य | स्त्रीसम्भोग करने योग्य स्थान १५१
कर्म १४२ | स्त्रीसम्भोग के अयोग्य स्थान १५१
अजीर्ण होने के कारण १४२ | स्त्रीसम्भोग करने के समय पुत्रार्थी पुरुषों का
अध्यशन के लक्षण १४३ | वेषादि १५१
प्रातःकाल अजीर्ण मालूम पड़ने पर भोजन का | मैथुन करने के अयोग्य पुरुष १५१
उपयाय १४३ | मैथुन के योग्य स्त्री १५२
दिन में स्त्री सम्भोग का निषेध १४४ | मैथुन के अयोग्य स्त्री १५२
बैठे रहने, रास्ता चलने एवं धीरे-धीरे | रजस्वला स्त्री के साथ सम्भोग करने से दोष १५२
टहलने के गुण-दोष १४४ | संन्यासिनी आदि स्त्रियों के साथ संभोग करने में
पगड़ी, मुरेठा आदि धारण करने के गुण-दोष १४४ | दोषान्तर १५२
जूता पहनने के गुण १४४ | गर्भिणी आदि स्त्रियों के साथ संभोग करने में
जूता न पहने से अवगुण १४४ | दोषान्तर १५२
छाता तथा दण्ड धारण करने के गुण १४५ | भूखे प्यासे आदि होकर तथा मध्याह्न में स्त्री
पालकी, नौका, हाथी और घोड़े की सवारी | संभोग करने से दोष १५३
करने के गुण १४५ | रुग्णावस्था या प्रातःकाल में स्त्रीसंभोग से दोष १५३
धूप तथा छाया सेवन के गुण १४५ | पशु आदि की योनि में मैथुन करने के दोष १५३
वर्षा तथा कुहेसा के सेवन के गुण १४५ | वेग रोकने से या विपरीत मैथुन करने से दोष १५४
अग्नि तथा धूप सेवन के गुण १४५ | स्खलित होते हुये शुक्र के रोकने का दोष १५४
सत्पुरुषों के आचरण १४६ | मैथुन करने के बाद हितकारक द्रव्य १५४
सन्ध्या समय में वर्ज्य कर्म १४८ | अत्यन्त मैथुन करने से होने वाले रोग १५४
चाँदनी, ओस और अन्धकार के गुण १४८ |