भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 518, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें'आप हमारे दूत बनकर जाओ और शुम्भ-
निशुम्भसे कहो कि त्रैलोक्य इन्द्रको दे दो, देवता
हविर्भुक् हों और तुमलोग यदि जीना चाहते हो तो
पाताल चले जाओ। यदि बलके घमण्डसे लड़ना
चाहते हो तो आओ, तुम्हारे मांससे हमारे शृगाल तृप्त
हों।' देवीने शिवको दूत बनाया, अतः उनका नाम
'शिवदूती' प्रसिद्ध हुआ। दैत्य शिवके द्वारा देवीका
सन्देश सुनकर क्रुद्ध होकर वहाँ आये, जहाँ देवी
स्थित थीं और अस्त्र-शस्त्रसे देवीके ऊपर खूब प्रहार
किया। देवीने लीलामात्रसे सबको नष्ट कर डाला।
कौशिकीके आगे-आगे काली शूल और खट्वांगसे
शत्रुओंको नष्ट करती चलती थीं। ब्रह्माणी, माहेश्वरी,
वैष्णवी, कौमारी, ऐन्द्री आदि अपने शस्त्रास्त्रोंसे
सहस्रों दैत्योंको मारती थीं। असुरोंका संहार करती
हुई नादसे दिशाओंको पूर्ण कर रही थीं। जब
मातृगणोंसे पीड़ित होकर असुर भाग चले, तब
रक्तबीज नामका एक महान् असुर आया। रक्तबीजके
शरीरसे जितने रक्तबिन्दु भूमिपर गिरते थे, उतनी ही
संख्यामें वैसे ही रक्तबीज उत्पन्न होते थे। वह
रक्तबीज गदा लेकर इन्द्रशक्तिसे युद्ध करने लगा।
उससे महाभयंकर संग्राम हुआ। इन्द्रशक्तिके वज्रप्रहारसे
उस दैत्यके शरीरसे बहुत-सा रक्त बहा, जिससे
असंख्य रक्तबीजोंसे संसार व्याप्त हो गया। देवीने
अपनी जिह्वा भूमिपर फैला दी और सब रक्त पान
करने लगी। अन्तमें वह दैत्य क्षीणरक्त होकर मर
गया।
फिर शुम्भ-निशुम्भका भी देवीसे घोर युद्ध
हुआ। महायुद्धके बाद निशुम्भ मारा गया। उस समय
शुम्भने आकर देवीसे डाँटकर कहा—हे दुर्गे! तू
घमण्ड न कर, दूसरोंका बल लेकर तू लड़ती है।
इसपर देवीने कहा—इस जगत्में मैं ही एक हूँ,
दूसरा कोई नहीं। देख, ये सब मेरी विभूतियाँ हैं, जो
मुझमें प्रविष्ट हो रही हैं।
यह कहते ही ब्रह्माणीप्रमुखा देवी उनमें लीन हो
गयीं, वे अकेली रह गयीं—
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा।
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः॥
ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम्।
तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका॥
(श्रीदुर्गासप्तशती १०।५-६)
देवीने कहा—'मैं ही अपनी विभूतिसे अनेक
रूपोंमें स्थित थी। अब उन सबका उपसंहार करके
अकेली ही संग्राममें स्थित हूँ। तू सावधान स्थिर हो।'
अनन्तर देवी और शुम्भका देवताओंके समक्ष
महाघोर युद्ध हुआ। बड़े-बड़े दिव्यातिदिव्य शस्त्रास्त्रोंका
प्रयोग हुआ। कभी गगनमें, कभी भूपर महान् आश्चर्यकर
युद्ध हुआ। उस महासंग्रामके बाद भगवतीने उसके
हृदयको विशाल शूलसे विदीर्णकर भूमिपर मार
गिराया। देवता तथा ऋषियोंने देवीकी इस प्रकार
स्तुति की।
देवताओंने कहा—'हे मातः! आप प्रपन्न
प्राणियोंकी आर्ति दूर करनेवाली हैं, आप अखिल
ब्रह्माण्डकी माता हैं, आप ही चराचर विश्वकी
ईश्वरी हैं, आप ही पृथ्विरूपमें स्थित होकर सबकी
आधारभूता हैं, जलरूपसे भी स्थित होकर सम्पूर्ण
विश्वका आप्यायन करती हैं, आप अनन्त वीर्यवाली
वैष्णवी शक्ति हैं, आप ही विश्वकी बीजभूता माया
हैं, सम्पूर्ण विश्व आपसे ही मोहित है, प्रसन्न होकर
आप ही मुक्तिकी हेतु बन जाती हैं, संसारकी समस्त
विद्याएँ आपका ही अंश हैं, समस्त स्त्रियाँ भी
आपका ही अंश हैं, एक आपसे ही सारा विश्व
पूरित है, फिर आपकी क्या स्तुति की जाय?
स्तुतिसाधन परा, अपरा वाक् भी तो आप ही हैं।
स्पष्टोच्चरित वाक् 'वैखरी' है, स्मृतिगोचर
वाक् 'मध्यमा' है, अर्थकी द्योतिका 'पश्यन्ती' है,
ब्रह्म ही 'परा' वाक् है—
वैखरी शब्दनिष्पत्तिर्मध्यमा स्मृतिगोचरा।
द्योतिकार्थस्य पश्यन्ती सूक्ष्मा ब्रह्मैव केवलम्॥
स्थान, करण, प्रयल तथा वर्णविभागशून्य,
स्वयंप्रकाश ज्योति 'परा' वाक् है। सूक्ष्म बीजसे