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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 489

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मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २२६


दुश्मन" कहा है और उनसे बचते रहने के उपाय दर्शाए हैं। किन्तु
क्लाइव जितना स्वार्थी था उतना ही चतुर और बना हुआ भी था।
उसके कई पत्रों से साबित है कि ज़रूरत पड़ने पर वह न्यायप्रेमी
और सदाचारी का बाहरी वेष बना लेना भी जानता था। इसके
अलावा इस समय अंगरेज़ों का व्यक्तिगत लोभ इतना बढ़ गया
था कि यदि उसे परिमित न किया जाता तो कम्पनी ही का चारों
ओर से दिवाला निकल जाने का डर था। यही क्लाइव के इस लम्बे
पत्र के लिखे जाने का सबब था।
तिजारती माल पर महसूल वसूल करने का अधिकार अब
कम्पनी को मिल चुका था। किन्तु कम्पनी के
[हाशिया: नमक पर] मुलाज़िमों के व्यापार सम्बन्धी अन्यायों को
[हाशिया: महसूल] रोकने के बजाय क्लाइव ने इस बार नमक जैसे
पदार्थ की तिजारत का ठेका, जो कि हर मनुष्य के जीवन के लिए
आवश्यक है, कम्पनी के मुलाज़िमों को दे दिया और उस पर
कम्पनी की ओर से ३५ फ़ीसदी महसूल लगा दिया, जिससे प्रजा
के लिए यह अन्याय और भी कष्ट कर हो गया। ऐसे ही पान,
तम्बाकू और इसी तरह की और अनेक चीज़ों की तमाम तिजारत
बंगाल भर में अंगरेज़ों और उनके आदमियों के हाथों में दे दी
गई। क्लाइव की यह खुली नीति थी कि नमक जैसी ज़रूरी चीज़
पर महसूल ज़्यादा और पान तम्बाकू जैसो ग़ैर ज़रूरी चीज़ों
पर महसूल कम रहे और तमाम महसूल लेने वाली अंगरेज़
कम्पनी रहे।