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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 380 में से

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पृष्ठ 102

भक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ७५
तन्त्रशास्त्र में उल्लेख है, “हरि के निर्माल्य की सौरभ के नासिका
में प्रवेश करते ही पाप के बन्धन नष्ट हो जाते हैं । जो पापात्मा नहीं है,
वह भी सौरभ-आंघ्राण करके मायावादी से भक्त हो जाता है ।” इसके
अनेक उदाहरण हैं, जिनमें सनकादि के उत्थान की कथा मुख्य है। वे
मायावादी थे, परन्तु मन्दिर में पुष्पों और धूप की सौष्ठव के आघ्राण से
परम भक्त बन गए । उपरोक्त वाक्यों से ज्ञात होता है कि मायावादी
शुद्ध नहीं होते, वरन् दूषित रहते हैं ।
श्रीमद्भागवत में प्रमाण है, “जिसने सम्पूर्ण पापों का मार्जन नहीं
किया है, वह शुद्ध भक्त नहीं हो सकता । शुद्धभक्त को श्रीभगवान् के
परमेश्वरत्व में कोई सन्देह नहीं रहता, इसलिए वह निरन्तर कृष्णभावना
और भक्तियोग के परायण रहता है ।” ‘अगस्त्यसंहिता’ में सदृश वाक्य
है—“अपनी घ्राणेन्द्रिय की विशुद्धि के लिए हमें मन्दिर में श्रीकृष्ण को
अर्पित पुष्पों को सूंघना चाहिए ।”
श्रीमूर्ति का स्पर्श
विष्णुधर्मोत्तर में श्रीमूर्ति के चरणकमलों का स्पर्श करने के सम्बन्ध
में कथन है—“जो पुरुष वैष्णवदीक्षा से युक्त है तथा कृष्णभावनाभावित
भक्तियोग के परायण है, वही श्रीमूर्ति का स्पर्श करने का अधिकारी है ।”
गांधी द्वारा चलाए गए राजनीतिक आन्दोलन के काल में उस वैदिक
पद्धति का विरोध किया गया था, जिसके अनुसार शूद्र, चाण्डाल आदि
अधम श्रेणी के लोगों का मन्दिर-प्रवेश निषिद्ध है। यह निषेध उनके अशुद्ध
आचरण के कारण है । परन्तु साथ में उन्हें अन्य सुविधायें प्राप्त हैं जिनसे
वे शुद्धभक्तों के संग में भक्तियोग के चरम संसिद्धि को प्राप्त कर सकते
हैं। किसी भी जाति में जन्मे मनुष्य का बहिष्कार नहीं है, पर सब के लिए
पवित्र होना आवश्यक है । उस शुद्धि-पद्धति को अंगीकार करना होगा ।
परन्तु गांधी केवल ‘हरिजन’ नाम की मोहर लगाकर उन्हें शुद्ध सिद्ध करना
चाहते थे, अतः मन्दिर के व्यवस्थापकों और गांधी में गम्भीर संघर्ष चला ।
जो कुछ हो, वर्तमान नियम सब शास्त्रों का विधान है—कोई भी
शुद्ध व्यक्ति मन्दिर में प्रवेश कर सकता है । वास्तविक स्थिति यही होनी
चाहिए । जो विधिपूर्वक दीक्षित है और विधि-विधान का पालन करता
है, वही प्रवेश और श्रीमूर्ति का स्पर्श कर सकता है, सब नहीं । विधि के
साथ मूर्ति-स्पर्श करने वाला तत्काल पापपुंज से छूट जाता है और उसकी
सर्वाभीष्ट सिद्धि भी हो जाती है ।