भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषय-सूची १५
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शीतकाल में प्रलेप के योग्य द्रव्य १२० | गुरु अन्न का भोजन निषेध १२८
उष्ण काल में प्रलेप के योग्य द्रव्य १२० | छः प्रकार का आहार १२८
वर्षाकाल में प्रलेप के योग्य द्रव्य १२१ | स्वभाव और संस्कार से गुरु तथा स्वभाव से
प्रलेप के गुण १२१ | लघु भोज्य पदार्थों के परिमाण १२९
सुगन्धित पुष्प तथा पत्र धारण के गुण १२१ | शुष्कादि द्रव्यों के भोजन से दोष १३०
भूषण धारण करने के गुण १२१ | सत्तू खाने की विधि १३०
रत्नों के धारण करने के गुण १२१ | सत्तू खाने में वर्ज्य कर्म १३०
सूर्यादि नवग्रहों को प्रसन्न करनेवाले रत्न १२२ | बहुत तथा कम भोजन करने के दोष १३१
सुन्दर वस्त्रादि धारण करने के गुण १२२ | असमय में भोजन करने के दोष १३१
सिद्ध मन्त्र, महौषधादि धारण के गुण १२२ | भोजन का समय व्यतीत होने पर भोजन करने
भोजन समय मङ्गल वस्तु दर्शन के गुण १२२ | से दोष १३१
मङ्गलप्रद वस्तु १२२ | भोजन का प्रमाण १३१
खड़ाऊँ धारण करने के गुण १२२ | भोजन के बीच में थोड़ा-थोड़ा जलपान की विधि १३२
स्वाभाविक मानुषी इच्छा १२३ | भोजन के आरम्भ, मध्य अथवा अन्त में जल
भोजन की इच्छा रोकने से हानि १२३ | पीने का फल १३२
प्यास रोकने से हानि १२३ | प्यासे के लिये भोजन और भूखे के लिये जलपान
नींद रोकने से हानि १२३ | का निषेध १३२
भूख लगने पर भोजन न करने से हानि १२३ | भोजन के अन्त में दुग्धपान विधि १३२
भूख लगने पर भोजन करने का गुण १२३ | भोजनोपरान्त आचमन विधि १३४
भोजन का समय १२३ | भोजनोपरान्त कर्म १३५
प्रातःकालीन भोजन का समय १२४ | भोजनोपरान्त वातादि की वृद्धि १३५
भोजन का अनियमित समय १२४ | भोजनोपरान्त कफ वृद्धि का प्रतीकार १३६
आहार परिपाक के लक्षण १२४ | पान खाने का समय १३६
भोजन करने योग्य स्थान १२४ | पान के गुण १३६
भोजन के समय शुभाशुभ दृष्टि १२५ | सुपारी के गुण १३७
भोजन करने योग्य पात्र १२५ | खैर, चूना युक्त पान के गुण १३७
जलपात्र का विधान १२५ | पान के अग्र तथा मध्य भागों का परित्याग न
भोजन के समय सबसे पहले भोज्य वस्तु १२६ | करने से दोष १३७
भोजन के समय ब्रह्मादि का स्मरण १२७ | पान के दो पीक थूकने के बाद खाने का विधान १३८
भोजन का क्रम १२७ | अधिक पान खाने से दोष १३८
स्वाद अन्न के लक्षण और गुण १२७ | पान खाने के अयोग्य पुरुष १३८
अत्यन्त गर्म, शीतल, सूखा और गीला | भोजन के बाद टहलने के गुण १३८
भोजन करने से दोष १२८ | भोजनोपरान्त शयन विधि १३८
अत्यन्त शीघ्रता तथा धीरे-धीरे अन्न | सर्वदा बायें करवट लेटने का विधान १३८
खाने के दोष १२८ | शय्या का विधान १३९