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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 555, कुल 778 में से

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पृष्ठ 555

माँके श्रीचरणोंमें ५४५
असंख्य ब्रह्माण्ड उसी ब्रह्माम्बुधिके नगण्य बुद्बुद हैं।
जाग्रदादि जगत्-प्रत्ययोंका अभाव होनेसे सर्वप्रत्ययोंका
भासक नित्य विज्ञानरूप प्रत्यय स्फुटरूपसे व्यक्त
होता है अर्थात् जागतिक विविध वृत्तियोंके रुद्ध
होनेपर ही निर्वृत्तिक चित्तपर नित्य अखण्डबोधरूप
ब्रह्मकी अभिव्यक्ति होती है।
वह 'नास्ति' बुद्धिका गोचर नहीं है, अतः
असत् नहीं है। 'अस्ति' बुद्धिका गोचर नहीं है, अतः
सत् भी नहीं, फिर भी त्रिकालाबाध्य सत्स्वरूप है।
स्थूल-सूक्ष्म, कार्य-कारण, मूर्त-अमूर्तसे विलक्षण
होनेसे भी उसे सत् एवं असत्से भिन्न जैसे क्षुधातुर
प्राणी स्वप्नमें भोजन करके तृप्तिका अनुभव करता
है, स्वप्नमें स्वमरणका अनुभव करता है, वही अनन्त
आत्मसत्ता, जो स्वयं किसीसे भी आवृत नहीं हो
सकती, परंतु सम्पूर्ण दृश्य उसीसे आवृत है, वैसे ही
द्रष्टाके बिना दृश्यसिद्धि नहीं होती और दृश्यके बिना
द्रष्टा भी सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि अखण्ड
बोधके दृश्य-सम्पर्कसे ही द्रष्टृत्वका व्यवहार होता
है। द्रष्टा चिद्रूप होनेसे दृश्यनिर्माणमें अवश्य समर्थ
है। किंतु दृश्य स्वयं जड़ है, अतः वह समर्थ नहीं
है। चित् ही असत् अर्थका निर्माण करता है, बोध
होते ही दृश्य गलित हो जाता है। बोधके द्वारा विद्वान्
प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय—सभीको वैसे ही निगल जाता
है, जैसे सुवर्णमें कटक-कुण्डलादि विलीन हो जाते
हैं, जैसे जलसे भिन्न द्रवता नहीं है, जैसे काष्ठमें
काष्ठपुत्रिकाएँ एवं बीजमें अंकुर, नाल, स्कन्ध,
शाखा, उपशाखा, काष्ठ एवं बीजसे अभिन्न ही होते
हैं, वैसे ही चिन्मात्र, बोधस्वरूप ब्रह्मात्मामें ही
चैत्य-दृश्य-प्रपंच उद्भूत होता है। परंतु वह भी
चिन्मात्र ही है। फल एवं बीजकी एक ही सत्ता है।
जल एवं तरंगमें, चिति-चैत्यमें वस्तुतः कोई भी भेद
नहीं है। अविचारसे ही भेद प्रतीत होता है। अविचारसे
भ्रान्ति जैसे आती है, विचारसे वैसे ही चली जाती
है। ब्रह्मसे उत्पन्न सब प्रपंच ब्रह्म ही है। अविवेकसे
ही भेदवाद खड़ा होता है। विवेक होते ही वह
विलीन हो जाता है।
अखण्डबोधसे संसारकी नश्वरताका भान
सर्वाधिष्ठान अखण्ड बोधका परिचय होते ही
संसार-कल्पना प्रशान्त हो जाती है। मनके मननसे ही
प्रपंचका निर्माण होता है। सर्वत्यागपूर्वक शान्त होकर
तत्त्ववित् स्वात्मामें ही विराजता है। रागादिदूषित चित्त
ही भीषण संसार है। रागादिरहित चित्त भगवदुन्मुख
कहा जाता है। चराचर प्रपंच उसी ब्रह्मकी लीला है।
कोटि-कोटि यत्नोंसे ही उसकी प्राप्ति होती है, परंतु
प्राप्त होनेपर प्रतीति होती है कि कोई नवीन वस्तु नहीं
है, किंतु नित्यप्राप्त स्वात्मा ही ब्रह्म है। जैसे संकल्प-
पर्वत संकल्पके क्षीण होते ही क्षीण हो जाता है, वैसे
ही उसका प्रबोध होते ही मेरु आदि भी विलीन हो
जाते हैं। अणु होनेपर भी वह आकाशमें भी नहीं
समाता; क्योंकि वह अनादि एवं सर्वव्यापी है। शुद्ध
चिन्मात्र ब्रह्मद्वारा ही मेर्वादि सब प्रपंच परिवेष्टित हैं।
अतएव वह अणुसे अणीयान् एवं महान्से भी
महीयान् है। यदि सूर्यादिजगत् स्वप्रकाश चेतनसे
स्पष्ट न हो, तो सूर्यादिप्रकाशका क्या रूप हो सकता
है? जड़त्वेन रूपेण (जड़रूपसे) तमसे भिन्न होकर
वह्नि, अर्क आदि तेज भिन्न नहीं है। शुक्लता और
कृष्णताका भी भेद है। दोनों ही जड़ हैं, दोनोंकी ही
उपलब्धिके लिये स्वप्रकाश चित् अपेक्षित है। उदयास्त-
वर्जित वही चिदादित्य दिन-रात प्रकाशमान रहता है।
तम एवं प्रकाश दोनों ही उसी चित्से प्रकाशित होते
हैं। इसी तरह आन्तरिक अज्ञान एवं ज्ञानरूप तमःप्रकाश
उसी अखण्ड भानमें प्रतिभासित होते हैं। तम एवं
प्रकाशको सत्तास्फूर्ति देकर वही प्रकाशित करता है।
जैसे सूर्य ही दिन-रातका निमित्त होता है, वैसे ही
तमःप्रकाशकी व्यंजना उसीसे होती है। उस स्वप्रकाश
चित्के अन्तर्गत अनन्तवृत्तिरूप अनुभव होते हैं। जैसे
जलमें सभी रस निहित होते हैं, वैसे ही सभी अनुभव
उसी स्वप्रकाश चित्के अन्तर्गत हैं।