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सर्वकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 681, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 681

[चिकित्सा] भाषाटीकासहिता । ६४९
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महाबलातैल ।

बलामूलकषायस्य दशमूलीकृतस्य च ।
यवकोलकुलत्थानां क्वाथस्य पयसस्तथा ॥ १२ ॥
अष्टावष्टौ शुभा भागास्तैलादेकस्तदेकतः ।
पचेदावाप्य मधुरं गणं सैन्धवसंयुतम् ॥ १३ ॥
तथाऽगुरुं सर्जरसं सरलं देवदारु च ।
मञ्जिष्ठा चन्दनं कुष्ठमेलां कालानुसारिवाम् ॥ १४ ॥
मांसी शैलेयकं पत्रं तगरं शारिवां वचाम् ।
शतावरीमश्वगन्धां शतपुष्पां पुनर्नवाम् ॥ १५ ॥
तत्साधु सिद्धं सौवर्णे राजते मृन्मयेऽपि वा ।
प्रक्षिप्य कलशे सम्यक् सुनिगुप्ते निधापयेत् ॥ १६ ॥

खिरेंटीकी जडका क्वाथ, दशमूलका क्वाथ, जा, बर और कुलथी इन प्रत्येक का क्वाथ आठ आठ सेर, दूध ९ सेर और तिलका तैल एक सेर लेवे । फिर सबको एकत्र मिलाकर उसमें काकोल्यादि गणकी ओषधियाँ ( जीवक, ऋषमक, ऋद्धि, वृद्धि, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, गिलोय, मुगवन, मषवन, पद्माख, वंशलोचन, काकडासिंगी, जीवन्ती, मुलहठी, दाख, पुण्डारिया) सेंधानमक, अगर, सफेदराल, धूपसरल, देवदारु, मंजीठ, लालचन्दन, कूठ, इलायची, तगर, बालछड, भूरिछरीला, तेजपात, तगर, सारिवा, वच, श्तावर, असगन्ध, सोया और पुनर्नवा इन सब ओषधियोंके समान भाग मिश्रित एक सेर कल्कको डालकर मन्दमन्द अग्नि के द्वारा उत्तम प्रकारसे तैलको सिद्ध करे । फिर उसको सुवर्ण या चाँदी अथवा मिट्टीके शुद्ध बर्त्तनमें भरकर और अच्छे प्रकारसे ढककर रखेदेवे ॥ १२–१६ ॥

बलातैलमिदं नाम्ना सर्ववातविकारनुत् ।
यथाबलं भिषङ् मात्रां सूतिकायै प्रदापयेत् ॥ १७ ॥
या च गर्भार्थिनी नारी क्षीणशुक्रश्च यः पुमान् ।
क्षीणवाते मर्महतेऽभिहते मथितेऽथवा ॥ १८ ॥
भग्न श्रमाभिपन्ने च सर्वथैवोपयोजयेत् ।
सर्वमाक्षेपकादींश्च वातव्याधीन् व्यपोहति ॥ १९ ॥