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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1088, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 1088

अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०३७
धूमपान में ओषधि का कल्क-शमनसंज्ञक धूमपान में छोटी इलायची आदि का, बृंहण संज्ञक धूमपान में घृतादि
युक्त राल का, रेचन संज्ञक धूमपान में तीक्ष्ण द्रव्यों का, श्वास (कास) नाशक धूमपान में कटेरी तथा काली मिरिच का
और वामनसंज्ञक धूमपान में स्नायु तथा चमड़े के कल्क का धूमपान कराना चाहिये। व्रण में नीम, वच आदि के कल्क
का धूम देना उचित होता है। इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार के भी धूम का प्रयोग रोग-शान्ति के लिये गृह में करना
चाहिये ॥१९-२१॥
अथ गृहदेयधूममाह-
मयूरपिच्छं निम्बस्य पत्राणि बृहतीफलम् । मरिचं हिङ्गु मांसी च वीजं कार्पाससम्भवम् ।। २२ ।।
छागरोमाहिनिर्मोको विष्ठा वैडालिकी तथा । गजदन्तश्च तच्चूर्णं किञ्चिद्घृतविमिश्रितम् ।। २३ ।।
गेहेषु धूपनं दत्तं सर्वान् बालग्रहान् हरेत् । पिशाचान् राक्षसान् हत्वा सर्वज्वरहरं भवेत् ।। २४ ।।
गृह में देने योग्य धूम-मयूर का पंख, नीम के पत्ते, बड़ी कटेरी के फल, काली मिरिच, हींग, जटामांसी, कपास
के बीज (बिनौला) बकरे का बाल, साँप की केंचुल, बिल्ली की विष्ठा, हाथीदाँत इन सबों का चूर्ण करके उसमें थोड़ा
घी मिलाकर गृह में धूनी देने से सभी प्रकार के बालकों के ग्रह दूर होते हैं तथा यह धूनी पिशाच तथा राक्षस सम्बन्धी
बाधा को दूर कर सम्पूर्ण ज्वर को नष्ट करती है। इसीका नाम ‘अपराजित धूम’ है ॥२२-२४॥
❖ अहिनिर्मोकः=सर्पकञ्चुकः ।। २२-२४ ।।
यहाँ ‘अहिनिर्मोक’ पद का ‘साँप की केंचुल’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥२२-२४॥
इत्यपराजितो धूमः ।
अथ धूमपाने त्याज्यकार्याण्याह-
मनस्तापं रजःक्रोधौ धूमपाने निवारयेत् । नेत्राणि धातुजान्यहुर्नलवंशादिजान्यपि ।। २५ ।।
धूमपान में त्याग करने योग कार्य-धूमपान करने पर मन में सन्ताप नहीं होने देना चाहिये तथा धूलि से दूर
रहना चाहिये और क्रोध नहीं करना चाहिये। धूमपान की नली या तो तामा आदि धातु की अथवा नरसल या बांस की
बनानी चाहिये ॥२५॥
अथ गण्डूषकवलप्रतिसारणविधिमाह ।
तत्र गण्डूषविधिमाह-
स्नेहक्षीरकषायादिद्रवैः सम्पूर्णमाननम् । आपूर्य स्थीयते तावद्धिर्गण्डूषधारणे ।। २६ ।।
कफपूर्णास्यता यावच्छेदो दोषस्य वा भवेत् । नेत्रघ्राणस्रुतिर्यावत्तावद्गण्डूषधारणम् ।। २७ ।।
गण्डूषान् सुस्थितः कुर्यात्स्विन्नभालगलादिकः । मनुष्यस्त्रींस्तथा पञ्च सप्त वाऽऽदोषनाशनात् ।। २८ ।।
गण्डूष की विधि-स्नेह (घृतादि), दूध, क्वाथ आदि द्रव पदार्थों से मुख को पूर्ण रीति से भर कर जब तक रखने
की विधि हो तब तक रखना यही गण्डूषधारण (कुल्ले करने) की विधि है। गण्डूष (कुल्ला) मुख में धारण करने
का समय-जब तक कफ से मुख न भर जाय या दोष नष्ट न हो जाय अथवा आँख तथा नाक से पानी न झरने लगे
तब तक मुख में गण्डूष धारण करना चाहिये। मनुष्य को चाहिये कि वह स्थिर आसन से बैठ कर जब तक कपाल,
गला, गण्डस्थल तथा गालों पर पसीना न आ जाय अथवा जब तक दोष दूर न हो जाय तब तक ३, ५ अथवा ७ कुल्ले
करे ॥२६-२८॥
❖ गलादिकः=इत्यादिशब्देन गण्डकपोलौ गृह्येते सुश्रुतोक्तत्वात् ।। २६-२८ ।।