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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 778 में से

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पृष्ठ 272

२६० भक्तिसुधा

तीन प्रकारकी हैं, अतः व्युत्थानावस्थामें पुरुष भी
शान्त, घोर और मूढ़रूप हो जाता है।
यह कथन लोकव्यवहारोपयुक्त दर्शनकी दृष्टिसे
है। वास्तवमें तो इस बौद्धबोधसे व्यतिरिक्त पुरुषका
स्वभावभूत चैतन्य ही पौरुषेयदर्शन है। यदि बौद्धबोधको
ही पुरुषका स्वभाव माना जाय तो यह प्रश्न होता है
कि समाधि-अवस्थामें समस्त चित्तवृत्तियोंका निरोध
हो जानेपर पुरुषका क्या स्वभाव रहता है ? तात्पर्य
यह है कि यदि उसका स्वभाव बौद्धबोध ही है तो
उस अवस्थामें समस्त बुद्धिवृत्तियोंका निरोध हो
जानेके कारण वह स्वभावशून्य होकर कैसे रहेगा ?
कारण, ऐसा कोई समय नहीं है, जबकि पुरुष
शब्दादि वृत्तियोंमेंसे किसीके साथ तादात्म्यापन्न न
हो। समस्त वृत्तियाँ पाँच विभागोंमें विभक्त की गयी
हैं—प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति;
इनमेंसे किसी-न-किसीके साथ पुरुषका सारूप्य
रहता ही है। जिस प्रकार अग्नि दाहकत्व-
प्रकाशकत्वशून्य नहीं रहता, उसी प्रकार पुरुष शान्त,
घोर या मूढ़वृत्तियोंसे शून्य कभी नहीं रहता। अतः ये
उसके स्वभाव ही हैं। यदि कहें कि समाधिकालमें
वृत्तियोंका निरोध हो जानेपर भी वह उस निर्वृत्तिक
अन्तःकरणका ही भोक्ता रहता है तो ठीक नहीं;
क्योंकि निर्वृत्तिक अन्तःकरण भोगोपयोगी नहीं है;
क्योंकि भोग और सत्त्व-पुरुषान्यताख्यातिरूप पुरुषार्थ-
सम्पादन करनेवाली अन्तःकरणरूपमें परिणत हुई ही
प्रकृति पुरुषकी भोग्य हो सकती है। निर्वृत्तिक चित्तमें
तो ये दोनों ही बातें नहीं हैं। अतः समाधि-अवस्थामें
पुरुषका कोई स्वभाव ही नहीं रहता। कोई भी
भावरूप पदार्थ अपने स्वभावको छोड़कर नहीं रह
सकता। पुरुष भावरूप है, अतः समाधि-अवस्थामें
भी उसका सद्भाव रहनेके कारण क्या हो सकता है ?
इसपर सिद्धान्ती कहता है—'तदा द्रष्टुः
स्वरूपेऽवस्थानम्' अर्थात् समस्त वृत्तियोंका निरोध
हो जानेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती
है। तात्पर्य यह है कि भावके दो रूप हैं—औपाधिक
और अनौपाधिक। बौद्धबोध पुरुषका औपाधिक रूप
है, अतः समाधिमें उसका अभाव हो जानेपर भी
पुरुषका निरुपाधिक अर्थात् स्वाभाविक स्वरूप तो
रहता ही है। यही मुख्य पौरुषेय-बोध है। यह
पुरुषका स्वाभाविक चैतन्य ही वास्तविक दर्शन
है। दृष्टि दो हैं—नित्या और अनित्या। ख्याति
अनित्या दृष्टि है, यह उदयास्तमयशालिनी है। इसकी
साक्षीभूता जो नित्या दृष्टि है, उसीके विषयमें श्रुति
कहती है—
'न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते।'
(बृहदारण्यक० ४।३।२३)
अर्थात् द्रष्टाकी दृष्टिका लोप कभी नहीं होता।
यही दीर्घा दृष्टि है और यही मुख्य भी है। इसीसे
भगवान्‌को अविलुप्तदृक् कहा है। यह दृष्टि समस्त
अनित्य दृष्टियोंकी दृष्टि (साक्षिणी) है; अर्थात्
अनित्य दृष्टियोंकी दृष्टि और उनका द्रष्टा एक ही बात
है। यहाँ 'द्रष्टुः दृष्टिः' यह कथन ऐसा ही है, जैसे
'राहोः शिरः' अर्थात् जिस प्रकार सिर राहुसे तनिक
भी भिन्न नहीं है, उसी प्रकार यह दृष्टि भी द्रष्टासे
भिन्न नहीं है, अतः 'द्रष्टुः' इस पदमें जो षष्ठी है, वह
समानाधिकरण्यमें है; अर्थात् जो दृष्टि द्रष्टासे अभिन्न
है, वही द्रष्टाकी दृष्टि है और यदि व्यधिकरण—षष्ठी
मानकर अर्थ किया जाय तो इसके दो तात्पर्य होंगे—
द्रष्टुजन्या दृष्टि या द्रष्टृ-प्रकाशिका अर्थात् द्रष्टृविषयिणी
दृष्टि। इनमें पहली द्रष्टाके आश्रित है और दूसरी
द्रष्टाका आश्रय है तथा पहली अनित्या है और दूसरी
नित्या। इससे सिद्ध हुआ कि घटादि-दर्शनका आश्रय
तो द्रष्टा है तथा उस द्रष्टाका जो दर्शन है, जिस
दर्शनका विषय वह द्रष्टा है, वही शुद्ध आत्मा है। वह
दृष्टि क्या है? वह द्रष्टाकी स्वरूपभूता है। यहाँ
'द्रष्टा' शब्दसे काल्पनिक द्रष्टा अभिप्रेत है। उस
(काल्पनिक द्रष्टा)—का आश्रय ही उसका पारमार्थिक
स्वरूप है, जैसे रज्जुमें अध्यस्त सर्पका रज्जु। वह दृष्टि
कौन-सी है? इसका परिचय श्रुति इस प्रकार देती है—
'सा द्रष्टुर्दृष्टैर्यया स्वप्ने पश्यति' इत्यादि।