भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
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पित्तों के नाम ३७ | शुक्र के स्वरूप ६२
पाचकादि पित्तों के स्थान तथा कर्म ३७ | जीव का आश्रय ६२
श्लेष्मा (कफ) का स्वरूप ४१ | गर्भ उत्पन्न करने वाले शुक्र के लक्षण ६२
क्लेदनादि कफों के स्थान ४१ | शुक्र के स्थान ६२
अवलम्बन, रसक, स्नेहन तथा श्लेषण नामक | शुक्र के निकलने के मार्ग ६३
कफों के कर्म ४२ | शुक्र के क्षरण होने में कारण ६३
धातु शब्द की निरुक्ति ४३ | आर्तव के स्वरूप ६३
धातुओं के कार्य ४३ | गर्भग्रहण के योग्य आर्तव ६४
रस धातु की निरुक्ति ४३ | धातुगुण-वर्णन ६४
रस के स्वरूप ४३ | धातुओं के मल ६४
रस के स्थान और कर्म ४४ | उपधातु का लक्षण ६५
रक्त के स्वरूप ४४ | आशय के लक्षण ६५
रक्त के स्थान ४५ | वाग्भटोक्त आशयों का क्रम ६५
मांस के स्वरूप ४५ | कलाओं के स्वरूप ६६
मांसपेशियों की संख्यायें ४५ | मर्मस्थल के लक्षण ६६
मांसपेशियों के कर्म ४७ | मर्मों की संख्या तथा स्थान ६६
मेद का स्वरूप और स्थान ४७ | मर्मों के कार्य ६६
हड्डियों के स्वरूप और संख्याएँ ४८ | सद्यःप्राणहरण करने वाले मर्मस्थल ६७
हड्डियों के प्रयोजन ४९ | शृङ्गाटक मर्म ६७
मज्जा के स्वरूप और स्थान ५० | अधिपति मर्म ६७
शुक्र की उत्पत्ति ५० | कण्ठशिरा या शिरामातृका मर्म ६७
आमाशय का स्थान ५१ | गुदमर्म ६७
कफ का स्वरूप ५१ | हृदय मर्म ६७
ग्रहणी का लक्षण ५२ | बस्ति मर्म ६८
पंचमहाभूतों में चरकोक्त पञ्चाग्नि का निर्देश ५३ | नाभि मर्म ६८
आहार से रसादि का निर्माण ५३ | कालान्तर में प्राणहरण करने वाले मर्म ६८
मूत्र और पुरीषोत्सर्ग में कारण ५४ | वक्षो मर्म ६८
आहार रस का कार्य ५४ | स्तनरोहित मर्म ६८
ओज के लक्षण ५८ | अपलाप मर्म ६८
स्त्रियों का वीर्य विकृत गर्भ में कारण ५९ | अपस्तम्भ मर्म ६८
शरीर में आहार-रस का सञ्चार ६० | सीमन्त मर्म ६९
वाजीकरण ओषधियों का प्रयोजन ६० | तल मर्म ६९
शुक्रवर्धक पदार्थ ६१ | क्षिप्र मर्म ६९
बालकों के अदृश्य शुक्र में कारण ६१ | इन्द्रबस्ति मर्म ६९
वृद्धावस्था में शुक्रवृद्धि का ह्रास ६२ | बृहती मर्म ६९
पार्श्वसन्धि मर्म ६९
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