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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1087

१०३६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
यहाँ 'मृदौ' पद का 'बृंहणसंज्ञक धूमपान में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१२॥
तीक्ष्णे चतुर्विंशतिभिः कासघ्ने षोडशोन्मितैः ॥१३॥
रेचनसंज्ञक धूमपान में २४ अंगुली की तथा कासनाशक धूमपान में १६ अंगुल की नली की लम्बाई होनी
चाहिये ॥१३॥
❖ तीक्ष्णे=रेचने ॥१३॥
यहाँ 'तीक्ष्णे' पद का 'रेचनसंज्ञक धूमपान में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१३॥
दशाङ्गुलैर्वमनीय तथा स्याद् व्रणनाडिका। कलायमण्डलस्थूला कुलत्थागमरन्ध्रिका ॥१४॥
वमन कराने वाले धूमपान में तथा व्रण को धूपित करने में नली की लम्बाई १० अंगुल की होनी चाहिये और मुटाई
मटर के बराबर तथा उसके छिद्र की चौड़ाई कुलथी जाने लायक होनी चाहिये ॥१४॥
❖ तथा=दशाङ्गुलमिता ॥१४॥
यहाँ 'तथा' पद से '१० अंगुल की' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१४॥
अथ धूमपानविधिमाह-
अथेषिकां प्रलिम्पेच्च सुश्लक्ष्णां द्वादशाङ्गुलम्। धूमद्रव्यस्य कल्केन लेपश्वाष्टाङ्गुलः स्मृतः ॥१५॥
धूमपान की विधि-धूमपान की नली (हुक्का) तैयार कर चुकने के बाद एक अत्यन्त चिकनी शरकण्डे की १२
अंगुल लम्बी सलाई लेकर उसे जिस द्रव्य का धूम पीना हो उसके महीन कल्क (चटनी) से लपेट दे किन्तु इतना ध्यान
अवश्य रहे कि लेप केवल आठ अंगुल तक ही सलाई पर रहे ॥१५॥
❖ इषिकाम्=शरकाण्डम् ॥१५॥
यहाँ 'इषिका' पद से 'सरकण्डे की सलाई' का बोध करना चाहिये ॥१५॥
कल्कं कर्षमितं लिप्त्वा छायाशुष्कञ्च कारयेत्। ईषिकामपनीयाथ स्नेहाक्तां वर्त्तिमादरात् ॥१६॥
अङ्गारैर्दीपितां कृत्वा धृत्वा नेत्रस्य रन्ध्रके। वदनेन पिबेद् धूमं वदनेनैव संत्यजेत् ॥१७॥
नासिकाभ्यां ततः पीत्वा मुखेनैव वमेत्सुधीः। शरावसम्पुटे क्षिप्त्वा कल्कमङ्गारदीपितम् ॥
छिद्रे नेत्रं निवेश्याथ व्रणं तेनैव धूपयेत् ॥१८॥
एक तोला मात्र कल्क का सलाई के ऊपर लेप करके उसे छाया में सुखावे, जब सूख जाय तब सावधानी से सलाई
को सूखे कल्क से अलग कर उक्त-सूखे कल्क की बत्ती को घृत से तर करके उसके एक सिरे पर आग लगा कर दूसरे
सिरे को धूमपान की नली के छिद्र के अन्दर रख दे तत्पश्चात् बुद्धिमान् को चाहिये कि मुख से पीये और मुख से ही धूम
बाहर निकाले। यदि किसी व्रण को धूम देना हो तो उसकी ओषधि के उक्त रीति से बने कल्प को घृतयुक्त करके तत्पश्चात्
उसमें आग लगा कर उसे एक शराव (कसोरा) के सम्पुट के अन्दर रख कर ऊपर के कसोरे में एक छिद्र कर दे और
उस छिद्र के अन्दर धूम लेने की नली को घुसा कर रख दे, उसके बाद नली के द्वारा निकले हुए धूम से व्रण को धूमित
करे ॥१६-१८॥
अथ धूमपानौषधिकल्कमाह-
एलादिकल्कं शमने स्निग्ध सर्जरसं मृदौ ॥१९॥
रेचने तीक्ष्णकल्कञ्च श्वासघ्ने क्षुद्रकोषणम्। वामने स्नायुचर्माद्यं दद्याद् धूमस्य पानकम् ॥२०॥
व्रणे निम्बवचाद्यञ्च धूपनं संप्रशस्यते। अन्येऽपि धूमा गेहेषु कर्त्तव्या रोगशान्तये ॥२१॥