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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1364, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 1364

१३३२ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा—

यत्किञ्चिन्मधुरं स्निग्धं जीवनं बृंहणं गुरु ।
हर्षणं मनसश्चैव सर्वं तद् वृष्यमुच्यते ॥ ५ ॥
जो मीठी, चिकनी, आयुकारक, वीर्यवर्द्धक, गुरुपाकी और मनको प्रसन्न करने-
वाली वस्तु होती है उसको वृष्य कहते हैं ॥ ५ ॥

नरो वाजीकरान् योगान्सम्यक् शुद्धो निरामयः ।
सप्तत्यन्तं प्रकुर्वीत वर्षादूर्ध्वं तु षोडशात् ॥ ६ ॥
आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति ।
न च वै षोडशादर्वाक् सप्तत्याः परतो न च ॥ ७ ॥
वस्थ और वमन, विरेचनादि करके शुद्ध शरीरवाला मनुष्य सोलह वर्षका अव-
स्थासे लेकर सत्तर वर्षकी अवस्थातक वाजीकरण औषधियोंको यथाविधि सेवन करे
तो वह मनुष्य दीर्घायु और स्त्रियोंके साथ रमण करने योग्य होता है । सोलह
वर्षसे कम उम्रवाले बालकको और सत्तर वर्षके पीछे वृद्ध मनुष्यको वाजीकरण
औषधि सेवन नहीं करनी चाहिये ॥ ६ ॥ ७ ॥

भोजनानि विचित्राणि पानानि विविधानि च ।
गीतं श्रोत्राभिरामाश्च वाचः स्पर्शसुखास्तथा ॥ ८ ॥
कामिनी सान्द्रतिलका कामिनी नवयौवना ।
गीतं श्रोत्रमनोज्ञं च ताम्बूलं मदिराः स्रजः ॥ ९ ॥
गन्धा मनोज्ञरूपाणि चित्राण्युपवनानि च ।
मनसश्चाप्रतीघातो वाजीकुर्वन्ति मानवम् ॥ १० ॥
तृप्तिजनक और बलकारक नाना प्रकारके भोज्य और पानीय द्रव्योंका सेवन,
कानोंको प्रिय लगनेवाले गीत, स्त्रियोंके प्रिय वाक्य, स्त्रियोंका सुखपूर्वक स्पर्श, तिल-
कको धारण करनेवाली नौजवान, स्त्रीके साथ प्रसङ्ग, मनोहर और कर्णप्रिय गान,
ताम्बूलभक्षण, मदिरापान, सुगन्धित मालायें धारण करना, मनोरम और चित्रवि-
चित्र पुष्पोंसे युक्त बगीचेमें भ्रमण एवं मनके खेदको हरनेवाले साधन ये सब
मनुष्यको वाजीकरणके लिये प्रयोग करनी चाहिये ॥ ८–१० ॥

योगान्संसेव्य वृष्यांस्तदुपरि च पयः शीतलं चाम्बु पीत्वा
गच्छेन्नारीं रसज्ञां स्मरशरतरुणीं कामुकः काममाद्ये ।
यामे हृष्टः प्रहृष्टां व्यपगतसुरतस्तत्समुत्पाद्य सद्यः ।
कान्तः कान्ताङ्गसङ्गान्महदपि न च वै धातुवैषम्यमेति ॥११॥