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सर्वकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 183

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १५१

भुकुरुञ्चकलताभिश्च त्रिफलाबृहतीरसैः ।
मर्दिता वटिका कार्या कृष्णलाफलसन्निभा ॥ ३८० ॥
ततो वटीद्वयं दत्त्वा यत्नैः पाट्यादिभिर्वृतः ।
रसः सर्वज्वरं हन्ति क्षणमात्रान्न संशयः ॥ ८१ ॥

पारा, गन्धक, जवाखार, सुहागा, सज्जी, सेंधानमक, विरियासंचरनमक, काला-
नमक, गूगल और वत्सनाभ विष ये प्रत्येक दोदो माशे लेकर एकत्र खरल करलेवे ।
फिर काले धतूरेकी जड़के रसमें सातबार भावना देकर गोखुरू, इन्द्रजौ, मरताशाक,
करंजुआ, चीतेकी जड़, मालकाँगनी, छोटी कटसरैयाकी जड़, त्रिफला और बड़ी-
कटेरी इन ओषधियोंके रस अथवा क्वाथमें क्रमक्रमसे खरल करके एकएक रत्तीकी
गोलियाँ बनालेवे । उनमेंसे दो गोली अदरखके रसके साथ सेवन कराकर रोगीको
गरम वस्त्रोंसे अच्छीतरह ढकदेवे । यह रस क्षणभरमें ही सब प्रकारके ज्वरोंको नष्ट
करदेता है ॥ ७८-३८१ ॥

शीतारिरस ।

पारदं गन्धकं टङ्कं शुल्बं चूर्णं समं समम् ।
पारदाद् द्विगुणं देयं जैपालं तुषवर्जितम् ॥ ८२ ॥
सैन्धवं मरिचं चिञ्चात्वग्भस्म शंकराऽपि च ।
प्रत्येकं सूततुल्यं स्याज्जम्बीरैमर्दयेद्दिनम् ॥ ८३ ॥
द्विगुञ्जं तप्ततोयेन वातश्लेष्मज्वरापहः ।
रसः शीतारिनामाऽयं शीतज्वरहरः परः ॥ ८४ ॥

पारा, गन्धक, सुहागा, ताम्रभस्म, सेंधानमक, मिरच, इमलीकी छालकी भस्म
आर वत्सनाभविष ये प्रत्येक एकएक भाग और जमालघोटोंके बीजोंकी गिरी २
भाग लेकर सबको जम्भीरीनींबूके रसमें एक दिनतक खरल करके दो दो रत्तीकी
गोलियाँ बनालेवे । इसकी एक एक गोली गरम जलके साथ सेवन करे । यह रस
वातकफज्वर और शीतज्वरको शमन करनेके लिये परमोपयोगी है ॥

पर्णखन्डेश्वररस ।

समांशं मर्दयेत्खल्ले रसं गन्धं शिलां विषम् ।
निर्गुण्डीस्वरसैर्भाव्यं त्रिवारं चार्द्रकद्रवैः ॥
गुञ्जैकं भक्षयेत्पर्णैर्ज्वरं हन्ति महद्द्रुतम् ॥ ८५ ॥


१ शंकरा-विषम् ।