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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 181

१२८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
अथ स्वाद्वन्नस्य गुणमाह-
सौमनस्यं बलं पुष्टिमुत्साहं वृद्धिमायुषः । स्वादु सञ्जनयत्यन्नमस्वादु च विपर्ययम् ।। १४३९ ।।
स्वादिष्ट अन्न के गुण—स्वादिष्ट अन्न भोजन करने पर चित्त की प्रसन्नता, बल, शरीर की पुष्टता, उत्साह और
आयु की वृद्धि होती है और अस्वादिष्ट अन्न भोजन करने पर इसके विपरीत अर्थात् चित्त की अप्रसन्नता, बलक्षय, अपुष्टता,
उत्साह तथा आयु की हानि होती है ।। १४३९ ।।
अथात्युष्णान्नादिभोजने दोषानाह-
अत्युष्णान्नं बलं हन्ति शीतं शुष्कं च दुर्जरम् । अतिक्लिन्नं ग्लानिकरं युक्तियुक्तं हि भोजनम् ।। १४४० ।।
अत्यन्त गर्म, शीतल, सूखा और गीला भोजन करने से दोष—अत्यन्य उष्ण अन्न भोजन करने से बल का
नाश, शीतल तथा शुष्क अन्न खाने से देर में हजम और जलादि से अत्यन्त गीला अन्न ग्लानि उत्पन्न करने वाला होता
है। अत एव सर्वदा युक्तियुक्त (न अत्यन्त उष्ण, न अत्यन्त शीतल, न अत्यन्त शुष्क और न अत्यन्त गीला) अन्न भोजन
करना चाहिये ।। १४४० ।।
अथातिद्रुतविलम्बिताशनयोर्दोषानाह-
अतिद्रुताशिताहारे गुणान्दोषान्न बिन्दति । भोज्यं शीतमहृद्यं च स्याद्विलम्बितमश्नतः ।। १४४१ ।।
अत्यन्त शीघ्रता तथा अत्यन्त धीरे-धीरे अन्न खाने के दोष—अत्यन्त शीघ्रता से भोजन करने पर भोज्य पदार्थों
के गुण तथा दोषों का परिज्ञान नहीं हो पाता तथा अत्यन्त धीरे-धीरे भोजन करने से भोज्य पदार्थ शीतल और अहृद्य (हृदय
को अप्रिय) हो जाता है ।। १४४१ ।।
अथ गुर्वन्नं त्रिविधं तन्निवारयन्नाह-
मन्दानलो नरो द्रव्यं मात्रागुरु विवर्जयेत् । स्वभावतश्च गुरु यत्तथा संस्कारतो गुरु ।। १४४२ ।।
मात्रागुरुस्तु मुद्गादिर्माषादिः प्रकृतेर्गुरुः । संस्कारगुरु पिष्टान्नं प्रोक्तमित्युपलक्षणम् ।। १४४३ ।।
गुरु अन्न का भोजन निषेध—मन्द अग्निवाले मनुष्य मात्रा से, स्वभाव से और संस्कार से जो गुरु पाक अन्न
है उनका भोजन करना छोड़ दें, उसमें मात्रा से गुरु-मूँग वगैरह हैं ये सब वस्तुतः लघु होते हुये भी अधिक मात्रा में खाने
पर गुरु होते हैं। स्वभाव से गुरु-उड़द, मटर आदि हैं, ये सब लघुमात्रा में खाने से भी स्वभावतः परिपाक में गुरु ही
होते हैं संस्कार से गुरु—पिष्टान्न (पिसा हुआ अन्न पिष्ठी) आदि होते हैं, ये सब पाकादि संस्कार से गुरु कहलाते हैं। यहाँ
मुद्गादि उपलक्षण हैं अतः मन्दाग्नि वाले इनके सदृश अन्यान्य गुरु पदार्थों का भी भोजन नहीं करें ।। १४४२-१४४३ ।।
अथाहारस्य षाड्विध्यमाह-
आहारं षड्विधं चूष्यं पेयं लेह्यं तथैव च । भोज्यं भक्ष्यं तथा चर्व्यं गुरु विद्याद्यथोत्तरम् ।।
छः प्रकार का आहार—आहार छः प्रकार का होता हैं (१) चूष्य (चूसने लायक), (२) पेय, (पीने लायक),
(३) लेह्य (चाटने लायक), (४) भोज्य, (भोजन करने लायक), (५) भक्ष्य (दाँतों से काट कर खाने लायक) और (६)
चर्व्य (चबाने लायक) ये सब उत्तरोत्तर गुरु होते हैं ।। १४४४ ।।
❖ चूष्यम्=इक्षुदाडिमादि, पेयं=पानकशर्करोदकादि, लेह्यं=रसालाक्वथितादि, क्वथिता 'कढ़ी' इति
लोके । भोज्यं=भक्तसूपादि, भक्ष्यं=लड्डुकमोदकादि, चर्व्य=चिपिटचणकादि ।। १४४४ ।।
'चूष्य' से ईख, अनार आदि, 'पेय' से शक्कर और जल से बने हुये शर्बत आदि, 'लेह्य' से रसाला (सिखरन),
'क्वथिता' से लोक में प्रसिद्ध कढ़ी आदि, 'भोज्य' से भात, दाल आदि, 'भक्ष्य' से लड्डू-मोदक आदि और 'चर्व्य' से
चिउड़ा, चना आदि का ग्रहण करना चाहिये ।। १४४४ ।।