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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 519, कुल 778 में से

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पृष्ठ 519

उत्पन्न अंकुरके समान किंचित् विकसित शक्ति ही
'पश्यन्ती' है। अतः संकल्परूपा वाक् 'मध्यमा' है,
व्यक्त वर्णादिरूप 'वैखरी' है। 'स्वर्ग-मुक्तिदायिनी
आप ही हैं। बुद्धिरूपसे पुरुषार्थप्रदा, कालरूपसे
परिणामप्रदायिनी, अवसानसमयमें कालरात्रिरूपसे आप
ही विराजती हैं। सर्वमंगलदायी, सर्वार्थसाधिका,
शरणागतवत्सला, सृष्ट्यादिकारिणी, सनातनी, गुणाश्रया,
गुणमयी, शरणागत-दीनार्त-परित्राणपरायणा, आर्तिहरा,
ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, चामुण्डा,
लक्ष्मी, लज्जा, विद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, महारात्रि,
महाविद्या, मेधा, ध्रुवा, सरस्वती, वरा, भूति, वाभ्रवि
(राजसी), तामसी, नियन्ता आप ही हैं। कहाँतक
कहा जाय, आप ही सर्वस्वरूपा हैं, आप ही
सर्वशक्तिसमन्विता हैं। आप और आपके आयुध हमें
सब भीतिसे बचायें। आप सर्वानर्थनिवारिणी, सर्वाभीष्ट-
दायिनी हैं, सर्वस्तुत्या हैं। आपके आश्रितोंको विपत्ति
नहीं आती, आपके आश्रित दूसरोंके आश्रय होते हैं।
आप विश्वेश्वरी, विश्वपालिनी एवं विश्वरूपा हैं,
विश्वेशवन्द्या हैं। जो आपको प्रणाम करते हैं, वे
विश्वके आश्रय बनते हैं।' देवीने प्रसन्न होकर वर
माँगनेको कहा। देवताओंने यह वर माँगा कि
'अखिलेश्वरी! आप सर्वदा त्रैलोक्यकी सर्वबाधाओंका
प्रशमन करें और समय-समयपर इसी तरह असुरोंका
संहार करें।' देवीने कहा—'ये शुम्भ-निशुम्भ आदि
दैत्य फिर अट्ठाईसवीं चतुर्युगीमें उत्पन्न होंगे, वहाँ
भी नन्दगोपके गृहमें यशोदासे उत्पन्न हो
विन्ध्यवासिनीरूपसे मैं उनका संहार करूँगी। उसी
रूपसे वैप्रचित्त दानवोंको मारकर उनका भक्षण
करूँगी। दन्तोंके रक्त होनेसे उस समय मेरा 'रक्तदन्तिका'
नाम प्रसिद्ध होगा। पुनश्च शतवार्षिकी अनावृष्टि
होनेपर 'शताक्षी' रूपसे प्रकट होकर मुनियोंपर
अनुग्रह करूँगी। अपने देहसे उद्भूत प्राणधारक
शाकोंद्वारा लोकका रक्षण करूँगी, इसीलिये मेरा
'शाकम्भरी' नाम होगा। उसी अवतारमें दुर्गम दैत्यको
मारनेसे मेरा 'दुर्गा' भी नाम पड़ेगा। भीमरूप धारण
करके हिमाचलके राक्षसोंका भक्षण करूँगी, तब मेरा
'भीमा' नाम पड़ेगा। भ्रमररूप धारणकर अरुणासुरको
मारनेसे मेरा 'भ्रामरी' नाम होगा। इस तरह जब-
जब दानवोंकी बाधा फैलेगी, तब-तब मैं अवतार
लेकर धर्म और देवताओंके शत्रुओंका क्षय करूँगी।
जो इन स्तुतियोंसे मेरा स्तवन और श्रद्धा-भक्तिसे
पूजन करेगा, उसकी सब विपत्तियोंको दूरकर
सर्वाभीष्ट-सम्पादन करूँगी।' 'सप्तशती' के चरित्रोंसे
विविध शिक्षाएँ मिलती हैं। मधु-कैटभ बड़े बलवान्
थे, परंतु बुद्धि-बलसे विष्णुने उनका वध किया,
इससे यह स्पष्ट हो गया कि पशु-बलपर सर्वदा
बुद्धि-बलकी विजय होती है। महिषासुरके वधमें
देवताओंके संगसे उद्भूत तेजःसमूहसे भगवतीका
आविर्भाव हुआ। तृतीय चरित्रसे यह भी व्यक्त होता
है कि एक शक्तिके अग्रसर होनेपर सभी शक्तियाँ
उस कार्यमें लग जाती हैं, इत्यादि-इत्यादि बहुत-सी
शिक्षाएँ प्राप्त होती हैं।
'देवीसूक्त' में भगवतीका स्वरूप
'देवीसूक्त' से विदित होता है कि साक्षात्
परब्रह्म ही देवी आदि नामोंसे प्रख्यात है।
स्वयं देवी कहती हैं—
'अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।'
अर्थात् मैं ही रुद्र, वसु, आदित्यादिरूपसे विहरण
करती हूँ। इन्द्र, अग्नि एवं अश्विनीकुमारोंको मैं ही
धारण करती हूँ। सोम, त्वष्टा, पूषा, भग आदिको भी
मैं ही धारण करती हूँ। देवताओंको हविः प्रदान
करनेवाले यजमानको फल-प्रदान भी मैं ही करती हूँ।
अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्॥
(वेदोक्त देवीसूक्त ३)
अर्थात् सब जगत्की ईश्वरी, धन प्राप्त करानेवाली,
तत्त्वज्ञानिनी एवं यज्ञार्होंमें मैं ही मुख्य हूँ, मैं ही
प्रपंचरूपसे स्थित हूँ। अतएव देवताओंने अनेक
स्थानोंमें अनेक रूपसे मेरा ही विधान किया है,
विश्वरूपसे मैं ही स्थित हूँ। जहाँ भी, जो भी किया