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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 778 में से

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पृष्ठ 273

इस प्रकार जिसके द्वारा स्वाप्निक पदार्थोंकी
प्रतीति होती है, वह दृष्टि आत्मस्वरूपा ही है। यहाँ
शंका होती है कि उसके भी तो उत्पत्ति और नाश
देखे जाते हैं; अतः वह भी अनित्या ही है। इसपर
हमारा कथन यह है कि ऐसा मानना उचित नहीं;
क्योंकि उस समय चक्षु आदि इन्द्रियाँ तो अज्ञानमें
लीन हो जाती हैं और अन्तःकरण विषयरूप हो जाता
है। जाग्रदवस्थाके हेतुभूत अविद्या, काम और कर्मोंका
क्षय तथा स्वप्नावस्थाके हेतुभूत अविद्या, काम और
कर्मोंका उदय होनेपर, जाग्रदवस्थामें अपने-अपने
अधिष्ठातृदेवतासे अनुगृहीत भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंद्वारा
उत्पन्न हुए भिन्न-भिन्न ज्ञानोंके संस्कारोंसे संस्कृत
हुआ अन्तःकरण ही स्वाप्निक पदार्थोंके रूपमें
परिणत हो जाता है, जिस प्रकार सिनेमामें अनेक
प्रकारके चित्रोंसे चित्रित पट ही विशेष प्रकारके
प्रकाश, गति और काँचसे संयुक्त होकर नाना प्रकारकी
गतियाँ करता प्रतीत होता है।
किंतु उस समय (स्वप्नमें) इन सबका दर्शन
किसके द्वारा होता है ? यदि कहो कि जिस प्रकार
अनिर्वचनीय रूपादि उत्पन्न हुए हैं, उसी प्रकार
अनिर्वचनीय दृष्टि भी उत्पन्न हो जाती है तो यह हो
नहीं सकता; क्योंकि प्रातिभासिक अनिर्वचनीय पदार्थ
सदा ज्ञातसत्ताक ही होते हैं। उनका सर्वदा अपरोक्ष-
ज्ञान हुआ करता है। किंतु इन्द्रियाँ अज्ञातसत्ताक भी
होती हैं; क्योंकि वे स्वयं अज्ञात रहकर भी वस्तुका
प्रकाशन करनेमें समर्थ हैं। अतः अज्ञातसत्ताक होनेके
कारण उसका आरोप नहीं हो सकता; अतः स्वाप्निक
रूपकी दृष्टि शुद्ध आत्मा ही है।
यहाँ यह प्रश्न होता है कि यदि स्वाप्निक
रूपकी दृष्टि शुद्ध आत्मा ही है तो उसमें दृष्टि, श्रुति,
विज्ञाति आदि भेद नहीं हो सकते; क्योंकि वह तो
निर्विशेष अर्थात् सामान्यरूप है। उसमें यह नामरूपात्मक
भेद कैसे हो गया ? इसका उत्तर यह है कि इन
अनिर्वचनीय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धका अनिर्वचनीय
सम्बन्ध स्वप्रकाश आत्मामें अनिर्वचनीय श्रुति,
अनिर्वचनीय मति एवं अनिर्वचनीय विज्ञाति आदि
उत्पन्न कर देता है, जिस प्रकार एकरस प्रकाश भी
नील-पीत, हरित काँचोंके साथ संश्लिष्ट होनेपर
तत्तद्रूपवान् प्रतीत होता है। किन्हीं-किन्हीं लैम्पोंमें
देखा जाता है कि उसके भिन्न-भिन्न पार्श्वोंमें भिन्न-
भिन्न वर्णके काँच लगे रहते हैं। उनके कारण उसकी
दीपशिखा एकरूप होनेपर भी भिन्न-भिन्न ओरसे
विभिन्न वर्णकी दिखलायी पड़ती है। इसी प्रकार एक
ही शुद्ध ब्रह्म विविध उपाधियोंके कारण विविध
रूपोंमें प्रतीत होता है। यहाँ दृष्टान्तमें दीपशिखाके
सन्निहित होनेवाले नील, पीत, हरित काँच समान-
सत्तावाले हैं अर्थात् उन सभीकी व्यावहारिक सत्ता है;
इसलिये उसका वैवर्ण्य पारमार्थिक भी कहा जा सकता
है। परंतु आत्मासे संश्लिष्टसे शब्दादि तो अतात्त्विक
हैं; अतः अतात्त्विक शब्दादिके सम्बन्धसे होनेवाला
तात्त्विक-आत्माका भेद भी अतात्त्विक ही है।
यहाँ एक बात यह समझ लेनी चाहिये कि
चक्षुरादिजन्य रूपाद्याकाराकारितवृत्तिरूप जो दृष्टि
आदि हैं, उनके संस्कारोंसे संस्कृत अन्तःकरण ही
शब्दादिरूपसे परिणत होता है। अतः दर्शन-श्रवण
आदिके संस्कारोंसे संस्कृत जो अन्तःकरण है, उसके
सम्बन्धसे ही शुद्ध चैतन्यमें दृष्टि-श्रुति आदि अनेक
भेद प्रतीत होते हैं; जिस प्रकार सुषुप्तिमें यद्यपि
अहंकार नहीं रहता तथापि जागनेपर यही अनुभव
होता है कि ‘मैं सुखपूर्वक सोया’। इस प्रकारकी
स्मृतिसे उस समय भी अहंकारकी सत्ता सिद्ध होती
है। परंतु वस्तुतः उस समय अहंकार नहीं रहता;
क्योंकि उस अवस्थामें इच्छा, द्वेष, प्रयत्नादि अहंकारके
धर्म नहीं देखे जाते और धर्मके बिना धर्मीकी स्थिति
सम्भावित नहीं है; तथापि अहंकार न रहनेपर भी अहं
संस्कार-संस्कृत अज्ञान तो रहता ही है; इसीसे
जागृतिमें उसका परामर्श होता है।
रासपञ्चाध्यायीके दूसरे श्लोककी एक
अन्य व्याख्या
अब हम इस श्लोकके तात्पर्यका एक अन्य