भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९४९
कैथ, इमलीकी छाल, पुनर्नवा, बेलकी छाल और काला भाँगरा इनके रसोंमें एक
एक बार भावना देकर बेरकी गुठलीके बराबर गोलियाँ बनालेवे । यह शोथांकुश-
नामक रस सब प्रकारकी सूजन, ज्वर, अरुचि, पाण्डुरोग, सर्वशरीरस्थित शोथ एवं
वात, पित्त और कफोत्पन्न रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ३० ॥ ३१ ॥
पञ्चामृतरस ।
शुद्धसूतं समादाय गन्धकं भागतः समम् ।
त्रिभागं टङ्कणं देयं विषभागत्रयं तथा ॥ ३२ ॥
भागत्रयं तथा देयं मरिचस्य प्रयत्नतः ।
चूर्णीकृतं जलेनापि पिष्ट्वा रक्तिमितां वटीम् ॥
शृङ्गवेरसेनेव भक्षयेद्वटिकामिमाम् ॥ ३३ ॥
शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक ये दोनों एक-एक भाग एवं सुहागा ३ भाग, शुद्ध
मीठातेलिया ३ भाग और मिरच ३ भाग इन सबको एकत्र चूर्णकर जलके साथ
खरल करके रत्ती-रत्तीभरकी गोलियाँ तैयार करलेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल एक वटी
अदरखके रसके साथ भक्षण करे ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
जलदोषोद्भवे शोथे घोरेऽत्युग्रे जलोदरे ।
सन्निपातेषु घोरेषु विंशतिश्लैष्मिके गदे ॥ ३४ ॥
ज्वरातीसारसंयुक्ते शोथे चैव गलग्रहे ।
शिरःशूलगदे घोरे नासारोगे सपीनसे ॥
पञ्चामृतरसो ह्येष सर्वरोगोपशान्तिकृत् ॥ ३५ ॥
यह पञ्चामृत नामवाला रस जलके दोषसे उत्पन्नहुए घोरतर शोथ, अत्युग्र जलो-
दर, दारुण सन्निपात, बीस प्रकारके कफजन्य रोग, ज्वर, अतीसारयुक्त शोथ, गलेके
रोग, शिरःशूल, नासारोग, पिनसप्रभृति रोगोंमें शीघ्र उपकार करता है । एवं अन्य
सर्वप्रकारके रोगोंको शान्त करनेवाला है ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
शोथकालानलरस ।
चित्रजं कुटबीजं च श्रेयसी सैन्धवं तथा ।
पिप्पली देवपुष्पं च सजातीफलटङ्कणम् ॥ ३६ ॥
लौहमभ्रं तथा गन्धं पारदेनैव मिश्रितम् ।
एतेषां कर्षमात्रेण वटीं गुञ्जामितां शुभाम् ॥
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय कोकिलाक्षरसेन तु ॥ ३७ ॥