भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीवृन्दावनमें वर्षा और शरद् ५५
वर्षा में वृक्ष पादोंसे जल पानकर नाना रूपवाले
शाखा, पल्लव, पुष्प, फल आदिसे समन्वित हो उठे,
जैसे पहले तपस्यासे दुर्बल तपस्वी कामोंके सेवनसे
अनेक रूप देहवाले हो जाते हैं, पंककण्टकादियुक्त
अशान्त सरोवरोंपर भी सारस, चक्रवाकादि टिके हुए हैं।
जैसे अशान्त, उल्बण कर्मवाले गृहोंमें भी
वैषयिक सुख-लेशकी आशासे कुटुम्बी लोग टिके
रहते हैं। पर्जन्यकी वर्षामें जलौघोंसे सेतु छिन्न-भिन्न
वैसे ही हो जाते हैं, जैसे कलियुगमें पाखण्डियोंके
असद्वादोंसे वेदमार्ग, वर्णाश्रम-धर्म छिन्न-भिन्न हो
जाते हैं। वायुकी प्रेरणासे मेघ प्राणियोंके लिये
अमृतमय जल देते हैं, जैसे ब्राह्मणोंकी प्रेरणासे राजा
लोग अर्थियोंको अभीष्ट अर्थ प्रदान करते हैं।
पुनः शरद्के प्रभावसे कमलोंकी उत्पत्तिसे
जल स्वच्छ, प्रकृतिस्थ हो गया, जैसे भ्रष्ट लोगोंका
चित्त योगसेवासे पुनः स्वस्थ, शान्त हो जाता है।
शरद्-ऋतुने आकाश, भूत, पृथ्वी और जलके बादल,
शवलता (सांकर्य), पंक और मलिनताको हर लिया,
जैसे कृष्णकी भक्ति चारों आश्रमियोंके अशुभोंको हर
लेती है। मेघ अपने सर्वस्वभूत जलको छोड़कर शुभ्र
तेजयुक्त होकर शोभित होते हैं, जैसे सर्वैषणाओंसे
विनिर्मुक्त होकर मुक्तकिल्विष मुनि शान्त होते हैं—
सर्वस्वं जलदा हित्वा विरेजुः शुभ्रवर्चसः ।
यथा त्यक्तैषणाः शान्ता मुनयो मुक्तकिल्बिषाः ॥
(श्रीमद्भा० १०।२०।३५)
पर्वत कहीं निर्मल जल दे रहे हैं, कहीं नहीं,
जैसे—ज्ञानी लोग यथावसर ज्ञानामृत देते हैं अथवा
नहीं देते—
गिरयो मुमुचुस्तोयं क्वचिन्न मुमुचुः शिवम्।
यथा ज्ञानामृतं काले ज्ञानिनो ददते न वा॥
(श्रीमद्भा० १०।२०।३६)
गाध (छिछले) जलमें रहनेवाले मीनादि क्षीयमाण
(सूखते हुए) जलको नहीं जानते, जैसे कुटुम्बी
प्रतिदिन क्षीण होती हुई आयुको नहीं जानता। थोड़े
जलके मीन शरद्के सूर्यतापसे तप्त होने लगे, जैसे
दरिद्र, कृपण, अजितेन्द्रिय कुटुम्बी क्षुधादि (भूख
आदि) प्रयुक्त तापोंसे तप्त होता है। स्थल शनैः-शनैः
पंकको और वीरुध (वृक्षादि) अपक्वताको छोड़ने
लगे, जैसे धीर पुरुष शरीरादि अनात्माओंमें शनैः-
शनैः अहंता और ममताको छोड़ता है। शरद्के
आगमनमें समुद्रका जल निश्चल हो गया, जैसे मनके
उपरत हो जानेपर मुनि आगमोंके अभ्याससे उपरत
होकर तूष्णी (चुप) हो जाता है।
कृषक लोगोंने दृढ़ सेतुओंद्वारा जलको खेतोंमें
रोक लिया, जैसे इन्द्रियोंका निरोध करके मुनिलोग
उनके द्वारा बहते ज्ञानको रोकते हैं। रात्रिमें उदित
होकर चन्द्रमा भूतोंके अर्कतापोंको हर लेते हैं, जैसे
बोध (ज्ञान) प्राणियोंके देहाभिमानको हर लेता है।
किंवा जैसे मुकुन्द व्रजयोषितोंके तापोंको हर लेते हैं।
शरद्के विमल तारकोंसे युक्त निर्मेघ आकाश शोभित
होने लगा, जैसे शब्दब्रह्मके अर्थको प्रकाश करनेवाला
सत्त्वयुक्त चित्त शोभित होता है। व्योम (आकाश)-
में उडुगणोंके साथ चन्द्रमा अखण्ड मण्डल होकर
शोभित होता है, जैसे वृष्णिचक्रों (यादवमण्डल)-
से आवृत यदुपति कृष्ण शोभित होते हैं। समशीतोष्ण
प्रसून-वन-मारुतका आश्लेष करके सब लोगोंने ताप
छोड़ दिया, परंतु कृष्णहतचेता व्रजांगनाएँ तप्त ही
रहीं। गौ, खग, मृग, नारी शरद्के सम्बन्धसे पुष्पिणी
होकर अपने वृषों (पतियों)-से अन्वीयमान हुईं, जैसे
ईशकी सभी क्रियाएँ फलसे युक्त होती हैं। सूर्योत्थानमें
कुमुदको छोड़कर सभी कमल खिल उठे, जैसे योग्य
राजासे दस्युको छोड़कर सभी लोग निर्भय होते हैं।
वणिक्, मुनि, नृप, स्नातक सभी वर्षासे रुके थे, शरद्
आनेपर वे अपने-अपने अर्थोंको प्राप्त होते हैं, जैसे
सिद्ध (मुक्तिको प्राप्त जीव) प्रलयकालके अनन्तर
सृष्टिके समय अपने पूर्वार्जित कर्मानुसार शरीरोंको
प्राप्त होते हैं—
वणिङ्मुनिनृपस्नाता निर्गम्यार्थान् प्रपेदिरे।
वर्षरुद्धा यथा सिद्धाः स्वपिण्डान् काल आगते॥
(श्रीमद्भा० १०।२०।४९)