भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1355, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३२३
वाला, सम्पूर्ण रोगोंसे मुक्त, वली और पलितरोगसे रहित, वर्षभरतक सेवन कर-
लेनेपर चन्द्र और सूर्य्यकी समान ( कान्तिमान् ) जबतक जीवे तबतक स्थिरवीर्य
और सैंकडों स्त्रियोंके भोगनेके समर्थ होता है । इसपर शाक और खट्टे रसवाले
पदार्थ त्यागकर अन्यान्य द्रव्योंको यथेच्छ सेवन करे ॥
तच्चूर्णं गोमूत्रेण सह यः पिबति, हन्त्यष्टादश कुष्ठानि
पामाविर्चाचकादीनि नाडीव्रणगुल्मशूलप्लीहोदराणि
च ॥ तच्चूर्णं तक्रेण सह यः पिबति स सर्वरोगविवर्जितो
गृध्रदृष्टिर्वराहबलो वलीपलितवर्जितः पवनवेगो दिव्य-
मूर्तिर्भवति । मासद्वयप्रयोगेण पण्डितश्च न संशयः ॥
जो पुरुष निर्गुण्डीके चूर्णको गोमूत्रके साथ पान करे तो उसके १८ प्रकारके
कोढ, खुजली, विचर्चिका, नाडीव्रण, गुल्म, शूल, तिल्ली और उदररोग नष्ट होते
हैं । एवं तक्रके साथ सेवन करे तो वह सब प्रकारके रोगोंसे रहित, गिद्धकीसी
दृष्टिवाला, शूकरकी समान बलवान्, वली तथा पलितरोगविहीन, वायुके समान
वेगवाला और दिव्यमूर्ति होता है । दो महीनेतक इसका सेवन करनेसे धुरन्धर
पण्डित होजाता है इसमें सन्देह नहीं । यह निर्गुण्डीकल्प पिङ्गला योगिनीने वर्णन
किया है ॥
कार्श्यहरलौह ।
श्वेतापुनर्नवादन्तीवाजिगन्धात्रिकत्रयैः ।
शतमूलीबालयुक्तैरेभिर्लौहं प्रसाधितम् ॥ ५० ॥
हिनस्ति नियतं कार्श्यमपि भृङ्गरसैः सह ।
नास्त्यनेन समं लौहं सर्वरोगान्तकं शुभम् ॥
दीपनं बलवर्णाग्निवृष्यदं चोत्तमोत्तमम् ॥ ५१ ॥
सफेद, पुनर्नवा, दन्ती, असगन्ध, हरड, बहेडा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल,
नागरमोथा, चीता, वायविडङ्ग, श्तावर और खिरेंटी इनको समान भाग और सबके
बराबर लोहभस्म लेवे । फिर सबोंको यथाविधि एकत्र कूट पीसकर चूर्ण करलेवें ।
इस चूर्णको प्रतिदिन प्रातःकाल भांगरेके रसके साथ नियमपूर्वक सेवन करनेसे मनु-
ष्यकी कृशता नष्ट होती है । इस लोहके समान सम्पूर्ण रोगोंको नाश करनेवाला
अन्य लोह नहीं है । यह अग्निदीपक, बलवर्णकारक, वीर्यवर्द्धक और अत्युत्तम
लोह है ॥ ५० ॥ ५१ ॥