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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 380 में से

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पृष्ठ 101

७४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
नैवेद्य-आस्वादन
पद्मपुराण में स्पष्ट वचन है—"श्रीमूर्ति के सामने से हटकर जो
पुरुष तुलसी और चरणामृत से युक्त नैवेद्य का अन्न नित्य नियमित रूप
से खाता है, वह अविलम्ब करोड़ों यज्ञों के पुण्य को प्राप्त करता है।"
चरणामृत-पान
चरणामृत की प्राप्ति प्रातःकाल वस्त्र-अलंकरण से पूर्व भगवान् की
मूर्ति को स्नान कराने पर होती है। सुगन्धी और पुष्पों से युक्त जल
श्रीचरणों से नीचे गिरता है। उसे एकत्रित कर दही के साथ मिलाया जाता
है। इस प्रकार यह चरणामृत अतिशय आस्वाद्य तो होता ही है, इसका
प्रबल पारमार्थिक माहात्म्य भी है। पद्मपुराण के अनुसार, जिस मनुष्य ने
कभी दान, यज्ञ, स्वाध्याय, अर्चन, आदि कुछ भी पुण्य न किया हो, वह
भी मन्दिर के चरणामृत का पान करके परमधाम के योग्य हो जाता है।
मन्दिरों में चरणामृत को बड़े से पात्र में रखने की प्रथा है। श्रीमूर्त्ति का
दर्शन-अभिवादन करने आया भक्त विनम्रभाव से इस चरणामृत के तीन
विन्दु का पान करके परमानन्द सुख पाता है।
अर्पित धूप और पुष्पों की सौरभ का आघ्राण
'हरिभक्तिसुधोदय' में उल्लेख है—"श्रीहरि को अर्पित धूप को
सूंघने से संसाररूपी सर्प से डसे हुओं का विष समाप्त हो जाता है।"
कुशल पुरुषों द्वारा वनों में पायी जाने वाली एक प्रकार की जड़ी सुंघाये
जाने पर सर्प का विष उतर जाता है और चेतना लौट आती है। इसी
भाँति जो मन्दिर में मूर्ति को अर्पित धूप सूंघता है, उसका सम्पूर्ण भवरोग
तत्काल दूर हो जाता है।
मन्दिर में जाने पर भक्त को फल, फूल, धूप आदि किसी न किसी
पदार्थ का भगवान् को अवश्य अर्पण करना चाहिए। यदि धन की सामर्थ्य
न हो तो कुछ और चढ़ाये। प्रायः प्रातः काल मन्दिर जाने वाले नर-नारी
बहुत-सी भेंट ले जाते हैं। अधिक नहीं, एक अन्नकण का भी अर्पण किया
जा सकता है। यह विधि है कि सन्त अथवा मन्दिर में मूर्ति के दर्शनों के
लिए किसी भेंट के बिना नहीं जाना चाहिए। अर्पण अति तुच्छ हो चाहे
अमूल्य हो। फल, फूल, जल आदि जो कुछ भी थोड़ा सा मिल सके, अवश्य
अर्पण करना चाहिए। जब कोई भक्त प्रातः मन्दिर में भेंट चढ़ाने जायगा,
तो वह धूप का आघ्राण भी करेगा और परिणाम में भवरोग के विष से
मुक्ति पा जायगा।