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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 380 में से

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पृष्ठ 285

२५८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
सेवा के परायण हैं, वे निरन्तर इस बात का ध्यान रखते हैं कि उन्हें कभी
अपनी सेवा का अभिमान न हो जाए ।
श्रीकृष्ण के सीधे सेवक के ऐसे मनोभाव को 'धुर्य' कहते हैं । श्रीकृष्ण
के पार्षदों का कुशल विशलेषणात्मक अध्ययन करके श्रील रूप गोस्वामी ने
उन्हें धुर्य, धीर और वीर—इन तीन श्रेणियों में माना है। रक्तक धुर्य श्रेणी
में हैं—अर्थात् जो निरन्तर श्रीकृष्ण की परम प्रेयसी गोपियों की सेवाओं में
अनुरक्त रहते हैं ।
श्रीकृष्ण का एक धीर पार्षद सत्यभामा की धात्री का पुत्र है।
सत्यभामा द्वारका में श्रीकृष्ण की पट्टमहिषियों में से एक हैं और जब
श्रीकृष्ण से उनका विवाह हुआ तो उनकी धात्री के पुत्र को भी उनके साथ
जाने दिया गया, क्योंकि वे बाल्यकाल से भाई-बहन के समान साथ-साथ
रहे थे । अतएव यह सत्यभामा की धात्री का पुत्र श्रीकृष्ण के साथ उनके
साले के समान रहता था और कभी-कभी इस सम्बन्ध से वह श्रीकृष्ण के
साथ परिहास भी कर बैठता । उसने एक समय श्रीकृष्ण से कहा, "हे
कृष्ण ! मैंने कभी तुम्हारी अर्धांगिनी श्रीदेवी की कृपा-प्राप्ति का प्रयत्न
नहीं किया है। परन्तु फिर भी में इतना भाग्यवान् हूँ कि मुझे तुम्हारे कुल
का सदस्य अर्थात् सत्यभामा का भाई माना जाता है।"
वीरपार्षद
एक वीर पार्षद ने अपने अभिमान को इस प्रकार अभिव्यक्त किया
है—"भगवान् बलराम प्रलम्बासुर के महान् बलशाली शत्रु हों तो हों; परन्तु
मुझे उनसे कोई भय नहीं । जहाँ तक प्रद्युम्न का सम्बन्ध है, मुझे उससे
कुछ लेना-देना नहीं है, क्योंकि वह तो एक नन्हा सा बालक है । अतएव
मुझे किसी से कोई आशा नहीं है । मुझे तो केवल श्रीकृष्ण का कृपाकटाक्ष
चाहिये । फिर तो मैं श्रीकृष्णप्रिया सत्यभामा को भी कुछ नहीं गिनता ।"
श्रीमद्भागवत (४.२०.२८) में महाराज पृथु भगवान् का सम्बोधन
करते हुए कहते हैं—"हे नाथ ! मुझे लक्ष्मीदेवी के कोप की चिन्ता नहीं
है । यदि वे मुझसे रुष्ट भी हो जायें तो कोई भय नहीं, कोई चिन्ता नहीं,
क्योंकि मुझे आप पर पूर्ण विश्वास है । आप बड़े ही दीनवत्सल हैं और
अपने भक्तों की, अपने सेवकों की तुच्छ सेवा को भी बहुत मान लेते हैं।
अतएव मुझे विश्वास है कि आप मेरी तुच्छ सेवा को भी स्वीकार करेंगे ।
हे नाथ ! आप आप्तकाम हैं । आप किसी की भी सहायता के बिना जो