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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

सिद्धार्थंत्वविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२१

भामती

प्रमाणत्वं सिध्यतीति प्रामाण्याय वेदान्तानां कार्यपरत्वमातिष्ठामहे ।

अत्र ब्रूमः—किं पुनरिदं कार्यमभिमतमायुष्मतः यदशक्यं पुरुषेण ज्ञातुम् ? अपूर्वमिति चेत् , हन्त कुतस्त्यमस्य लिङाद्यर्थत्वं, तेनालौकिकेन सङ्गतिसंवेदनविरहात् ? लोकानुसारतः क्रियाया एव लौकिक्याः कार्याया लिङादेरवगमात् । स्वर्गकामो यजेतेति साध्यस्वर्गविशिष्टो नियोज्योऽवगम्यते, स च तदेव कार्यमवगच्छति यत् स्वर्गानुकूलं, न च क्रिया क्षणभङ्गुराऽऽमुष्मिकाय स्वर्गाय कल्पत इति परिशेषाद्भवत एवापूर्वं कार्ये लिङादीनां सम्बन्धग्रह इति चेत् , हन्त चैत्यवन्दनादिवाक्येष्वपि स्वर्गकामादिवदसम्बन्धादपूर्वकार्यत्वप्रसङ्गस्तथा च तेषामप्यशक्यरचनत्वेनापौरुषेयत्वापातः। स्वप्नदृष्टेन पौरुषेयत्वेन वा तेषामपूर्वार्थत्वप्रतिषेधे वाक्यत्वादिनो लिङ्गेन वेदानामपि पौरुषेयत्वमनुमितमित्यपूर्वार्थता न स्यात् । अन्यतस्तु वाक्यत्वादिनानुमानाभासत्वोपपादने कृतमपूर्वार्थत्वेनात्र तदुपपादनेन ? उपपादितं चापौरुषेयत्वमस्माभिर्न्यायकणिकायाम् , इह तु विस्तरभयान्नोक्तम् । तेनापौरुषेयत्वेऽसिद्धे भूतार्थानामपि

भामती-व्याख्या

होता है और न अतत्त्वेन ( अन्यरूपारोपेण ) । कार्यार्थक वेदान्त-वाक्यों की रचना पुरुष के द्वारा नहीं हो सकती, अपौरुषेयत्व होने के कारण अनपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य सिद्ध हो जाता है, अतः एव वेदान्त-वाक्यों को हम कार्यपरक मानते हैं ।

समाधान—वह कार्य पदार्थ क्या है, जिसे पुरुष जान नहीं सकता ? यदि प्रभाकर-सम्मत अपूर्व ( अदृष्ट ) को कार्य कहा जाता है, तब वह लिङादि विधि प्रत्ययों का वाच्य नहीं हो सकता, क्योंकि लोक में अप्रसिद्ध अर्थ के साथ किसी भी शब्द का शक्ति-ग्रह नहीं होता । लोक में तो लिङादि शब्दों के द्वारा लौकिक क्रिया का ही अभिधान होता है ।

शङ्का—"स्वर्गकामो यजेत" इस वाक्य से स्वर्गादिरूप साध्य की कामना से विशिष्ट नियोज्य ( अधिकारी ) प्रतीत होता है, वह उसी पदार्थ को अपना कार्य ( कृति-साध्य ) समझता है, जो स्वर्ग का उत्पादन कर सके । यागादि क्रिया तो क्षण-भङ्गुर है, जन्मान्तर में होनेवाले स्वर्गादि फलों का उत्पादन नहीं कर सकती, परिशेषतः स्वर्गकामपद-समभिव्याहार-संज्ञक तर्क से सहकृत वैदिक वाक्यों के द्वारा ही अलौकिक कार्य के साथ लिङादि का संगति-ग्रह हो जाता है, जैसा कि शालिकनाथ मिश्र कहते हैं—

तस्मान्नियोज्यसम्बन्धसमर्थं विधिवाचिभिः ।
कार्यं कालान्तरास्थायि क्रियातो भिन्नमुच्यते ॥
तस्माल्लोकानुसारेण व्युत्पत्तिः कार्यमात्रके ।
तस्य त्वपूर्वरूपत्वं वेदवाक्यानुसारतः ॥ ( प्र. पं. पृ. ४२६,४८ )

समाधान—यदि 'स्वर्गकाम' पद से समभिव्याहृत लिङादि अपूर्व कार्य का बोध करा देते हैं, तब "चैत्यमभिवन्देत स्वर्गकामः"—इत्यादि वाक्यों में भी स्वर्गकाम पद-समभिव्याहृत लिङादि से अपूर्व कार्य का बोध होना चाहिए । यदि वैसा वहाँ भी मान लिया जाता है, तब ऐसे बौद्ध वाक्यों की भी रचना किसी पुरुष के द्वारा सम्भव नहीं, अतः इन वाक्यों को भी वेदों के समान ही अपौरुषेय मानना होगा । यदि स्वप्नादि में अपूर्वार्थक वाक्यों की पौरुषेयता देखकर बौद्ध वाक्यों में पौरुषेयत्व सिद्ध किया जाता है, तब वैदिक वाक्यों में भी वाक्यत्वादि लिङ्गों के द्वारा पौरुषेयत्व का अनुमान हो जाने पर उनकी भी अपूर्वार्थकता समाप्त हो जाती है । यदि 'वेदः पौरुषेयः, वाक्यत्वात्, कालिदासादिवाक्यवत्'—इस अनुमान में स्मर्यमाणकर्तृकत्वरूप उपाधि का उद्भावन कर अनुमानाभासता सिद्ध की जाती है, तब वेदान्त-वाक्यों में अस्मर्यमाणकर्तृकत्व होने के कारण ही अनपेक्षत्व और प्रामाण्य सिद्ध हो जाता है, अतः


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