भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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त्याग एवं बोध होनेसे ही दृढ़ बोध होता है—
यत्राभिलाषस्तन्नूनं सन्त्यज्य स्थीयते यदि।
प्राप्त एवाङ्ग तन्मोक्षः किमेतावतिदुष्करम्॥
जैसे स्फटिकके भीतर घनताके आवेदनसे ही
वृक्ष, नगरादिकी प्रतीति होती है, वैसे ही अखण्ड
भानरूपी ब्रह्ममें घनताके आवेदनसे ही प्रपंच प्रतीत
होता है। जैसे जहाँ भूमिका खनन होता है, वहीं
आकाश प्रकट होता है, वैसे ही जिस सम्बन्धमें ही
विचार किया जायगा, वही वस्तु स्वरूपसे बाधित
होनेपर अखण्डबोधस्वरूप ही अवशिष्ट रहता है।
‘योगवासिष्ठ’ में मन, इन्द्रिय आदिसे अगम्य होनेके
कारण उसी परतत्त्वको अणु कहा जाता है।
आकाशादि सूक्ष्मातिसूक्ष्म पदार्थोंका भी वही परम
कारण है, अतः निरतिशय सूक्ष्म है। जैसे सूक्ष्म
वटबीजके भीतर महावृक्षकी सत्ता होती है, वैसे ही
परमसूक्ष्म, स्वप्रकाश, व्यापक चित्स्वरूप आत्मामें
सत्-असत्, स्थूल-सूक्ष्म सब प्रपंच स्थित होता है।
सम्पूर्ण दृश्यप्रपंच शून्य होनेसे वही आकाश
कहा जाता है। परंतु जड़ाकाशसे विलक्षण स्वयं
चिद्घनस्वरूप है, अतः अनाकाश भी वही है।
इन्द्रियातीत होनेसे वह अमल है। चित्तरूपी महाम्बुधिमें
अपरगणित जगतरूपी तरंग प्रतिभासित होते हैं। वह
चित्त भी उसी अखण्ड भानमें भ्रमरूप है। उसी
अनाद्यनन्त परमाकाशमें यह जगच्चित्रके तुल्य अकृत
होता हुआ भी कृत-सा प्रतीत होता है। उसीमें अनन्त
अहन्ता-ममतारूप संसार भासित होता है। चन्द्र,
आदित्य, अग्नि आदि सभी ज्योतियोंका वही परमभासक
है, अतः वही ज्योतिका भी ज्योति कहा जाता है।
चन्द्रादित्यादि बाह्य ज्योतियों तथा नेत्र, श्रोत्र, मन,
बुद्धि आदि आन्तर ज्योतियोंमें वही सत्ता और स्फूर्ति
देनेवाला है। महाज्योति, महा अग्नि वही है। वह
ऐसा अग्नि है कि महाप्रलयके बादलोंके भी बुझाये
नहीं बुझ सकता, क्योंकि आत्मस्वरूप भी अर्थात्
आत्मरूप दीप्तिसे ही तो प्रलयाम्बुदका भी परिज्ञान
होता है। वही नेत्रगम्य न होनेपर भी हृदयरूपी गृहका
प्रकाशदीप है। वही सर्वप्रकाशक एवं अनन्त है।
गाढान्धकार स्थित जो अहं किसीसे भी प्रकाशित नहीं
होता, वह भी इसी सर्वान्तर ब्रह्मात्मज्योतिसे प्रकाशित
होता है। उसी अखण्ड बोधस्वरूपमें प्रमाणाप्रमाण
एवं प्रमेय प्रस्फुरित होते हैं। सभी देश, काल एवं
वस्तुओंका आधार, अधिष्ठान, भासक भी वही है।
सर्वभासक होनेसे वही महान् है। अगम्य, अनिर्भास्य
होनेसे वही अणु भी है। उसीसे प्रस्फुरित संकल्प ही
स्थूल, सूक्ष्म सब प्रपंच है। संकल्पमें ही स्वल्प देश-
कालमें महान् देश-कालकी प्रतीति भी होती है।
स्वप्नमें अतिस्वल्प नाड़ी-प्रदेशमें मेरु, आकाश आदि
प्रतीत होते हैं। स्वप्नमें ही क्षणमात्र कालमें वर्षों, युगों
तथा कल्पोंकी भी प्रतीति होती है। दुःखमें छोटा
काल भी महान् प्रतीत होता है। सुखमें महान् समय
भी छोटा-सा ही प्रतीत होता है। हरिश्चन्द्रको एक
रात्रि ही द्वादश वर्षोंकी प्रतीत हुई। लवण राजाको
कुछ मुहूर्तमें ही सौ वर्षोंका घोर दुःखमय मिथ्या
प्रपंच प्रतीत हुआ। क्षण-कल्प, प्रकाश-अप्रकाश,
दूरत्व-अदूरत्व सभी एक चित्का संकल्पमात्र है।
जैसे जबतक कुण्डलादि भूषणोंमें अभिनिवेश होता
है, तबतक सुवर्ण प्रतीत नहीं होता। सुवर्ण-बुद्धि
स्थिर होनेपर फिर कटकादि-बुद्धि बाधित हो जाती
है। निर्मल दर्पण में प्रतिभासित नगरके तुल्य ही शुद्ध
बोधमें प्रपंच प्रतिभान है। जैसे घोर तापमयी मरु-
मरीचिकामें अनन्त जलराशिकी कल्पना होती है, वैसे
ही परम शीतल, शान्त, स्वच्छ, अखण्ड संवित्में
भीषण भवाम्भोधि कल्पित है। जैसे स्वप्नों, गन्धर्वों
एवं संकल्पोंके मायामय मिथ्या नगरोंमें कुड्यादिकी
मिथ्या प्रतीति होती है, वैसे ही ब्रह्ममें आडम्बरपूर्ण
दीर्घ जगद्भ्रम है। स्वप्ननगरके आकाश और कुड्य,
काष्ठ, पाषाणादिमें कोई भी अन्तर नहीं; क्योंकि सब
केवल संकल्प ही हैं। आब्रह्मस्तम्ब प्रपंच चित्रप्रकाशमें
ही प्रतिभासित होनेके कारण सब चिद्रूप ही हैं।