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सर्वकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 539

दृष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५२१

मनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायाम्' ( तै० २।६ ) इति कांचिदेवैकां गुहामधिकृत्यै-
तदुक्तम् । न च ब्रह्मणोऽन्यो गुहायां निहितोऽस्ति, 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्'
( तै० २।६ ) इति स्रष्टुरेव प्रवेशश्रवणात् । ये तु निर्बन्धं कुर्वन्ति ते वेदान्तार्थं बाध-
मानाः श्रेयोद्वारं सम्यग्दर्शनमेव बाधन्ते । कृतकमनित्यं च मोक्षं कल्पयन्ति । न्यायेन
च न संगच्छन्त इति ॥ २२ ॥


भामती

कृपाणादयो गुहा एवं ब्रह्मणोऽपि प्रतिजीवं भिन्ना अविद्या गुहा इति । यथा प्रतिबिम्बेषु भासमानेषु बिम्बं
तदभिन्नमपि गुह्यमेवं जीवेषु भासमानेषु तदभिन्नमपि ब्रह्म गुह्यम् । अस्तु तर्हि ब्रह्मणोऽन्यद् गुह्यमित्यत
आह ॐ न च ब्रह्मणोऽन्यः इति ॐ । ये त्वाश्मरथ्यप्रभृतयः ॐ निर्बन्धं कुर्वन्ति ते वेदान्तार्थम् इति ॐ ।
ब्रह्मणः सर्वात्मना भागशो वा परिणामाभ्युपगमे तस्य कार्यत्वादनित्यत्वाच्च तदाश्रितो मोक्षोऽपि तथा
स्यात् । यदि त्वेवमपि मोक्षं नित्यमकृतकं ब्रूयुस्तत्राह ॐ न्यायेन इति ॐ । एवं ये नदीसमुद्रनिदर्शनेना-
मुक्तेर्भेदं मुक्तस्य चाभेदं जीवस्यातिष्ठन्त, तेषामपि न्यायेनासङ्गतिः, न जातु घटः पटो भवति । ननूक्तं
यथा नदी समुद्रो भवतीति । का पुनर्नद्यभिषताऽभ्युपगतः । किं पाथःपरमाणव उतेषां संस्थानभेद, आहो-
स्वित्तदारब्धोऽवयवी ? तत्र संस्थानभेदस्य वाऽवयविनो वा समुद्रनिवेशे विनाशात्, कस्य समुद्रेणैकता ?
नदीपाथःपरमाणूनान्तु समुद्रपाथःपरमाणुभ्यः पूर्वावस्थितेभ्यो भेद एव नाभेदः, एवं समुद्रादपि तेषां भेद एव ।

भामती-व्याख्या

पदार्थों के स्फुटरूप में अवभासित होने पर बिम्बवस्तु प्रतिबिम्ब से अभिन्न होकर भी गुह्य
[ गुहा में अवस्थित अस्फुटरूप से प्रतीयमान ] होती है, वैसे ही जीवों के स्फुटरूप में अनुभूत
होने पर ब्रह्म जीवाभिन्न होकर भी गुह्य है । ब्रह्म से भिन्न अन्य किसी पदार्थ को गुह्य क्यों
नहीं माना जाता ? इस प्रश्न का उत्तर है— "न च ब्रह्मणोऽन्यो गुहायां निहितोऽस्ति" ।

"ये तु"—यहाँ 'ये' पद से आश्मरथ्यादि भेदवादी आचार्यों का ग्रहण किया गया है।
"निर्बन्धं कुर्वन्ति" का अर्थ है आग्रहं कुर्वन्ति । अर्थात् जो भेदवादी आचार्य समग्र या
आंशिकरूप से जीव को ब्रह्म का परिणाम मानते हैं, उन्हें यह भी मानना पड़ेगा कि कार्य
( जन्य ) और अनित्यभूत जीव के आश्रित मोक्ष पदार्थ भी वैसा ( अनित्य ) ही है। यदि
अनित्यभूत जीव के आश्रित मोक्ष तत्त्व को नित्य और अकृतक माना जाता है, तब "न्यायेन
च न सङ्गच्छन्ते"
। इसी प्रकार जो ओडुलोम्यादि आचार्यगण नदी-समुद्र-दृष्टान्त के आधार
पर मुक्ति से पूर्व जीव और ब्रह्म का भेद एवं मुक्तावस्था में अभेद मानते हैं, उनका मत भी
न्याय-संगत नहीं, क्योंकि जो पदार्थ वस्तुतः भिन्न है, वह कभी अभिन्न नहीं हो सकता, जैसे
अपटरूप घट कभी पटरूप नहीं होता । आचार्य औडलोमि की ओर से जो कहा गया कि
जैसे नदी भिन्न है और समुद्र भिन्न, फिर भी नदी समुद्ररूप हो जाती है, वैसे ही जीव
ब्रह्मरूप हो जाता है । वहाँ जिज्ञासा होती है कि 'नदी' पद से आप क्या समझते हैं ? क्या
(१) जल के परमाणु ? या जलीय परमाणुओं का विशेष संस्थान ( आकार ) ? अथवा जलीय
परमाणुओं से आरब्ध ( जनित ) अवयवी द्रव्य ? इनमें संस्थान या अवयवी द्रव्य तो समुद्र
में प्रवेश करने पर नष्ट ही हो जाते हैं, वे शेष ही नहीं रहते, समुद्र से एकता किस की कही
जाय ? नदी के जलीय परमाणु तो समुद्र के जलीय परमाणुओं से सदैव भिन्न ही रहते हैं,
कभी अभिन्न नहीं होते । समुद्ररूप अवयवी से भी उनका भेद ही रहता है ।

कुछ लोगों ( भास्कराचार्यादि ) ने काशकृत्स्नीय मत मान कर जीव को परमात्मा
का अंश कहा है