सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1059, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1059

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०२७

नागरमोथा, धूपसरल, फूलप्रियंगु, अनन्तमूल, मोचरस, नागकेशर, लोध चीता
और धायके फूल इन सबोंको कल्क डालकर यथानियम तेलको सिद्ध करे । इस
तेलको लगानेसे शल्योत्पन्न नाडीव्रण और नानाप्रकारके व्रण भरजाते हैं और
रोगी शीघ्र सुखी होता है ॥ २० ॥ २१ ॥

भल्लातकाद्यतैल ।

भल्लातकार्कमरिचैर्लवणोत्तमेन सिद्धं विडङ्गरजनीद्वय-
चित्रकैश्च । स्यान्मार्कवस्य च रसेन निहन्ति तैलं नाडीं
कफानिलकृतामपचीं व्रणांश्च ॥ २२ ॥

भिलावे, आककी जड, कालीमिरच, सैंधानोन, वायविडङ्ग, हल्दी, दारुहल्दी
और चीतेकी जड इनका समान भाग मिलाहुआ कल्क १ सेर, तिलका तेल ४ सेर
और भाँगरका रस १६ सेर लेवे । सबको एकत्रकर उत्तम रूपसे तेलको पकावे ।
यह तेल व्यवहार करनेसे कफज और वातज नाडीव्रण, अपचीरोग एवं सर्वप्रकारके
व्रणोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ २२ ॥

निर्गुण्डीतैल ।

समूलपत्रां निर्गुण्डीं पीडयित्वा रसेन तु ।
तेन सिद्धं समं तैलं नाडीव्रणविशोधनम् ॥ २३ ॥
हितं पामापचीनां तु पानाभ्यञ्जननावनैः ।
विविधेषु च रोगेषु तथा सर्वव्रणेषु च ॥ २४ ॥

जड और पत्तोंसहित निसोतको कूटकर निकालाहुआ रस २ सेर और तिलका
तेल २ सेर इन दोनोंको एकत्र पकाकर पान, मालिश अथवा नस्यग्रहण करनेसे
सर्वप्रकारके नाडीव्रण ( नासूर ), खुजली, अपची, व्रणरोग और अन्यान्य विविध
प्रकारके रोग तत्काल नाश होते हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥

हंसपदीतैल ।

हंसपद्यरिष्टपत्रं जातीपत्रं ततो रसैः ।
तत्कल्कैश्च पचेत्तैलं नाडीव्रणविरोहणम् ॥ २५ ॥

हंसपदीके पत्ते, नीमके पत्ते और चमेलीके पत्ते इनका समान भाग मिश्रित काथ
१६ सेर एवं इन्हींका कल्क १ सेर लेवे । इनके द्वारा ४ सेर तिलके तेलको विधि-
पूर्वक सिद्ध करे । यह तेल नाडीव्रणको तत्काल सुखा देता है ॥ २५ ॥

नरास्थितैल ।

नरास्थितैललेपेन स्फुटितः शुष्यति व्रणः ॥ २६ ॥