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सर्वकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1073, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 1073

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०४१

लोहेके डंडेसे उत्तम प्रकार खरल करके २० गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेकी विधि इसप्रकार है-प्रथम तीन दिनतक तीन तीन गोलियाँ भक्षण करे, फिर चौथे दिनसे ११ दिनतक एक एक गोली खावे, इसप्रकार १४ दिनमें यह समस्त औषधि रोगीको सेवन करानी चाहिये ॥ ३९-४१ ॥

लवणं वर्जयेदम्भः पादार्द्धाशनमिष्यते ।
दिनद्वये व्यतीते तु पादोनं पथ्यमाचरेत् ॥ ४२ ॥
मसूरयूपं सगुडं व्यञ्जनं चाथ कल्पयेत् ।
पुनर्नवा पटोलानि तिक्तपत्री च गोक्षुरम् ॥ ४३ ॥
पुटपत्री कोकिलाक्षं शाकार्थे घृतभर्जितम् ।
शर्करा लवणस्थाने वेसवारे धनीयकम् ॥ ४४॥
लवङ्गाजाजिहिंगूनि धान्यकं जीरकाणि च ।
पाकार्थे सम्प्रदातव्यं संस्कारार्थं भिषग्वरैः ॥ ४५ ॥

इसपर लवण और जलको त्यागकर वक्ष्यमाण विधिसे आहार करे । पहले दिन खुराकसे चौथाई, दूसरे दिन आधा और दोदिनके पश्चात् पौन पौन भाग भोजन करे । गुडके साथ व्यञ्जन और मसूरकी दालका यूष पथ्य है । शाकोंमें घीमें भुने-हुए पुनर्नवै, परवल, ककोडे, गोखरू, पुटपत्री और तालमखानेको खाना श्रेष्ठ है । शाकमें नमककी जगह खाँड और मसालेकी जगह धनियाँ डाले । पाकको सुगन्धित करनेके लिये लौंग, कालाजीरा, हींग, धनियाँ और जीरेको एकत्र पीस-कर डाले ॥ ४२-४५ ॥

भैरवस्य रसस्यान्याः क्रिया अत्र प्रयोजयेत् ।
रसगुग्गुलुरेवं हि सर्व्वाञ्जित्वाऽऽमयानयम् ॥ ४६ ॥
कुष्ठोपदंशनामानं व्रणं वातादिसंयुतम् ।
कामदेवप्रतीकाशश्चिरजीवी भवेन्नरः ॥ ४७ ॥

इसमें अन्य सर्व क्रियायें भैरवरसकी समान करे । इस प्रकार व्यवहार किया हुआ यह रसगूगल सर्वप्रकारके रोगोंको नष्टकर उपदंश, कुष्ठ तथा वातादि युक्त रोगोंके व्रणोंको शीघ्र सुखाता है । इसके सेवन करनेसे शरीर कामदेवकी समान कान्तिमान् होता है और वह मनुष्य बहुत कालतक जीता है ॥ ४६ ॥ ४७ ॥

सारिवाद्यवलेह ।

सारिवायाः पलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् ।
तस्मिन्पादावशेषे तु गुडूची शतमूलिका ॥ ४८ ॥

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