भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९०६ भैषज्यरत्नावली । [ उदररोग-
शुद्ध पारा, सुहागा और कालीमिरच ये प्रत्येक एक एक भाग, शुद्ध गन्धक,
पीपल और सोंठ ये प्रत्येक दो दो भाग तथा सबकी बराबर भूसीरहित जमाल-
गोटा लेवे। फिर सबको एकत्र जलमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बना-
लेवे। उसकी एक गोली चावलोंके धोवनके साथ सेवन करे तो उससे दस्त होकर
गुल्म, प्लीहा और उदररोग दूर होते हैं। यह महानाराचरस विरेचनमें बाणकी
समान तीक्ष्ण है ॥ २६ ॥ २७ ॥
जलोदरारिरस ।
पिप्पली मरिचं ताम्रं रजनीचूर्णसंयुतम् ।
स्नुहीक्षीरैर्दिनं मर्द्यं तुल्यं जैपालबीजकम् ॥ २८ ॥
निष्कं खादेद्विरेकः स्यात्सद्यो हन्ति जलोदरम् ॥ २८ ॥
पीपल, कालीमिरच, ताम्रभस्म और हल्दीका चूर्ण इन सबोंको समान भाग
लेकर थूहरके दूधमें एक दिनतक अच्छे प्रकार खरल करे । फिर सबकी बराबर
जमालगोटा मिलाकर पीसलेवे । इस रसको चार माशे प्रमाण खाय तो दस्त
होकर जलोदररोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ २८ ॥
दस्तको बन्द करनेके उपाय ।
रेचनानां च सर्वेषां दध्यन्नं स्तम्भने हितम् ।
दिनान्ते च प्रदातव्यमन्नं वा मुद्गयूषकम् ॥ २९ ॥
यदि दस्तोंको बन्द करना हो तो दही और भातका भोजन करे । अर्थात् औष-
धिको सेवन करनेपर जब उत्तम प्रकारसे दस्त होजायँ तब सन्ध्याकालमें दही और
भात अथवा मूँगके यूष और भातको भक्षण करे ॥ २९ ॥
वह्निरस ।
सूतस्य गन्धकस्याष्टौ रजनीत्रिफलाशिलाः ।
प्रत्येक च द्विभागः स्यात्त्रिवृज्जैपालचित्रकम् ॥ ३० ॥
प्रत्येक स्यात्रिभागं च व्योषं दन्तिकजीरकम् ।
प्रत्येक सप्तभागं स्यादेकीकृत्य विचूर्णयेत् ॥ ३१ ॥
जयन्तीस्नुकपयोभृङ्गवह्निवातारितैलकैः ।
प्रत्येकेन क्रमाद्भाव्यं सप्तवारं पृथक् पृथक् ॥
महावह्निरसो नाम्ना निष्कमुष्णजलैः पिबेत् ॥ ३२ ॥
शुद्ध पारा तथा गन्धक प्रत्येक आठ आठ भाग, हल्दी, त्रिफला और मैनसिल
प्रत्येक दो दो भाग, निसोत, जमालगोटा एवं चीता तीन तीन भाग,