सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा

DevanagariHindipublished140 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 140 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 37

ईश्वर का स्वरूप २१

संशय आने पर पूर्वपक्ष उपस्थित होता है कि उनका ऐश्वर्य असीम है, क्योंकि शास्त्रों का कथन है, 'उन्हें स्वराज्य प्राप्त हो जाता है,' 'सब देवता उनकी पूजा करते हैं,' 'सारे लोकों में उनकी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।' इसके उत्तर में व्यास कहते हैं, 'हाँ, जगत् की सृष्टि आदि की शक्ति को छोड़कर।' मुक्तात्मा को सृष्टि, स्थिति और प्रलय की शक्ति के अतिरिक्त अन्य सब अणिमादि शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। रहा जगत् का नियन्तृत्व, वह तो केवल नित्यसिद्ध ईश्वर का होता है। कारण कि शास्त्रों में जहाँ-जहाँ पर सृष्टि आदि की बात आई है, उन सभी स्थानों में ईश्वर की ही बात कही गई है। वहाँ पर मुक्तात्माओं का कोई प्रसंग नहीं है। जगत् के परिचालन में केवल उन्हीं परमेश्वर का हाथ है। सृष्टि आदि सम्बन्धी सारे श्लोक उन्हीं का निर्देश करते हैं। फिर 'नित्यसिद्ध' विशेषण भी दिया गया है। शास्त्र यह भी कहते हैं कि अन्य जनों की अणिमादि शक्तियाँ ईश्वर की उपासना तथा ईश्वर के अन्वेषण से ही प्राप्त होती हैं। ये शक्तियाँ असीम नहीं हैं। अतएव, जगन्नियन्तृत्व में उन लोगों का कोई स्थान नहीं। फिर, वे अपने मन का पृथक् अस्तित्व बनाए रखते हैं, इसलिए यह सम्भव है कि उनकी इच्छाएँ अलग-अलग हों। हो सकता है कि एक सृष्टि की इच्छा करे, तो दूसरा विनाश की। यह द्वन्द्व दूर करने का एकमात्र उपाय यही है कि वे सब इच्छाएँ अन्य किसी एक इच्छा के अधीन कर दी जायँ। अतः सिद्धान्त यह निकला कि मुक्तात्माओं की इच्छाएँ परमेश्वर की इच्छा के अधीन हैं।''†


† ये सगुणब्रह्मोपासनात् सह एव मनसा ईश्वरसायुज्यं व्रजन्ति, किम् तेषाम् निरवग्रहम् ऐश्वर्यम् भवति, आहोस्वित् सावग्रहम् इति संशयः ।