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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 778 में से

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पृष्ठ 64

सूर्यने आठ महीने अपनी तिग्म रश्मियोंके द्वारा
भूमिसे खींचे हुए जलको यथोचित समयपर छोड़ना
(देना) आरम्भ किया, जैसे राजा प्रजासे कर लेकर
यथासमय उसे पुनः प्रदान करता है। जैसे कृपालु लोग
तप्त प्राणियोंको देखकर दयार्द्र हो उनके रक्षण, आप्यायनके
लिये अपने जीवनतकका उत्सर्ग कर देते हैं, वैसे ही
दामिनीयुक्त बड़े-बड़े मेघ अपने तड़िद्रूप नेत्रोंसे विश्वको
तप्त देखकर वायुरूप दयासे कम्पित होकर विश्वका
आप्यायन करनेके लिये जीवन (उदक) बरसने लगे।
ग्रीष्मसे तप्त और कृशा, दुर्बला पृथ्वी पर्जन्यकी
वर्षासे पुष्ट हो उठी, जैसे कामनासे तपस्या करनेवाले
तपस्वीका शरीर काम-प्राप्तिसे पुष्ट हो जाता है।
सायंकालमें अन्धकारके कारण खद्योतों (जुगनुओं)-
का प्रकाश होने लगा, परंतु चन्द्र, शुक्र आदि ग्रहोंका
प्रकाश नहीं, जैसे कलियुगमें पापके कारण पाखण्डों
(वेदविरुद्ध आगमों)-का विस्तार होता है, वेदोंका
नहीं। बादलोंके निनादको सुनकर प्रथम प्रसुप्त मण्डूकोंने
बोलना आरम्भ कर दिया, जैसे नित्य ध्यान, जपादि
नियमके पश्चात् आचार्यके निनादको सुनकर शिष्य
लोग वेदाध्ययन करने लगते हैं। क्षुद्र नदियाँ कभी
बढ़नेपर उत्पथगामिनी होती हैं या शुष्क हो जाती हैं,
सत्पथगामिनी नहीं होतीं, जैसे इन्द्रिय परतन्त्र या निरंकुश
प्राणीकी देह, द्रव्य-सम्पत्तियाँ या तो उच्छृंखल
अपात्रगामिनी होती हैं अथवा नष्ट हो जाती हैं। भूमि
बालतृणोंसे हरित, इन्द्रगोपों (लालरंगके कीटविशेषों)-
से रक्त और शिलीन्ध्रों (छत्राकों)-की छायासे पीत
वर्णकी होकर ऐसी लगती है, जैसे राजाकी सेना-
सम्पत्ति सुशोभित होती है। वृष्टिके लगातार होनेपर
क्षेत्र सस्य-सम्पत्तिसे युक्त होकर 'सब कुछ देवाधीन
है' ऐसा न जाननेवाले धनिक कृषकोंको सुख देते हैं,
वृष्टि-विच्छेद होनेपर सूखते हुए अनुताप पहुँचाते हैं।
नव जलके निषेवणसे जल-स्थलके सभी जीवोंने रुचिर
रूप धारण कर लिया, जैसे परमधर्ममय, सुखमय श्रीहरिकी
सेवासे सभी सद्यः परम रुचिर हो जाते हैं। सरिताओंसे
संगत होकर वातसे उद्भूत तरंगोंद्वारा सिन्धु क्षुब्ध हो
उठा, जैसे कामवासनासे युक्त अपक्व योगीका चित्त
विषयोंके योगसे चंचल हो उठता है। वर्षाकी धाराओंसे
हन्यमान होते हुए भी पर्वत, नदी विचलित नहीं होते,
जैसे भगवद्भक्त भगवान्‌के ध्यानमें तल्लीन चित्तवाले
होनेके कारण विविध व्यसनों (दुःखों)-से अभिभूत
होनेपर भी चलायमान नहीं होते।
तृणोंसे आच्छन्न और असंस्कृत होनेसे मार्ग
सन्दिग्ध हो उठे, जैसे ब्राह्मणोंद्वारा अभ्यास न किये
जानेसे कलिकालके प्रभावसे श्रुतियाँ हत-सी हो
जाती हैं। वर्षामें पथिकोंके गमनागमन बन्द हो जाने
और तृणोंसे आच्छन्न होनेसे मार्गोंमें सन्देह होने
लगता है, जैसे ब्राह्मणोंके पुनः-पुनः आवर्तन (अभ्यास)
न करनेसे कुछ कालमें श्रुतियाँ विस्मृत हो जाती हैं।
सर्व प्राणियोंको जीवनभूत जल प्रदान करनेवाले
महोपकारक लोकबन्धु मेघोंमें विद्युतोंका सौन्दर्य
स्थिर नहीं है, जैसे गुणवान् पुरुषोंमें भी कामिनी स्थिर
प्रीति नहीं कर सकती। निर्गुण (रूपगुणसे रहित)
इन्द्रधनुष गुणवान् (गर्जन शब्दरूप गुणसम्पन्न)
आकाशमें शोभित होता है, जैसे गुणमिश्रणमय व्यक्त
प्रपंचमें निर्गुण पुरुष शोभित होता है। अपनी ज्योत्स्ना
(चन्द्रिका)-से ही प्रकाशित बादलोंद्वारा आच्छन्न
होकर चन्द्रमा पार्थक्यसे स्पष्ट प्रतीत नहीं होता, जैसे
आत्माकी ज्योतिसे ही भासित (प्रकाशित) 'अहं
विद्वान्', 'अहं दाता', 'अहं शूरः' इत्यादि अहं
मतिसे आच्छन्न पुरुष सर्वपृथक् रूपसे स्पष्ट नहीं
प्रकाशित होता-
न रराजोडुपश्छन्नः स्वज्योत्स्नाराजितैर्घनैः।
अहंमत्या भासितया स्वभासा पुरुषो यथा॥
(श्रीमद्भा० १०।२०।१९)
मेघके आगमोत्सवमें मयूर प्रसन्न हो उठे, जैसे
गृहमें तप्त, विरक्तचित्त पुरुष अच्युत भक्तके आगमनमें
प्रसन्न हो उठते हैं-
मेघागमोत्सवा हृष्टाः प्रत्यनन्दञ्छिखण्डिनः।
गृहेषु तप्ता निर्विण्णा यथाच्युतजनागमे॥
(श्रीमद्भा० १०।२०।२०)