भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५२९
यह रस—बहुत दिनोंकी पुरानी पाँचों प्रकारकी खाँसी, अत्यन्त भयङ्कर राज-
यक्ष्मा, जीर्णज्वर, अरुचि, धातुगतज्वर, विषमज्वर, तिजारी, चौथिया ज्वर, अर्श,
कामला, पाण्डुरोग, मन्दाग्नि और प्रमेहरोगको शीघ्र नष्ट करता है। इसके सेवनसे
मनुष्य कामदेवकी समान रूपवान् होजाता है ॥ ३५-३६ ॥
वसन्ततिलक रस।
हेम्नो भस्मकतोलकं घनयुगं लौहात्त्रयः पारदा-
श्चत्वारो नियतास्तु वङ्गयुगलं चैकीकृतं मर्दयेत् ।
मुक्ताविद्रुमयो रसेन समता गोक्षूरवासेक्षुणा
सर्वं वालुकायन्त्रगं परिपचेद्याम दृढं सप्तकम् ॥ ३७ ॥
कस्तूरीघनसारमर्दितरसः पश्चात्सुसिद्धो भवेत्
कासश्वाससपित्तवातकफजित्पाण्डुक्षयादीन् हरेत् ।
शूलादिग्रहणीं विषादिहरणो मेहाश्मरीविंशतिं
हृद्रोगापहरो ज्वरादिशमनो वृष्यो वयोवर्द्धनः ॥
"श्रेष्ठः पुष्टिकरो वसन्ततिलको मृत्युञ्जयेनोदितः" ३८
सोनेकी भस्म १ तोला, अभ्रककी भस्म २ तोले, लोहेकी भस्म ३ तोले, शुद्ध
पारा ४ तोले, शुद्ध गन्धक ४ तोले, वंगभस्म २ तोले, मोतीकी भस्म दो तोले और
मूँगेकी भस्म २ तोले इन सबको एकत्र पीसकर गोखरू, अडूसा और ईखके समान
भाग रसमें एक एक बार भावना देवे । फिर वालुकायन्त्रमें रखकर आरने उपलोंकी
अग्निके द्वारा सात प्रहरतक पकावे । जब शीतल हो जाय तब उसमें कस्तूरी ४
तोले और भीमसेनी कपूर ४ तोले खरल कर मिलादेवे । इस प्रकार यह रस सिद्ध
होता है । यह रस दो दो रत्ती प्रमाण सेवन करनेसे खाँसी, श्वास, वात, पित्त,
कफके विकार, पाण्डु, क्षय, शूल, संग्रहणी, विषजन्य रोग, प्रमेह, हृदयरोग और
और सर्व प्रकारके ज्वरादि रोगोंको हरता है । एवं पुष्टिकारक, वीर्य और आयुकी
वृद्धि करनेवाला तथा अत्यन्त श्रेष्ठ रस है । इस वसन्ततिलक नामक रसको शिव-
जीने वर्णन किया है ॥ ३७-३८ ॥
व्याघ्रीहरीतकी ।
समूलपुष्पच्छदकण्टकार्यास्तुलां जलद्रोणपरिप्लुतां च ।
हरीतकीनां च शतं निदध्याद्विपच्य सम्यक्चरणावशेषम् ३९
गुडस्य दत्त्वा शतमेतदग्नौ विपक्वमुत्तीर्य ततः सुशीते ।
कटुत्रिकं च द्विदलप्रमाणं पलानि षट् पुष्परसस्य तत्र ॥४०
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